आनन्दो के रंगमहल में कितने दिन जीवन जीना है
जिसने जो कुछ पाया उसको घोल - घोल कर भी पीना है

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आनन्दो के रंगमहल में कितने दिन जीवन जीना है
जिसने जो कुछ पाया उसको घोल - घोल कर भी पीना है
कुछ साज पलो के टूटे है,
कुछ हमसे अपने रूठे है,
उनके मन मे जो द्वंद खड़ा शायद वो उससे टूटे है,
अपनी मर्यादा के आगे,फूलो की भाषा के आगे मेरा बस क्या चल सकता है,
किशना तू बता दे किशना को जीवन कैसे रूक सकता है।
हाँ इतना फिर भी कह देता हूँ,
सागर सरिता मै बना दूँगा,
छूटे जो उनको मिला लूँगा,
रूठे जो उनको मना लूँगा॥
कौन मातृका देता है सुख सिंधु सरिस सुख पाकर के?
माँ वैभव देती है संशय के सुगम उमंग मनाकर के।
हर सभा मध्य हर प्रभा मध्य,क्या कर सकती रखवाली है।
हो गया जमाना सम सुंदर,हिम् आतप की रखवाली है।
सब आँखो के एक समुंदर है,सब भेष और जग सुंदर है।
हर सभा मध्य जग जंगम है,रेखा कुछ और विहंगम है।
क्या चोटी बीच दिशाओ मे, हरियाली प्रीत सिखाओ मे।
आनन्द भवन मे रहकर के,जीवन के सब सुख सह करके।
क्या और हृदय पिघला सबका,कुछ हुआ नया हलका-हलका।
फिर से पनघट पर घट छलका,
आनन्द जगत मे छाता है,जब हृदय पिघलता जाता है।
जो होते है निष्ठुर कठोर,कैसे रहते है सुधा भोर।
हर एक तपस्या तप छलके, संसार जगत का घट छलके।
कैसे कहती सृष्टि सारी,दीपक का है दीपक छलके।
प्रतिमा मे खोज करो किशना,संयम मे भोग करो किशना।
छल ही तुझको खा जायेगा,पर लील नही वह पायेगा।
चोटी की सुंदर ड्योढ़ी भी,बाती को तो वो तोड़ेगी।
क्या कहता जगत दिवाना है,पागल वो राम दिवाना है।
हर सभा मध्य रणछोड़ चले,जाने किशना किस ओर चले।
हर ओर तपस्वी के रण का,कोलाहल और समर्पण का।
जब बीज कभी बोया जाता,मानवता तब अकुलाती है।
फिर नही रोक वो पाती है
फिर से कुछ वीर प्रकट होते,धरती का है आँचल धोते।
पृथ्वी फिर से हरियाती है,धरती वीरो से खाली है।
क्या और समस्या साकी है,जीवन की नई प्रभाती है।
आतपता है हिम् की अथोर,जगजीवन की है तरुण खोज।
जब फिर से हरियाली छाई, कुछ नए फूल लेकर आई।
रिश्तो मे जकड़े रहे सदा,माला मे लटके रहे सदा/माला के भटके रहे सदा।
सुख वैभव सदा लुटाते है,फिर नाश मनुज पर छाते है।
होकर कुछ और समर्पित हम,जा विनय करे देवी से हम।
कुछ और तपस्या फल देगी,किशना को नया जीवन देगी।
हरियाली फैली रही सदा,धरती न मैली रही सदा।
सतयुग पृथ्वी पर आता है,सबकुछ सुखमय हो जाता है।
आच्छादित हिम् आलेखो से,भूखण्ड सुधा के प्रलेखो मे।
तन मन को ढूंढा जाता है,माया वो नई रचाता है।
कैसे रहता तन मन कठोर,निज आतपता मे अमित भोर।
जब फूल पिरोए जाते है,तब हार कहाऐ जाते है।
हर दिशा एक अलबेली है,राधा किशना संग खेली है।
जीवन बस तरुण पहेली है,क्या कहे जगत बस रेली है।
सुंदर रचना जग की साकी,दुल्हन वो नई नवेली है।
