इस लेख का उद्देश्य सामाजिक-विमर्श, अस्मिताओं के टकराव से बचते हुए, आत्मसम्मान की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाँ को सामने लाने का प्रयास है।यह लेख उनके लिए मददगार होगा, जो अपनी जिंदगी दूसरों के उसूलो पर जीने से बेहतर, अपनी जिंदगी अपने उसूलो एवं स्वाभिमान से जीना चाहते है।
वर्तमान स्थितियों में किसी भी समाज की उन्नति एवं विकास में जाति किसी भी रूप से बाधक नहीं रह गई है, किन्तु फिर भी कुछ लोग आज भी मानसिक गुलाम है। मनु स्मृति, ब्राम्हणवाद का तो विरोध करते है, किन्तु उनके द्वारा रचित चक्रों में अभी भी उलझे हुए है, गुलामी एवं “जय अन्नदाता” उद्घोष वाली मानसिकता से बहार निकलने के बजाय अपनी आने वाली पीढ़ियों पर भी यह बौद्धिक आतंकवाद थोप रहे है।
विषय वस्तु में प्रवेश करे तो समझ आएगा की एक जाति जो कुम्हार/ प्रजापतियों की एक उपजाती के रूप में जाने पहचाने जाते है, किन्तु अपने आपको कुम्हार / प्रजापतियों से अधिक समृद्ध मानते है, अपना स्तर कुम्हारो से ऊपर स्थापित करने की जद्दोजहद में अपनी उत्पत्ति को राजपूतो से जोड़ते हुए अपने आपको उच्च कुलीन प्रस्तुत करने की लिए "मारू कुम्बार" स्वरचित इतिहास का सहारा लिया है, यह कोई पहली घटना भी नहीं है जब किसी जाति ने अपने आपको उच्च कुल से जोड़ने के लिए ऐसे स्वरचित इतिहास का सहारा लिया हो।
स्वरचित इतिहास का दौर जब से आरम्भ होता है, जब भारत में उपनिवेशवादी सत्ता ने अपने शासितों पर सुचारु रूप से शासन करने के लिए ‘कॉलोनियल डाक्यूमेण्टेशन प्रोजेक्ट’ के तहत जनगणना एवं गजेटियर्स के माध्यम से भारतीय समाज में जातियों की सामाजिक अवस्थिति का सर्वे कर उन्हें लिखित कर एक अपरिवर्तनशील (फिक्सड) सामाजिक अवस्थिति में तब्दील करने लगी, तो इस भय से कि जब एक बार जाति की जो हाइरेरकिकल अवस्थिति तय हो जाएगी, वह बदल नहीं सकती, अनेक जातियों ने अपनी नयी पहचान के दावे करने प्रारम्भ किए।
औपनिवेशिक प्रलेखन परियोजना’ ने ऐसी स्थिति पैदा की जिसमें निचली एवं पिछड़ी जातियों की अवस्थिति में गतिशीलता आई एवं वे अपने को उच्च क्रम में होने के दावे कर सके। सदियों से नीचे के पायदान पर ठिठके सामाजिक समूहों को अपने महत्त्व को सिद्ध करने का लगभग पहली बार मौका मिला था। हालाँकि यह देखना रोचक होगा कि निचली जातियों की इस स्व लिखित इतिहास ने उनके आज की अस्मिता के लिए क्या योगदान किया एवं क्या समस्याएँ पैदा कीं।
1907 ई. में प्रकाशित निषाद वंशावली प्रसिद्ध आर्य समाजी देवीप्रसाद द्वारा लिखी गई थी;
1912 ई. में आर्य समाजी मथुरा प्रसाद द्वारा रचित ‘महालोधि विवेचना’ नागपुर से प्रकाशित हुई।
1918 ई. में फरूखाबाद से श्री सत्यव्रत शर्मा द्विवेदी ने ‘तेलि वर्ण प्रकाश’ की रचना की ।
1890 नाई वर्ण निर्णय’ ज्वालापुर गुरुकुल महाविद्यालय के मुख्य अध्यापक श्री रेवती प्रसाद ने रचा था ।
