बचपन से मेल मिला करके
अपने बचपन मे जा कर के,
मंगल आनन्द जो आता है,
वह ही जीवन कहलाता है।

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बचपन से मेल मिला करके
अपने बचपन मे जा कर के,
मंगल आनन्द जो आता है,
वह ही जीवन कहलाता है।
||जय श्री राम||
#जय श्री राम
सैनिक
तेरे लाल मरे सीमा पर देश मे क्यों दिवाली है
गद्दारो ने छेड़ा है फिर,द्वंदयुद्ध ये जारी है
त्योहारी मौसम है पूरा देश समूचा झूमा है
इस त्योहारी मौसम मे माता का आँचल सूना है
माँग उजड़ गई है बहनो की उनके बच्चे रोए है।
सही कहूँ रोए है सब ही जिनको प्यार है माता से
वह भी रोए है जिनको प्यार मिला है माता से
अब तो सहा नही जाता सीमावर्ती हैरान हुए
उनके अपने भाई बंधु देश कई बर्बाद हुए
अब तो लगता है हमको भी आगे आना होगा सबको राष्ट्र प्रेम का दीपक घर-घर रोज़ जलाना होगा सबको
सब ले लो सौगंध आज भारत माँ का सत्कार करे फौजी ने सीमा रक्षा की हम भीतर से कुछ कार्य करे।
हर वीर शहीद सिपाही को मिल जाए शान्ति सही-सही क्योंकि वह भी रोता है जब खिल्ली उड़ती है कही-कही आजादी मिली बोलने की उसका फायदा उठाते है निर्लज्जो को शर्म नही कुछ भी ये बोले जाते है
पर पता नही गद्दारो को हम चैन से क्यों सो जाते है सैनिक सीमा रेखा पर प्राणो की बलि दे आते है।
कुछ धृष्ट कहे है उनको तो मरने के पैसे मिलते है
हम देते है दुगने तुमको सीमा पर कैसे रहते है
पर पता नही तुमको सीमा पर पैसे नही टिकाते है
वो तो दिल वाले होते है जो हँस के प्राण दे आते है
अब करते है आवाहन हम भारत के वीर युवाओ से
बन-बन कर निकलो देशभक्त छोड़ो घर द्वार विचारो से जागृति कर दो जन जन मे तुम पाश्चात्य जगत के भूलो दुर्गुण
प्राचीन कला को भारत की सेजो तुम फिर से हे अर्जुन ऐसा कर दो जन-जन मे तुम राष्ट्र प्रेम छलका दो तुम भारत के वीर युवाओ मे प्रेम पुष्प खिला दो तुम।
करता हूँ भारत माता को ह्रदय से प्रणाम सखा
दो हमको
आशीर्वाद सदा सबका हो कल्याण सखा।
भारत माता की जय
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः,स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः,सर्वस्वम मे रामचन्द्रो दयालुर्रनान्यम,जाने चैव जाने न जाने
जब प्रेम हुआ मेरे राघव से,तब आँखो मे आँसू आऐ है,
जब-जब मैने उन्हे बुलाया दौड़े-दौड़े वो आऐ है,
उनकी छबि को वांचत-वांचत,तनिक नही हम घबराऐ है,
राघव तोड़े रोज धनुहिया,हम नित-नित नऐ बनाऐ है,
उनके घुँघराले से केसू, देख-देख हम भरमाऐ है,
राघव को है जब भी बुलाया,दौड़े-दौड़े वो आऐ है,
मेरे राघव ने जब भी,ध्यान भजन करने की ठानी,
तब-तब उनके संग मे मैने, भजन,सवैये,छंद गाऐ है,
राघव घुँटुअन जब चलते थे,चौदह भुवन रमण करते थे,