सन्धि भी करनी पड़ती है,कभी-कभी विपदाओ मे।
और मौन भी राहत देता,संकट भरी फिज़ाओ मे,
कभी-कभी अंगारो की दहकन ठंडी पड़ जाती है,
शान्त सुबह की मधुर लालिमा लाल -लाल जब अति है,
कभी-कभी प्रतिमाये भी बाते करती है आपस मे,
कभी-कभी तृष्णाओ की आँधी छंटती सी जाती है,
कभी-कभी ऊँचे सुर वाले नीचे सुर बोला करते,
कभी-कभी गाँधी गौतम की आँखे भी रो आती है,
कभी आपसी मतभेदो से मान घटा रावण तक का है,
कभी राम ने भ्रातप्रेम से,राज चलाया उदय अस्त है,
कभी-कभी गीता कुरआन को साथ-साथ पढ़ते देखा है,
कभी हृदय है आल्हादित तो कभी समय बढ़ते देखा है,
कभी ध्यान से कभी योग से प्राणी को बढ़ते देखा है,
कभी अनुग्रह के कारण से अन्तर्मन ढलते देखा है,
कभी पाप से,कभी प्यार से,जीवन को ढलते देखा है,
कभी-कभी दारुण द्वीपो का करुणा क्रन्दन भी देखा है,
कभी हमारे जनमानस मे उठे विचार हृदय विदीर्ण है,
कभी-कभी उस जनमानस का तन मन सब हर्षित देखा है,
कभी नैन से,कभी बैन से,मन मे कुछ पलते देखा है,
कभी हमारे मनमानस मे पल पल कुछ बढ़ते देखा है,
कभी करुण क्रन्दन के रस से,सरिता नीर भर देखा है,
कभी-कभी हर्षित तन मन से उनको कुछ कहते देखा है,
कभी हुआ रोगी मन तो,कभी बड़ा मंज़र देखा है,
कभी मौत को पास समझकर,व्याप्त हुआ भय सबके मन मे,
कभी-कभी गणनायक के संग घटा तिमिर घोर नभ का है,
कभी हुई तरुणाई मे,जो भूले भोले मन के द्वारा,
कभी हमारे मनमानस ने, भूलो का सावन देखा है,
कभी-कभी गीता कुरआन भी,खाली-खाली सी लगती है,
कभी-कभी गीता कुरआन से,प्राणी को सजते देखा है,
कभी समंदर शान्त मिला तो,कभी समंदर मे हलचल है,
कभी समंदर मध्यम ही जग लगता सुन्दर सुन्दर है,
कभी नृत्य लालायित रहता करके किसी दिखाने को,
कभी-कभी उस नृत्य कला मे शिव ताण्डव भारत देखा है,
कभी दिखाने के कारण ही,मिला हमारा प्रेम सखा है,
कभी-कभी उस प्रेम सखा को कहते कुछ अनुपम देखा है,
कभी-कभी प्रकृति सृष्टि भी करने लगती है कुछ ऐसा,
लगता मानो प्रेम जगत ही सबकी ही आधारशिला है,
कभी-कभी मनमानेपन से मन को सन्तुष्टि मिल जाती,
कभी-कभी मनमानेपन का पछतावा भीषण होता है,
कभी नया कुछ करते-करते दोहराते जाते है सबकुछ,
कभी वही कुछ दोहराने से नया नया कुछ हो जाता है,
कभी हुआ मन कुछ करने का,लगता सबकुछ कर डालूँगा,
कभी-कभी बस संग चलने से,सबकुछ यूँ ही हो जाता है,
कभी धुरंधर, कभी पुरंदर, कई युगन्तर बीत गए है,
कभी-कभी तो आ जाय कर,मन्वन्तर बीत भी गए है,
कभी पुकारा है तुमने हमको जब भी हे भारत माँ,
तभी-तभी प्रस्तुत होता हूँ प्राणपुष्प लेकर हाथो मे,
कभी-कभी दुश्मन ने है माँ,चाल चली ओछी-ओछी है।
तभी-तभी दुश्मन को,हे माँ,परलोक दिखाया है,
कभी-कभी दुश्मन की आँखे भारत की धरती पर लगती,
तभी-तभी दुश्मन को हमने मौतो का चश्मा पहनाया,
कभी देश रक्षा के हिट मे, देने पड़े प्राण यदि तुमको,
