न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यम एव एष वृणुते तेन लभ्यः
तस्य एष आत्मा विवृणुते तनुँस्वाम् ।।
- कठोपनिषद्
आत्मानुभव प्रवचन से नहीं मिलता,
ना मेधावी शक्ति से, ना हि अधिक अध्ययन से मिलता है ।
जिन्हें नियम, अनुशासन का वरदान है,
उन्ही के स्वरूप में आत्मभाव की अभिव्यक्ति होती है ।