इसके अतिरिक्त पासी, दुसाध मेहतर इत्यादि उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास लिखा गया इन सब की विषेशता यह रही की इन सभी ने अपना रिश्ता क्षत्रिय अथवा ब्र्ह्मण से ही जोड़ा । 1891 के बाद निचली जातियों के इतिहास में प्रायः उन्हें उच्च ब्राह्मणीय सांस्कृतिक मूल्यों से युक्त महाकाव्यों के ऋषियों एवं नायकों के वंश से जोड़कर संस्कृतिकरण की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। 1923 में प्रकाशित ‘नायिवर्ण निर्णय’ इसका एक नमूना है। इन्होने नारद मुनि की भी जाति निर्धरित कर दी एवं यह सिद्ध करने का प्रयास किया की नारद मुनि बर्ह्म की संतान थे एवं नाई जाति के थे।
उक्त रचे गए निम्न जातियों के जातीय इतिहास की मूल प्रवृत्ति अपने आपको क्षत्रिय/ ब्र्ह्मण कुल से उत्पन साबित करना तथा उच्च जातीय षड्यन्त्रों का शिकार हो पीछे रह जाने की पीड़ा एवं अपने अतीत की उच्च स्थिति से षड्यंत्र द्वारा अपदस्थ कर दिए जाने का बार-बार हवाला दे अपनी जाति को उच्च कुलीन स्थापित करना था।
उपरोक्त सभी जातियों के उद्धरण मेने उत्तर प्रदेश से लिए है, क्योकि यह राज्य राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण बिंदु है, यह मेरा सौभाग्य भी है की मेने जीवन के काफी वर्ष लखनऊ में गुजारे एवं इस परिवर्तन श्रृंखला को करीब से समझा है। राजस्थान में भी ऐसे उद्धरण है, जैसे:-
चमार:- “हिन्दू चर्ममारी जाति एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी। जिसके अनुसार यह चंवर वंश के क्षत्रिय हैं। संत रविदास की प्रसिद्धी से घबरा कर सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा, किन्तु सदना फकीर रविदास से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त हो गया। जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया।
बलाई :- बुद्धम् पब्लिशर्ज़ के लेखक को मेघवंश समाज की वंशावली का बखान राव की प्राचीन बहियों में सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ मिलता है। जिन्हें राव सा आकर घरों में ‘पाठ’ बैठाकर वंशावली वांचते थे, समाज के लोग उचित दक्षिणा देकर राव महाराज की सम्मान पूर्वक विदाई करते थे। राव की प्राचीन बहियों से ज्ञात होता है कि आज का मेघवंश अतीत में महाप्रतापी, विद्वान व कुशल बौध शासक था, जिसने उस काल में प्रेम, दया, करुणा व पंचशील का प्रचार किया। इनके पूर्वज बौद्ध शासक थे। आक्रमणों के दौर में अहिंसा पर अत्यधिक ज़ोर देने से उनका पतन हुआ। कालांतर में युद्ध हारने के कारण इन्हें गुलाम और सस्ते मज़दूर बना लिया गया।
और भी कई उद्धरण है सभी का जिक्र करना यहाँ संभव नहीं है, किन्तु आप देख सकते है चमार बैरवा बन गए, बलाई मेघवाल बन गए कुछ अन्य जातियों ने अपना इतिहास तो छपवाया किन्तु जाति का नाम नहीं बदला। इन सब की विषेशता यह रही की इन सभी ने अपनी वंश परंपरा राजपूतो से अथवा ब्र्ह्मणो से जोड़ी एवं राव की वंशवलियो को ही आधार बनाया गया।