दे देना हँसते-हँसते तुम भारत माता के बेटे हो,
करना पड़े कभी समझौता,तुमको अपनी राष्ट्रभक्ति से,
करना तभी राष्ट्रहित जिसमे,राष्ट्रप्रेम भी निश्चित हो,
कभी-कभी कर लेना अपनी जननी का वन्दन प्यारे,
जन्मभूमि भी आशिष देगी,जय विजय निश्चित होगी,
कभी-कभी इतिहास पढ़ोगे, पाओगे गौरवमय खुद को,
कभी-कभी अपने पुरखो पर तुमको शोक,दुःख,भय,होगा
कभी-कभी खुद को कुछ समझो, तो समझो,हम ही है सबकुछ,
पर अभिमान न आने पाए इसका तुमको ध्यान रहे,
कभी-कभी कर लेता हूँ, मै भी वन्दन मात-पिता का,
कभी-कभी प्रकृति भी हमको,शुभ आशिष सत्य देती है।।
सत्ता के आदर्श यही क्या भूखे नंगे नेता हो
जनता से तो लेता हो पर जनता को न देता हो
ऐसे मूर्ख बने बैठे है नेता पूरी सत्ता के
कहते है हम जनता के लेकिन होते सत्ता के
||जय श्री राम||
#जय श्री राम
जीवन के ऊपर कुछ पंक्तियां
जीवन साहित्य पढ़ो तुम भी,जीवन साहित्य पढ़े हम भी
देखें कैसे होता जग में अपने जैसे कोई संगी
मन की ममता की मारो से कुछ शोक युक्त त्योहारों से
हमने जीवन को देखा है कच्ची पक्की दीवारों से
हम जब भी मुदित हुए तब ही एक नई उमंग जगाई है
यह पूरब से आई जैसे कोई नई पुरवाई है
सपनों को संजीदा करके
अपने दामन को भर करके
वो पार गई दिल हार गई सब को सुखमय जीवन देके
स्वर्णिम जीवन में जाकर के कुछ नए दृश्य अपना करके
हमने देखा है बहुत सरल जीवन साथी बन पा करके
कुछ ऐसी सोच रही होगी कुछ ऐसा कृत्य रहा होगा
कुछ नई कल्पना में कृतियों का कुछ कुकृत्य रहा होगा
हमने तो सपनों को साझा करके ही नोट कमाए हैं
लेकिन क्या पाया हमने तो बस जग के वोट कमाए हैं
जीवन की चोटी बड़ी गई लेकिन आयु तो चली गई
कहते ही रहे हम बचपन से मेरी मां मुझसे चली गई
आदान-प्रदान हुआ जग का हमने देखा कोई सपना
जब जग को पाया अपना तो साकार हुआ सारा सपना
इन फुल झाड़ियों में देख रहे हो तुम अपने कृत्य जमाने को एक बार चलो पीछे पथ को, देखो पदचिन्ह बनाने को
आसान यही है अपने मन में कि तुम देखो अपने वीराने को
कोई घर यू ही न उजड़ जाए तुम देखो अपने घर वाले को
सपनों का कोई सार नहीं यह तो घर है बर्बाद नहीं
इनको तुम जितना देखोगे होता इतना आसान नहीं
इसलिए जगत के पृष्ठों पर इतिहास तुम्हारा जब होगा
कर लिए कर्म जो नैतिक कुछ आकाश तुम्हारा जब होगा
जो जाओगे हंसकर जग से इतिहास तुम्हारा तब होगा
बचपन से मेल मिला करके
अपने बचपन मे जा कर के,
मंगल आनन्द जो आता है,
वह ही जीवन कहलाता है।
अनगिन तारो की रातों में,
भूले भटके जज़्बातों में,
क्यों खो जाता हर कोई नर,
इन भाव जगत की बातों में,
हमने सम्बन्ध विचारा न,
रिश्ता क्या है ये जाना न,
फिर भी सम्बन्ध जुड़ा देखा,
सबको उस तरफ मुड़ा देखा,
दीवारों की आज़ादी को,
पल दो पल की बर्बादी को,
संज्ञान हुआ अभिमानी को,
क्यों बेहतर रामकहानी को,