उनके नन्हे से हाथो से मैने चांटे बहु खाऐ है,
देखो राघव देख रहा मै, आँखो को हूँ सेंक रहा मै,
आ जाओ हे अजिरबिहारी,कब से तुमको टेर रहा मै,
आओ खेले बृज की होली,आओ खेले रंग की होली,
आओ खेले उर अंतर से,दुनिया की शम्मा है सुनहरी,
आओ खेले मन्वंतर से,आँखो-आँखो के अंतर से,
साँसो से साँसे मिल जाऐ, आओ खेले उस तंतर से,
आओ खेले शिव मंतर से,आओ खेले जुग अंतर से
जलते हुऐ बंगाल को उद्भासित करती रचना
सुन सकते हो तो सुन लेना,
भारत माँ के कायर बेटो,
उस सुरा, सुन्दरी, यवनी के,
सुख मे डूबे कायल बेटो,
मै बिलख-बिलख कर रोई हूँ,
तुम तक आवाज़ नही पहुँची,
कायरता है झलकी तुममे,
ऐसी औलाद नही देखी,
क्या भूल गऐ हो तुम अपने,
आज़ाद,भगत और राजे को,
क्या भूल गऐ हो तुम अपने,
प्रताप और सेनानी को,
क्या याद नही तुमको उनकी,
जिसने आज़ादी दिलवाई,
क्या याद नही तुमको उनकी,
जिसने भूखे लड़ी लड़ाई,
मुन्नी,शीला के अफसानो मे,
लगता है तुम भी चूर हुऐ,
तेरे घर मे हिन्दू मुस्लिम,
जैसे दंगे भरपूर हुऐ,
काश्मीर से गोहाटी तक,
बंग्ला से हल्दीघाटी तक,
ऐसा कोई प्रान्त नही है,
जहाँ न दंगा होता हो,
तू-तू मै-मै के चक्कर मे,
दिल भारत का रोता हो,
बंगाल जहाँ पर ज्ञान और,
मानवता का शुभ संगम हो,
बंगाल जहाँ पर नैतिकता के,
साथ-साथ गुण अर्जन हो,
है बंगाल वही जहाँ पे,
टैगोर संत विद्वान हुऐ,
वो ही तो ऐसी धरती है,
जहाँ पर संत महान हुऐ,
ऐसी धरती के अंचल मे,
कुछ ऐसे बीज वो दिऐ है,
मानवता की नैतिकता के,
जिसने अर्थ खो दिऐ है,
और जहाँ पर आज नित्य,
व्यवहारिक ज्ञान खो गया हो,
हिन्दू मुस्लिम के चक्कर मे,
जंगलराज हो गया हो,
आपाधापी के चक्कर मे,
स्वराज खो गया हो,
इतना कहना है तुम सबसे,
बंगाल के बाघ महान बनो,
नैतिकता के साथ-साथ,
अपना सागर संसार रचो,
अपने भारत की भूमि को,
तुम नित्य-नित्य सिंचन कर दो,
भारत माता के आँचल को,
खुशियो के फूलो से भर दो,
अपनी भारत के चक्कर मे,
विश्वास सत्य संसार गढ़ो,
भारत के दीर्घ शिखाओ को,
तुम अपने मन से पार करो।
गीता का सँदेश सुनाने हम मथुरा से आये है।(यह लेखन तब का है जब इंदौर मध्यप्रदेश मे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का 62वाँ अधिवेशन हुआ था,वहाँ के लघु भारत को देखकर मेरा वैचारिक सागर मंथन करने लगा था)
गीता का संदेश सुनाने हम मथुरा से आये है,
भारत को समृद्ध बनाने हम मथुरा से आये है,
देशप्रेम की अलख जगाने हम मथुरा से आये है,
वही भूमि है जहाँ जमुन की धारा कल-कल करती है,
वही भूमि है जहाँ कंस की कारण मरण स्थली है,
वही भूमि है जहाँ प्रेम की नदिया कल-कल करती है,
वही भूमि है जहाँ राधिका जन-जन के मन बसती है,