इसी प्रथा का अनुसरण करते हुए कुम्हारो की एक उपजाति ने अपना इतिहास "मारू कुम्बार" के नाम से सन् 1975 में प्रकाशित करवाया, जिसमे इन्होने अपने आपको राजपूतो से अलग होकर एक नयी जाति "मारू कुम्बार" का निर्माण हुआ बताया गया है। इस इतिहास को प्रमाणिक सिद्ध करने के उद्देश्य से कई घटनाओं को तिथि एवं संवत सहित उल्लेख किया गया, किन्तु वास्तविकता में यह सब गलत पाई गई इस इतिहास की सबसे बड़ी कमी यह रही की इसमें वर्णित कोई भी तथ्य समकालीन लिखित इतिहास पुस्तकों में कही दर्ज नहीं है एवं लेखन शैली किसी इतिहास की ना अपना कर किसी उपन्यास के लेखन शैली का उपयोग किया गया है, जो इसकी प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्न लगाती है।
अब आगे में उन तथ्यों का विश्लेषण करना चाहूंगा जिन दलित जातियों ने 1900 के आसपास अपना इतिहास लिखवाया उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ा। इन सभी दलित जातियों ने अपने इतिहास में ब्र्ह्मण अथवा क्षत्रियो से जोड़ा एवं अपने क्रम को ऊपर उठने का प्रयास किया। भारतीय अस्मिता के इन दावों के चलते अनेक जातियो में परस्पर वैमनस्य एवं टकराव पैदा हुआ। निचली जातियाँ जब अपने को उच्च कुलशील बताकर अपना संस्कृतिकरण कर ऊपर के क्रम में जाने की कोशिश करने लगीं तो पारम्परिक रूप से उच्च अवस्थिति पर बैठी जातियों को यह नागवार गुजरा और उन्होंने ऐसे दावों का विरोध करना शुरू किया। 1890 के बाद ऐसे अनेक जातीय दावों पर आधारित टकरावों की नामजद रिपार्ट दर्ज हैं।
अब यह प्र्शन आता है, की किसी भी जाति ने अपने आपको क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण से जोड़ा तो क्या उनको ब्र्ह्मण या क्षत्रियो ने मान्यता दी ? अथवा अन्य समुदायों ने उनको ब्र्ह्मण /क्षत्रिय के रूप में मान्यता दी?
बैरवा, मेघवाल, निषाद अपने रिश्ते क्षत्रिय से जोड़े अथवा ब्र्ह्मण से किसी अन्य समाज ने उनको पुराने रूप में कभी स्वीकार नहीं किया।
रावों की वंशावलियाँ एवं अन्य पुराणों के श्लोको से इतिहास प्रस्तुत किये जाने के बाद भी इनके रहन -सहन, जीवन स्तर में कोई परिवर्तन नहीं लाया जा सका अन्य समाज द्वारा इनका मज़ाक ही बनाया गया, फलस्वरूप इनके आत्म-स्वाभिमान में और गिरावट आई। इतिहास में ऐसा एक भी यह उदहारण नहीं मिलेगा जब किसी जाति ने अपने किसी वर्ग को जाति से बहिस्कार कर दिया एवं उस बहिस्कृत वर्ग ने अपने नई जाति बना ली तो पुनः उसे स्वीकार कर लिया हो।
अब में चर्चा करता हुँ सन् 1960 (उत्तर प्रदेश ) के कालखण्ड की इस दौर में फिर से जातीय इतिहास रचे गए कुछ बुद्दिजीवी सामाजिक कार्यकर्ताओ को यह समझ आ गया था की इतिहास में ब्राह्मणीय मिथक, प्रतीकों एवं परम्पराओं को तोडना पड़ेगा एवं उनकी अपनी लोक-स्मृतियों से उपजा लोक-इतिहास उनकी असमिता के वृक्ष को और ज्यादा मजबूत करेगा। इन बुद्धिजीविओ ने समझ लिया था ब्रह्मणीय अथवा क्षत्रिय पहचानों में संघर्ष है, किन्तु अन्य समुदायों के बीच स्थायी हो चुकी पहचान को लेकर ही आगे बढ़ना पड़ेगा। इस दौर में राजनितिक वातावरण भी ऐसा बन चूका था, की जाति की सर्व मान्य परिभाषा बदले बिना भी समाज को गति दी जा सकती है ।