जाना हम सबने बहुत खूब,
जीवन की जटिल जुबानी को।
सैनिक
तेरे लाल मरे सीमा पर देश मे क्यों दिवाली है
गद्दारो ने छेड़ा है फिर,द्वंदयुद्ध ये जारी है
त्योहारी मौसम है पूरा देश समूचा झूमा है
इस त्योहारी मौसम मे माता का आँचल सूना है
माँग उजड़ गई है बहनो की उनके बच्चे रोए है।
सही कहूँ रोए है सब ही जिनको प्यार है माता से
वह भी रोए है जिनको प्यार मिला है माता से
अब तो सहा नही जाता सीमावर्ती हैरान हुए
उनके अपने भाई बंधु देश कई बर्बाद हुए
अब तो लगता है हमको भी आगे आना होगा सबको राष्ट्र प्रेम का दीपक घर-घर रोज़ जलाना होगा सबको
सब ले लो सौगंध आज भारत माँ का सत्कार करे फौजी ने सीमा रक्षा की हम भीतर से कुछ कार्य करे।
हर वीर शहीद सिपाही को मिल जाए शान्ति सही-सही क्योंकि वह भी रोता है जब खिल्ली उड़ती है कही-कही आजादी मिली बोलने की उसका फायदा उठाते है निर्लज्जो को शर्म नही कुछ भी ये बोले जाते है
पर पता नही गद्दारो को हम चैन से क्यों सो जाते है सैनिक सीमा रेखा पर प्राणो की बलि दे आते है।
कुछ धृष्ट कहे है उनको तो मरने के पैसे मिलते है
हम देते है दुगने तुमको सीमा पर कैसे रहते है
पर पता नही तुमको सीमा पर पैसे नही टिकाते है
वो तो दिल वाले होते है जो हँस के प्राण दे आते है
अब करते है आवाहन हम भारत के वीर युवाओ से
बन-बन कर निकलो देशभक्त छोड़ो घर द्वार विचारो से जागृति कर दो जन जन मे तुम पाश्चात्य जगत के भूलो दुर्गुण
प्राचीन कला को भारत की सेजो तुम फिर से हे अर्जुन ऐसा कर दो जन-जन मे तुम राष्ट्र प्रेम छलका दो तुम भारत के वीर युवाओ मे प्रेम पुष्प खिला दो तुम।
करता हूँ भारत माता को ह्रदय से प्रणाम सखा
दो हमको
आशीर्वाद सदा सबका हो कल्याण सखा।
भारत माता की जय
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः,स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः,सर्वस्वम मे रामचन्द्रो दयालुर्रनान्यम,जाने चैव जाने न जाने
जब प्रेम हुआ मेरे राघव से,तब आँखो मे आँसू आऐ है,
जब-जब मैने उन्हे बुलाया दौड़े-दौड़े वो आऐ है,
उनकी छबि को वांचत-वांचत,तनिक नही हम घबराऐ है,
राघव तोड़े रोज धनुहिया,हम नित-नित नऐ बनाऐ है,
उनके घुँघराले से केसू, देख-देख हम भरमाऐ है,
राघव को है जब भी बुलाया,दौड़े-दौड़े वो आऐ है,
मेरे राघव ने जब भी,ध्यान भजन करने की ठानी,
तब-तब उनके संग मे मैने, भजन,सवैये,छंद गाऐ है,
राघव घुँटुअन जब चलते थे,चौदह भुवन रमण करते थे,
उनके नन्हे से हाथो से मैने चांटे बहु खाऐ है,
देखो राघव देख रहा मै, आँखो को हूँ सेंक रहा मै,
आ जाओ हे अजिरबिहारी,कब से तुमको टेर रहा मै,
आओ खेले बृज की होली,आओ खेले रंग की होली,
आओ खेले उर अंतर से,दुनिया की शम्मा है सुनहरी,
आओ खेले मन्वंतर से,आँखो-आँखो के अंतर से,
साँसो से साँसे मिल जाऐ, आओ खेले उस तंतर से,