वही भूमि है कुञ्ज गलिन मे जहाँ श्याम संग राधारानी रमण करे,
कान्हा की वँशी जब बाजे लोक-लोक मोहित कर दे,
उसी भूमि से आये है जहाँ कृष्णचन्द्र अवतार हुआ है,
भक्तिसुधा औ प्रेमसुधा ने जन-जन के तन मन को छुआ है,
प्रेमसुधा का पान कराने हम मथुरा से आये है,
श्रीमद्भगवत गीता से नीति बतलाने आये है,
रसिक बिहारी की रचना प्रख्यात विश्व भूमण्डल है,
सुर और बृज की गाथाऐ,गाता भारत का जन-जन है,
जन-जन को रसिको से मिलाने हम मथुरा से आऐ है,
शाम नाम की वँशी से तन मन हर्षाने आऐ है,
गीता का सँदेश सुनाने हम मथुरा से आऐ है,
देख-देख अधिवेशन को है मेरा तो अनुमान सही,
पूरा भारत नन्दलाल लगे वनिता भारत की कृष्णसखी,
आज हमारे भारत को अवसर सर्वज्ञ मिला ऐसा,
तुम चाहो तो ऐसा करदो जैसा दुनिया ने न देखा,
तुम चाहो तो बुद्धिबल से इतिहास बदल दोगे यारो,
तुम चाहो तो निज भुजबल से इतिहास बदल दोगे यारो,
तुम चाहो तो मान प्रतिष्ठा का कुछ नया दृश्य दिखला दोगे,
भारत को विश्वगुरु फिर से तुम चाहो तो बना दोगे,
शक्ति का वरदहस्त तुमपर,है भारत माँ का प्यार तुम्हे,
फिर परिषद से भी प्यार मिला,मानवता का संसार तुम्हे,
तुम अपने-अपने निज कौशल से भारत को सजा दोगे यारो,
संकल्पित राष्ट्र धरोहर को तुम फिरसे संजो दो न यारो,
अपनी शक्ति को एकीकृत कर भारत को बदल दो न यारो,
सम्पूर्ण विश्व भूमण्डल पर परचम फहरा दो न यारो।
वर्षो की याद पुरानी है इसमें भी नई कहानी है
जब बीत बुढ़ापा जाता है आनी इक रोज़ जवानी है
श्यामलता कोमलता आँखे आँखे
काला काजल बतलाता है सुन्दरता है निर्मलता है,
है यम है कृष्ण श्याम ललिता निशि काली है कोमलता है
आनन्द हुआ निर्मल पावन,सबकुछ जगती पावन मिलता
श्यामलता है कोमलता है कैसे कह दूँ ओ श्यामसखा,
इतनी बाते सबकी बाते आँखे आँखे आँखे आँखे
कर जाता है कोई सुन्दर निर्मल कोमलता की बाते।
सबसे सुन्दर जग प्यारा है आसान है होने वाला है
कैसे कह दूँ निर्मल तुमको क्या श्यामसखा मतवाला है
क्या आँखो के समन्दर मे बहते,उन धागो के साये बहते,
क्या हुआ? समन्वय सुन्दर से धागो के धागो मे बहते।
हम अपनी निर्मल रचना से ख्वाबो के ख्वाबो मे बहते
हम सब मिल जाते रत्तीभर कैसे कहते धागे बहते।
हर निशा रूप अँधियारी सी,कैसे रत्तीभर रह सकती
जीवन वाले जीभट वाले आकाओ के सुख सह सकती
आनन्दमयी ललिता का घन सुन्दर है श्याम सलोना है
हिमता आतपता को कहते सुन्दर श्री जी है छौना है।
क्या कही ललित उस साखी से,कोमलता से अनुरागी से
आतपता हिम आच्छादित भी उस ललित सखी उस साथी से
क्या कैसा निर्मल कोमल है जब जड़ता के अनुराग नही
फिर कैसा कोई प्रेम भला जब मानवता के गुणगान नही
क्या कहूँ शिखाओ से रत्तीभर,ये भरमाया करती है
कैसा भी हिम आतप उमड़े मेघो से बाते करती है