1984 में उत्तर प्रदेश में बी.एस.पी. के गठन के बाद एवं बहुजन आन्दोलन के नव उभार के असर के कारण भी बड़े पैमाने पर निचली जातियों ने अपने जातीय इतिहास लिखे। फर्क यह था कि पूर्व में जहाँ उनके जातीय इतिहास पर आर्य समाजियों एवं औपनिवेशिक नृत्तत्त्व शास्त्रियों ने किया था, वहीं इस बार वे खुद उन्हीं के समुदायिक बुद्धिजीवी उनका इतिहास रच रहे थे।
बी.एस.पी. स्वयं भी अपने अनेकों ‘डाक्युमेंट्स’ में दलितों के जन स्तर पर ऐसे सचेत करने वाले साहित्य लिखने की अपील करती रही है। ऐसे साहित्य के निम्न लक्ष्य निर्धारित किए गए—
1. ऐसा साहित्य जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े उपेक्षितों की मानवीय त्रासदी एवं समस्याओं को सामने लाए।
2. जो साहित्य, समानता, न्याय, स्वतन्त्रता पर आधारित समाज बनाने में भूमिका निभाए।
3. जातियों एवं समुदायों के इतिहास को खोजकर एवं रचकर उनके मध्य आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास पैदा करे।
4. दलित जातियों के नायकों के जीवन चरित लिखे, प्रकाशित एवं प्रसारित करे ताकि दलित जातियाँ उनके संघर्ष एवं जीवन से प्रेरणा लेकर वर्तमान समय से अपनी बेहतरी के लिए संघर्ष कर सकें।
इस प्रकार दलित के लोकप्रिय साहित्य का आधारभूत एजेण्डा दलितों के मध्य उनकी असमिता की रचना करना, उसे नई सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप पुनः संस्कार देना रहा है। इनका एक महत्वपूर्ण प्रयोजन दलित जातियों की अस्मिता रचना के लिए ऐसे साहित्यिक एवं बौद्धिक संस्रोत उपलब्ध कराना ताकि वे अपनी रचना के लिए ऐसे साहित्यिक एवं बौद्धिक सम्पदाओं द्वारा निर्देशित न हों एवं दूसरों के द्वारा आकार दी गई अस्मिताओं को नकार कर अपनी आत्म छवि खोज एवं रच सकें। ऐसे साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ब्राह्मणवादी साहित्य के ‘प्रति साहित्य’ की रचना भी है।
इन लोकप्रिय पुस्तिकाओं में आपको आत्मकथाएँ नहीं मिलेंगी। आत्मकथाओं की जगह दलित नायकों, इतिहास पुरुषों एवं सन्तों की जीवनियाँ बहुतायत में छपती एवं बिकती मिलेंगी; सामाजिक आलोचना, भेदभाव एवं सामाजिक व्यवस्था को बेपर्द करने वाला साहित्य, नाटक एवं वैचारिक साहित्य इत्यादि इनमें शामिल है। आत्म चिन्ता की जगह सामाजिक एवं ऐतिहासिक चिन्ता दलित लोकप्रिय साहित्य की मूल प्रवृत्ति है। माइकल स्वारट्लर ने इन्हें ‘अछूतों के प्रतिरोध का साहित्य’ कहा है। इन लोकप्रिय पुस्तिकाओं में सबसे ज्यादा जातीय इतिहास, दलित संघर्ष एवं संत गुरुओं की ऐतिहासिक जीवनियाँ मिलती हैं।
राजवैद्य माता प्रसाद सागर, जी.पी. प्रशान्त, हंस, भवानीशंकर विशारद, राजकुमार पासी ऐसे अनेक लेखकों की सस्ती पुस्तिकाएँ मेलों, फुटपाथों दलितों की राजनीतिक रैलियों में बिकती मिल जाएँगी। लक्ष्य संधान प्रकाशन, बहराइच, सागर, प्रकाशन, एटा, कुशवाहा प्रकाशन, इलाहाबाद आनन्द साहित्य सदन, अलीगढ़, अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना, कल्चर पब्लिशर्स, लखनऊ लोकप्रिय दलित साहित्य छापते एवं बेचते रहे हैं। कई शहरों में तो ‘बहुजन चेतना मंडप’ बने हैं। जहाँ सिर्फ दलित लोकप्रिय साहित्य ही बिकता है।