आओ खेले शिव मंतर से,आओ खेले जुग अंतर से
जलते हुऐ बंगाल को उद्भासित करती रचना
सुन सकते हो तो सुन लेना,
भारत माँ के कायर बेटो,
उस सुरा, सुन्दरी, यवनी के,
सुख मे डूबे कायल बेटो,
मै बिलख-बिलख कर रोई हूँ,
तुम तक आवाज़ नही पहुँची,
कायरता है झलकी तुममे,
ऐसी औलाद नही देखी,
क्या भूल गऐ हो तुम अपने,
आज़ाद,भगत और राजे को,
क्या भूल गऐ हो तुम अपने,
प्रताप और सेनानी को,
क्या याद नही तुमको उनकी,
जिसने आज़ादी दिलवाई,
क्या याद नही तुमको उनकी,
जिसने भूखे लड़ी लड़ाई,
मुन्नी,शीला के अफसानो मे,
लगता है तुम भी चूर हुऐ,
तेरे घर मे हिन्दू मुस्लिम,
जैसे दंगे भरपूर हुऐ,
काश्मीर से गोहाटी तक,
बंग्ला से हल्दीघाटी तक,
ऐसा कोई प्रान्त नही है,
जहाँ न दंगा होता हो,
तू-तू मै-मै के चक्कर मे,
दिल भारत का रोता हो,
बंगाल जहाँ पर ज्ञान और,
मानवता का शुभ संगम हो,
बंगाल जहाँ पर नैतिकता के,
साथ-साथ गुण अर्जन हो,
है बंगाल वही जहाँ पे,
टैगोर संत विद्वान हुऐ,
वो ही तो ऐसी धरती है,
जहाँ पर संत महान हुऐ,
ऐसी धरती के अंचल मे,
कुछ ऐसे बीज वो दिऐ है,
मानवता की नैतिकता के,
जिसने अर्थ खो दिऐ है,
और जहाँ पर आज नित्य,
व्यवहारिक ज्ञान खो गया हो,
हिन्दू मुस्लिम के चक्कर मे,
जंगलराज हो गया हो,
आपाधापी के चक्कर मे,
स्वराज खो गया हो,
इतना कहना है तुम सबसे,
बंगाल के बाघ महान बनो,
नैतिकता के साथ-साथ,
अपना सागर संसार रचो,
अपने भारत की भूमि को,
तुम नित्य-नित्य सिंचन कर दो,
भारत माता के आँचल को,
खुशियो के फूलो से भर दो,
अपनी भारत के चक्कर मे,
विश्वास सत्य संसार गढ़ो,
भारत के दीर्घ शिखाओ को,
तुम अपने मन से पार करो।
गीता का सँदेश सुनाने हम मथुरा से आये है।(यह लेखन तब का है जब इंदौर मध्यप्रदेश मे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का 62वाँ अधिवेशन हुआ था,वहाँ के लघु भारत को देखकर मेरा वैचारिक सागर मंथन करने लगा था)
गीता का संदेश सुनाने हम मथुरा से आये है,
भारत को समृद्ध बनाने हम मथुरा से आये है,
देशप्रेम की अलख जगाने हम मथुरा से आये है,
वही भूमि है जहाँ जमुन की धारा कल-कल करती है,
वही भूमि है जहाँ कंस की कारण मरण स्थली है,
वही भूमि है जहाँ प्रेम की नदिया कल-कल करती है,
वही भूमि है जहाँ राधिका जन-जन के मन बसती है,
वही भूमि है कुञ्ज गलिन मे जहाँ श्याम संग राधारानी रमण करे,
कान्हा की वँशी जब बाजे लोक-लोक मोहित कर दे,
उसी भूमि से आये है जहाँ कृष्णचन्द्र अवतार हुआ है,
भक्तिसुधा औ प्रेमसुधा ने जन-जन के तन मन को छुआ है,
प्रेमसुधा का पान कराने हम मथुरा से आये है,
श्रीमद्भगवत गीता से नीति बतलाने आये है,
रसिक बिहारी की रचना प्रख्यात विश्व भूमण्डल है,
सुर और बृज की गाथाऐ,गाता भारत का जन-जन है,
जन-जन को रसिको से मिलाने हम मथुरा से आऐ है,
शाम नाम की वँशी से तन मन हर्षाने आऐ है,