इस ओर जगत का धर्म बढ़ा उस ओर मनुज भरमाया है
जिस ओर बहा गंगा का जल हिम हरित स्वर्ग फिर छाया है।
क्या कह सकता अनुरागी हो,मन तो पल-पल पर बागी हो
हो गया वही फिर कर्म भला खुल गई ताले से चाभी हो,
क्या घोर निराशा से अंतर्मन मे नैराश्य हुआ पैदा
क्या घोर पिपासा से मन के भीतर का है सागर सूखा।
सागर सूखा अच्छा ही था,गंगा भी सूख गई प्यारे
कैसे वो निहारे नैनो से,कैसे हम उसको दुत्कारे
हर सभा मध्य मे ये रोना मानव का लगा ही रहता है
तेरा मेरा-मेरा तेरा तू-तू मैं-मैं कुछ कहता है
क्या कहता है जग भ्रान्त हुआ,वैधव्य हुआ जग को भी है
भीतर से कितना भी कठोर,श्यामलता कोमलता भी है।
श्यामलता से कोमलता से आँखो से और सभ्यता से
मन तो भरमाया करता है, विघ्नो से बाते करता है
कैसे हरता मैला मन का तन का कुछ शोध करे है
कैसे रह सकता पागल सा वह कबसे तेरी राह तके है।
जब कुछ बोले है त्रिपुर सुगम मन की बातो का ज्ञान करो
जो हो जाऐ उसको लेलो फिर सुभग सिन्धुरस पान करो।
ऐसी जल्दी ऐसी हल्दी ऐसी क्या पाबन्दी होगी
अपने मन के दीदारो की अपनी वो जुगलबन्दी होगी
हर एक सखा से पावन से,पावनता के उस सागर से
अपने हर एक उजागर से,जग के वैभव के सागर से
क्या एक बार कुछ हुआ व्यर्थ जीने पाने का और कृत्य
फिरसे क्या ज्ञात करेगा क्या,जीवन का पाठ पढ़ेगा क्या
अपने आधार सुगम्य बने,क्यों पारावार प्रणम्य बने
सुख-वैभव की आधारशिला,कैसे रख सकता जीव भला
क्या वह फिर से झुक सकता है,कायर कृतघ्न कर सकता है
आसान हृदय अपना भी है पर्वत का एक झरना भी है
मन बड़ा चतुर है सुधागम्य, कैसे हो सकता है पावन
क्या आगाज़ो के सिन्धु पड़े अपनी ही महिमा मे जोते
अपने जैसे प्रणमम्य बने कैसे करते कुछ और भले
आसान हृदय अपना ही है आतपता कोमलता भी है
हर एक भवन की लाली है श्यामलता की रखवाली है
कोमल है, क्या ममता उसने माँ जैसी है क्या काली है
आसान मधुप मणिधर सुन्दर कैसे बीता सागर सा मन
फिर फिरसे प्राप्त हुई तृष्णा जिसका जो भी जीवन वो मन
फिरसे कुछ कहता रहा सदा,लहरो मे बहता रहा सदा
अपने आचारो से जीवनभर किसको क्या कहता रहा सदा
आघात हो गया क्या अपना,जीवन की बुरी दशा बदली
आने वाले अपने सारे जीभट वाले अनुरागी है
कहते क्या गीता वाले है संसद मे सब बेमानी है।
क्या कहूँ विचारो की सुन्दरता और श्यामलता को
आँखो देखी बातो को कह दूँ समरसता को
अपने पयवृन्द जमाने से साऐ मे रहते रहे सदा
गंगा मईया तेरा गंगाजल सदियो तक बहता रहे सदा
आकर के सुन्दर वनमाली तृष्णा आघात करेगी क्या
छुपकर देखे वी माली हो अपने हृदय धरेगी क्या
कहदो-कहदो वन उपवन से वो स्वछन्द बहारो मे खेले
अपने अन्तर की सुंदरता से रहते है बासन्तिक मेले।