मेने यह सभी उद्धरण इसलिए दिए है ताकि आप स्वयं इन जातीय इतिहास की पुस्तिकाओं का समाज एवं उनकी प्रवृत्तियों में आए परिवर्तन का अध्ययन कर सके। जब समाज को ऐसे इतिहास परोसे गए जिससे उनकी उत्पत्ति किसी उच्च वर्ण ब्र्ह्मण/ क्षत्रिय से जोड़ा गया तो, समाज उन्नति नहीं कर सका, झगडे -फसाद हुए, एवं इन उन्नत जातियों ने भी प्रहार करते हुए इनके प्रत्येक मत का खंडन किया।सत्य प्रमाणित करने के लिए जितने तर्क दिए गए, खंडन करने के लिए उससे ज्यादा प्रमाण दिए गए। इसके विपरीत जब लोक -स्मृतियों में व्याप्त इतिहास एवं समाज में उत्पन्न महान पुरुषों के जीवन का साहित्य प्रस्तुत किया गया तो सामाजिक विकास ने नई करवट ली, अपेक्षित समुदाय आत्म सम्मान पा सका।
मारू कुम्बार इतिहास पुस्तक वर्ष 1975 में प्रकाशित हुआ था, किन्तु आमजन द्वारा इसे स्वीकार नहीं किया गया फलस्वरूप इसका प्रचार एवं प्रसार व्यापक रूप से नहीं किया गया। अब जब जातिगत विभेद के अर्थ नहीं रह गए एवं इन परिस्थितियो में जब समाज को उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संगठन की एवं अन्य समाज से परस्पर सामंजस्य की आवयश्कता थी, तब श्री बागोरिया ने इस इतिहास को पुनः अपने नाम से प्रकाशित किया है, जो कई सवाल खड़े करता है।
मेरे सम्मानित बन्धुओ कुछ दलित जातियों ने तो अपना इतिहास इसलिए लिखा था की उन्होंने अछूत, अस्पृश्य होने का जो दंश झेला था, वह मानसिक संताप वह अपनी नई पीढ़ी को नहीं देना चाहती थी एवं उनको अपनी जाति के प्रति ग्लानि के भाव भी थे।
आप जिस भी जाति से रहे हो आपको कुम्हार / प्रजापति नाम से ही जाना जाता है, अन्य समाजों के द्वारा भी इसी रूप में स्वीकृत है, आप स्वयं यह कथन करते है की हमारे काफी बंधू अज्ञानतावश कुम्हार / प्रजापति बने हुए है। आपके जो बंधू गलती से प्रजापती बने हुए है, वे अपनी रिश्तेदारियां भी प्रजापती समाज से ही कर रहे है उनकी ३०-४० पीढ़िया बीत चुकी अब तक यह लोग प्रजापती समाज को पूर्ण रूपेण एक दूसरे में समाहित हो चुके है।
फिर भी आपको यह विश्वास है की मारू कुम्बार एवं कुम्हार/ प्रजापति दोनों अलग-अलग जातिया है, तो निश्चित रूप से आपको अपनी स्वतंत्र पहचान का निर्माण करना चाहिए। किन्तु आप अपनी स्वंत्रत पहचान का निर्माण कर पाने में असमर्थ महसूस करते है, श्री बागोरिया जी को अपने पर एवं अपनी टीम की क्षमताओं पर भरोसा नहीं है, की यह अपनी एक स्वतंत्र पहचान स्थापित कर सके अतः इनकी सामाजिक चेतना यात्रा 2015 तक मारू-कुम्बार के नाम से चलती रही, किन्तु 2015 में आपने आपको “क्षत्रिय कुमावत” घोषित कर दिया। यह जानते हुए भी की “क्षत्रिय कुमावत” समाज पहले से अस्तित्व में है। आपको क्षत्रिय कुमावत शब्द के प्रयोग की कोई नैतिक एवं वैधानिक अधिकारिता नहीं थी, किन्तु आपने अपने छद्दम उदेश्यो की प्राप्ति के लिए क्षत्रिय कुमावत शब्द का प्रयोग किया।