गीता का सँदेश सुनाने हम मथुरा से आऐ है,
देख-देख अधिवेशन को है मेरा तो अनुमान सही,
पूरा भारत नन्दलाल लगे वनिता भारत की कृष्णसखी,
आज हमारे भारत को अवसर सर्वज्ञ मिला ऐसा,
तुम चाहो तो ऐसा करदो जैसा दुनिया ने न देखा,
तुम चाहो तो बुद्धिबल से इतिहास बदल दोगे यारो,
तुम चाहो तो निज भुजबल से इतिहास बदल दोगे यारो,
तुम चाहो तो मान प्रतिष्ठा का कुछ नया दृश्य दिखला दोगे,
भारत को विश्वगुरु फिर से तुम चाहो तो बना दोगे,
शक्ति का वरदहस्त तुमपर,है भारत माँ का प्यार तुम्हे,
फिर परिषद से भी प्यार मिला,मानवता का संसार तुम्हे,
तुम अपने-अपने निज कौशल से भारत को सजा दोगे यारो,
संकल्पित राष्ट्र धरोहर को तुम फिरसे संजो दो न यारो,
अपनी शक्ति को एकीकृत कर भारत को बदल दो न यारो,
सम्पूर्ण विश्व भूमण्डल पर परचम फहरा दो न यारो।
वर्षो की याद पुरानी है इसमें भी नई कहानी है
जब बीत बुढ़ापा जाता है आनी इक रोज़ जवानी है
श्यामलता कोमलता आँखे आँखे
काला काजल बतलाता है सुन्दरता है निर्मलता है,
है यम है कृष्ण श्याम ललिता निशि काली है कोमलता है
आनन्द हुआ निर्मल पावन,सबकुछ जगती पावन मिलता
श्यामलता है कोमलता है कैसे कह दूँ ओ श्यामसखा,
इतनी बाते सबकी बाते आँखे आँखे आँखे आँखे
कर जाता है कोई सुन्दर निर्मल कोमलता की बाते।
सबसे सुन्दर जग प्यारा है आसान है होने वाला है
कैसे कह दूँ निर्मल तुमको क्या श्यामसखा मतवाला है
क्या आँखो के समन्दर मे बहते,उन धागो के साये बहते,
क्या हुआ? समन्वय सुन्दर से धागो के धागो मे बहते।
हम अपनी निर्मल रचना से ख्वाबो के ख्वाबो मे बहते
हम सब मिल जाते रत्तीभर कैसे कहते धागे बहते।
हर निशा रूप अँधियारी सी,कैसे रत्तीभर रह सकती
जीवन वाले जीभट वाले आकाओ के सुख सह सकती
आनन्दमयी ललिता का घन सुन्दर है श्याम सलोना है
हिमता आतपता को कहते सुन्दर श्री जी है छौना है।
क्या कही ललित उस साखी से,कोमलता से अनुरागी से
आतपता हिम आच्छादित भी उस ललित सखी उस साथी से
क्या कैसा निर्मल कोमल है जब जड़ता के अनुराग नही
फिर कैसा कोई प्रेम भला जब मानवता के गुणगान नही
क्या कहूँ शिखाओ से रत्तीभर,ये भरमाया करती है
कैसा भी हिम आतप उमड़े मेघो से बाते करती है
इस ओर जगत का धर्म बढ़ा उस ओर मनुज भरमाया है
जिस ओर बहा गंगा का जल हिम हरित स्वर्ग फिर छाया है।
क्या कह सकता अनुरागी हो,मन तो पल-पल पर बागी हो
हो गया वही फिर कर्म भला खुल गई ताले से चाभी हो,
क्या घोर निराशा से अंतर्मन मे नैराश्य हुआ पैदा
क्या घोर पिपासा से मन के भीतर का है सागर सूखा।
सागर सूखा अच्छा ही था,गंगा भी सूख गई प्यारे
कैसे वो निहारे नैनो से,कैसे हम उसको दुत्कारे
हर सभा मध्य मे ये रोना मानव का लगा ही रहता है
तेरा मेरा-मेरा तेरा तू-तू मैं-मैं कुछ कहता है
क्या कहता है जग भ्रान्त हुआ,वैधव्य हुआ जग को भी है