जो संगठन समाज सेवा के लिए, समाज को संगठित एवं सर्वांगीण विकास के लिए बना हो, उस संगठन में इतना नैतिक बल तो होना ही चाहिए की अपने समाज को अपनी एक स्वतंत्र पहचान स्थापित कर सके, अन्य समाजों से समन्वय बना सके। आपने अवैधानिक रूप से "क्षत्रिय कुमावत" शब्द का प्रयोग करके कुमावत समाज से तो वैमनस्य कर ही लिया। साथ ही यह भी स्वीकार कर लिया की संगठन का इतना सामर्थ्य नहीं है जो अपनी खुद की पहचान स्थापित कर सके।
आपकी कार्यप्रणाली से प्रतीत होता है, आपके संगठन के एकता, विकास, आत्मसम्मान जैसे कोई उदेश्य नहीं रहे है, अपितु ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कुम्हारो का एक वर्ग जो आर्थिक रूप से उन्नति कर गया है, एवं उनका जीवन स्तर धनाढ्य वर्ग जैसा हो जाने से अपने आपको कुम्हार कहलवाने में संकोच का अनुभव करता है, वे ऐन-केन प्रकार से अपनी जाति बदलना चाहते है, आपका संगठन उनको यह जाति परिवर्तन की सुविधा प्रदान कर रहा है।
आपके फैलाए इस बौद्धिक भ्र्म से नव धनाढ्य वर्ग के उदेश्य शायद पुरे हो जायेंगे, किन्तु युवा पीढ़ी जो यह समझते भी है, की यह इतिहास प्रमाणिक नहीं है, किन्तु उनकी क्षत्रियो के प्रति मोह एवं राजपूत कुल से जुड़ने की प्रबल इच्छा के कारण इस इतिहास की आँख बंद कर जय जयकार कर रहे है।
आपने बहुत ही नाट्कीय रूप से इनको राजपूतो से जोड़ते हुए उनकी भावनावो को भड़का कर उन्माद पैदा किया है, इस उन्माद में युवा जय अन्नदाता के उद्घोष वाली मानसिकता, जो “जय राजपुताना” का नारा तो बुलंद कर सकते है. किन्तु अपने समाज को बुलंद नहीं कर सकते है।
उपरोक्त वर्णित अन्य जातियों ने अपने आपको क्षत्रिय/ ब्राह्मण वंश से जोड़कर जो गलती की उसके परिणाम उन्होंने देख लिए, एवं अपने नए इतिहास लिख कर उनकी जाति -कुल में पैदा हुए महा-पुरुषों की जीवनी, उनके द्वारा भोगा गया उत्पीड़न का साहित्य लिख कर यथार्थ सामने लाया गया उसको समाज ने हाथो- हाथ लिया एवं संगठित भी हुए, परिणाम सबके सामने है। क्या आपने 700-800 वर्षो के इतिहास में ऐसा कोई महान पुरुष पैदा ही नहीं हुए, जिनका जीवन चरित्र एवं उनकी सफलता की कहानिया आप अपने समाज के सामने ला सके?
इस सन्दर्भ में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा करना चाहूँगा। उत्तर प्रदेश में जो दलित जातियाँ संख्याबल में महत्त्वपूर्ण हैं, जो साक्षरता एवं शिक्षा के दायरे में प्रवेश करती जा रही हैं, जिनके मध्य राजनीतिक नेतृत्व विकसित हो रहा है, उनमें जातीय असमिता को गौरवान्वित करने के लिए, आत्मसम्मान की प्राप्ति के लिए अपने समाज की महान विभूतियों का चरित्र, समाज निर्माण में उनका योगदान ऐसे साहित्य पर ही बल दिया। जिसका सीधा- सीधा परिणाम भी उनको प्राप्त हुआ है, सत्ता के शीर्ष तक इन जातियों का बोलबाला है, कोई ऐसी राजनितिक पार्टी नहीं जो, इनको सत्ता में भागीदार बनाए बिना शासन कर सके, सुश्री मायावती, नितीश कुमार, जीतन राम मांझी इत्यादि अपने सामाजिक एकता के कारण ही सत्ता तक पहुंचे है।
सत्य आप सभी बन्धुओ के सामने है, फैसला भी आपको करना है, भ्र्म में जीना है या यथार्थ को स्वीकार कर नया इतिहास लिखना है