भीतर से कितना भी कठोर,श्यामलता कोमलता भी है।
श्यामलता से कोमलता से आँखो से और सभ्यता से
मन तो भरमाया करता है, विघ्नो से बाते करता है
कैसे हरता मैला मन का तन का कुछ शोध करे है
कैसे रह सकता पागल सा वह कबसे तेरी राह तके है।
जब कुछ बोले है त्रिपुर सुगम मन की बातो का ज्ञान करो
जो हो जाऐ उसको लेलो फिर सुभग सिन्धुरस पान करो।
ऐसी जल्दी ऐसी हल्दी ऐसी क्या पाबन्दी होगी
अपने मन के दीदारो की अपनी वो जुगलबन्दी होगी
हर एक सखा से पावन से,पावनता के उस सागर से
अपने हर एक उजागर से,जग के वैभव के सागर से
क्या एक बार कुछ हुआ व्यर्थ जीने पाने का और कृत्य
फिरसे क्या ज्ञात करेगा क्या,जीवन का पाठ पढ़ेगा क्या
अपने आधार सुगम्य बने,क्यों पारावार प्रणम्य बने
सुख-वैभव की आधारशिला,कैसे रख सकता जीव भला
क्या वह फिर से झुक सकता है,कायर कृतघ्न कर सकता है
आसान हृदय अपना भी है पर्वत का एक झरना भी है
मन बड़ा चतुर है सुधागम्य, कैसे हो सकता है पावन
क्या आगाज़ो के सिन्धु पड़े अपनी ही महिमा मे जोते
अपने जैसे प्रणमम्य बने कैसे करते कुछ और भले
आसान हृदय अपना ही है आतपता कोमलता भी है
हर एक भवन की लाली है श्यामलता की रखवाली है
कोमल है, क्या ममता उसने माँ जैसी है क्या काली है
आसान मधुप मणिधर सुन्दर कैसे बीता सागर सा मन
फिर फिरसे प्राप्त हुई तृष्णा जिसका जो भी जीवन वो मन
फिरसे कुछ कहता रहा सदा,लहरो मे बहता रहा सदा
अपने आचारो से जीवनभर किसको क्या कहता रहा सदा
आघात हो गया क्या अपना,जीवन की बुरी दशा बदली
आने वाले अपने सारे जीभट वाले अनुरागी है
कहते क्या गीता वाले है संसद मे सब बेमानी है।
क्या कहूँ विचारो की सुन्दरता और श्यामलता को
आँखो देखी बातो को कह दूँ समरसता को
अपने पयवृन्द जमाने से साऐ मे रहते रहे सदा
गंगा मईया तेरा गंगाजल सदियो तक बहता रहे सदा
आकर के सुन्दर वनमाली तृष्णा आघात करेगी क्या
छुपकर देखे वी माली हो अपने हृदय धरेगी क्या
कहदो-कहदो वन उपवन से वो स्वछन्द बहारो मे खेले
अपने अन्तर की सुंदरता से रहते है बासन्तिक मेले।
वैचारिक वैभव
मेरे अन्दर क्या है सुनलो तुम सबको मै बतलाता हूँ,
जीवन के जो भी पृष्ठ लिखे उनको मै ध्यान दिलाता हूँ
आकर के उन आनन्दो मे जो भी सृष्टि कर जाता है
सुनलो आकर ओ आर्यव्रते जीवन आनन्द बनाता है
उन आनन्दो के जीवन मे घर-घर का दृश्य बनाता है
सुनता है शीतलता को जो फिर से रो-रो आता है।
आघात हृदय करवाता है वो तीक्ष्ण स्वपन आनन्द भरा
अपनो को भी भा जाता है वो तीक्ष्ण स्वपन आनन्द भरा
क्या करके जाता है पागल वो सूक्त स्वपन आनन्द भरा
क्या मै भी हँस-हँस जाता हूँ वो काल स्वपन आनन्द भरा
क्या उनको भी आकर के तुम कह दो जीवन दिनकर मधुकर
क्या उनको भी आकर के तुम कहदो हे भ्रात स्वपन सुनकर
देखे तो मैने बहुत स्वपन पर सुना स्वपन को कभी नही
आती है कैसे हँसी सुनो वो एक निरंतक स्वपन नही।
जैसे-जैसे काले बादल आते है और चले जाते,
वैसे ही भाषा की रजनी मे बहुतेरे वाक्य है खो जाते
क्या तुम्हे बताये करुणाकर क्या तुम्हे पल्लवित हृदय करे
आसान हुआ क्या पृष्ठो मे, जो तुमसे कहे विनय कर ले।
आ जाऐ या की चले जाऐ क्योंकर के हम कह जाऐ कुछ।
(२)
जीवन मे वो बसते ही रहे,जो ठहरे थे वृन्दो के दिन
आघात हुआ रजनी फैली स्वछन्द किया उन सपनो को
कर लिया प्रयत्न पकड़ने का हो गया कही मिल गया कही
अब मिलकर निर्णय करते है क्या तुमको खोकर जाऊँगा
अब बैठ बैठकर लिखते है क्या तुमको भोग के जाऊँगा
क्या धरा मिली पृथ्वी माँ निर्णय आसान कृत्य कर देती है
इतना है धैर्य प्रभु जी मे जो उनको शक्ति देती है
क्या उनको कोई कार्यभार मिलकर करता है दीर्घबन्ध
क्या उनको कोई शब्दघात मिलकर करता है दीर्घबन्ध
क्या उनको खोकर के आदर तुमको मिलता है कहो भरत
क्या उनको पाकर के तुमको सम्मान मिला है कहो भरत
कह डालो सबकुछ दृढ़ता से सबकुछ तो हम सह जाऐगे
होगा जब दीर्घ सवेरा सा भगवा वाले तब आऐगे
मिल जाऐगे आनन्दो मे वो भी तुमको मिल जाऐगे
जब हृदय प्रफुल्लित गातो मे क्या वो मुर्झाते जाऐगे।
आ जाने दो दिनकर को,फ़िर एक कबन्ध लिखे
वो तो लिखता है सबकुछ पर क्यों न हम फिरसे छंद लिखे
हे राम तुम्ह अब बतलाओ क्या अब भी हम स्वछन्द फिरे?
(३)
कुछ तुमको बतला देते है हँसकर के समझा देते है
अपने मन के धागो से हम दुनिया दिखला देते है
क्या कहते है दुनिया वाले उनके भी रंग दिखला देते है
वो पुण्य पल्लवित करती है आघात नही वो करती है
ठहरी-ठहरी सी रहती है कुछ बाते कल छल करती है
क्यों कहते उसकी अग्नि है ज्वाला की भाँति दमकती है
अनुशासन से वाकिफ़ होकर वी कृत्य फिर नऐ करती है
फिर और सम्हलती है रजनी कहने की करुणा करती है
उन बंकिम-बंकिम नयनो से वो फिर से नही सम्हलती है
बेकार हो गया हृदय मेरा सेवा भाव से भरती है।
रो रोकर के वो कहती है तब और तरसने लगती है
आनन्द हृदय करती वो जब तब फिर से कट छट बनती है।
मिल जाता है साम्राज्य जतन कैसे दुनिया से भरती है,
आधी रजनी बीती निष्फल क्या कोई मित्रता करती है
हम और आप मिल जाऐ अगर क्या कही निशा छँट सकती है
आता देखा उनको मैने कैसे करके हट सकती है
अग्नि है मन की अग्नि है मेधा से वो छिप सकती है
हमसे वो प्रश्न नही करती अग्नि अंतर से करती है
आँखे जिनको रख लेती है वो नही निकल फिर सकती है
आधी रजनी बीती थी फिर कैसे वो फिर कट सकती है।आनन्द बना जगती जग का हँस-हँस के वो कट सकती है
हो जाऐ उनसे निर्णय तब फिर कैसे-कैसे छँट सकती है
आँधी है आँधी भोर निशा की अँधियारी छँट सकती है
कैसे कह सकती पागल,पागल मन से हो सकती है।
क्या कहूँ जगत वालो विस्मय अँधियारो से लड़ सकती है
आँखो मे कह दूँ सत्य निरा झूठा सपना छिप सकता है
हो गया असत्य अगर वो भी तो कैसे फिर फिर सकता है।