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✨ *May Maa Laxmi bestow you with the best of health, wealth and happiness. Warm wishes on the auspicious occasion of Sharad Purnima* 🔸 *|| Happy Sharad Purnima ||* 🔸 *Team VJ TRAVEL SOLUTIONS®* *Best Smart Saving Travel Solutions* *A Unit of VJ Group* @vjtravelsolutions 🔸 *Karnataka State Tourism Development Corporation Registered and Authorised Travel Agency* @kstdc #SharadPurnima #Holidays #LaxmiDevi #LakshmiDevi #KarnatakaTourism #Attractions #Shows #Rides #Food #Shopping #StayPackages #LoveToTravel #TravelMore #TravelIndia https://www.instagram.com/p/CVP-UOzhC6R/?utm_medium=tumblr
Goddess Laxmi will bless you to be wealthy. So worship her from the core of your heart. #goddess #laxmidevi #pujaan #wealth #rich #astrologylover #horoscopo #predicciones (at India) https://www.instagram.com/p/B9avQGpFcbN/?igshid=vllnc7wrpkmm
May each and every day of the coming year bring along lots of opportunities for a prosperous tomorrow for you. Wishing you Happy Dhanteras my dearest!
Diwali Greeting!!
कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ?
होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
जिस उद्देश्य से होली के पर्व की शुरुआत हमारे ऋषियों द्वारा की गयी थी उसके बारे में बताते हुए संत आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘यह होली का त्यौहार हास्य-विनोद करके छुपे हुए आनंद-स्वभाव को जगाने के लिए है। जो हो गया – हो… ली… बीत गया सो बीत गया, उससे राग-द्वेष मत करो। भविष्य का भय मत करो। वर्तमान में कहीं फँसो नहीं, आसक्ति करो नहीं। अपने दिल को प्रह्लाद की नाईं रसमय बना दो।’’ इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए वे कहते हैं कि ‘‘होली के दिनों में सुबह 20-25 नीम के कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है।’’ पलाश के फूलों से होली खेलने की परम्परा का फायदा बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘पलाश कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। साथ ही रक्तसंचार में वृद्धि करता है एवं मांसपेशियों का स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति व संकल्पशक्ति को बढ़ाता है। होली की रात्रि (16 मार्च) को पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है।’’ केमिकल रंगों की हानियों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करें।
प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ
* केसरिया रंग : पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें। सुबह केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लायें या उबालकर, उसे ठंडा करके होली का आनंद उठायें।
सूखा हरा रंग : केवल मेंहदी चूर्ण या उसे समान मात्रा में आटे में मिलाकर बनाये गये मिश्रण का प्रयोग करें।
गीला पीला रंग : 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह उबालें।
गीला लाल रंग : दो चम्मच मेंहदी चूर्ण को एक लीटर पानी में अच्छी तरह घोल लें।
संत आशारामजी बापू द्वारा पिछले तीन दशकों से ‘सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली रंगोत्सव’ मनाया जाता है जिसमें पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंग में गंगाजल, तीर्थों का जल आदि मिलाकर प्राकृतिक रंग बनाया जाता है । इस होली महोत्सव से रोग, शोक, दुःख, संताप मिटने के अनेकों के अनुभव हैं । रासायनिक रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति लगभग 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि संत आशारामजी बापूजी के सान्निध्य में खेली जानेवाली सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली में प्रति व्यक्ति लगभग 30 से 60 मि.ली. से कम पानी लगता है । इस प्रकार देश की जल-सम्पदा की हजारों गुना बचत होती है । पलाश के फूलों का रंग बनाने के लिए उन्हें इकट्ठे करनेवाले आदिवासियों को रोजी-रोटी मिल जाती है ।
इस होलिकोत्सव से गरीबों, अनाथों, आदिवासियों तथा पूरे समाज की सेवा के आश्रम संचालित वार्षिक सेवा प्रोजेक्ट्स की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं तथा संत श्री आशारामजी बापू के अवतरण दिवस (20 अप्रैल) से इनका नया प्रारूप क्रियान्वित हो जाता है । गर्मियों में प्याऊ, शरबत वितरण अभियान भी राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जाता है ।
वैदिक ढंग से होली मनाना होता है हितकारी
होली का पर्व बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है । ऋषियों द्वारा समाज की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के उद्देश्य के शुरू किये गये इस पर्व का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए संत आशारामजी बापू कहते हैं कि
”होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये ।
संतान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये ॥
तुम संतों और ऋषि-मुनियों की संतान हो । यदि तुम होली खेलना चाहते हो तो भाँग पीकर बाजार में नाचने की जरूरत नहीं है, दारू पीकर अथवा दुर्व्यसन करके अपने-आपको अधोगति में डालने की जरूरत नहीं है । सच्ची होली तो यह है कि ब्रह्मविद्या की अग्नि प्रकट हो जाय, भक्तिरस की अग्नि भभक उठे और उसमें तुम्हारी चिंता, दारिद्रय, मोह, ममता स्वाहा हो जाय । तुम कंचन जैसे शुध्द हो जाओ । इसीका नाम होली है ।”
इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए बापूजी कहते हैं : ”होली के बाद 20-25 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है । होली (16 मार्च) की रात को जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है । होली आदि पर्वों के दिन भूलकर भी संसार-व्यवहार नहीं करना चाहिए ।”
केमिकल रंगों से होली खेलने से अनेक हानियाँ होती है अतः संत आशारामजी बापू प्राकृतिक ढंग से होली खेलने का मार्ग बताते हैं ।
होली की नीति समझकर मनायें तो होगा ज्यादा लाभ
आज होली तो हम मना लेते हैं परंतु हमारे ऋषियों ने जिस उद्देश्य से इस पर्व की नीति बनायी थी, उससे हम मीलों दूर रह गये हैं । इस कारण होली का यथार्थ लाभ हमें नहीं मिल पा रहा है, उल्टा इस पर्व को रासायनिक रंगों से मनाने की कुप्रथा चल पड़ी और अनर्गलता ने इसे और भी विकृत बना दिया है ।
होली पर्व के उद्देश्य को बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं : ”होली का पर्व भेदभाव मिटाकर पारस्परिक प्रेम व सद्भाव प्रकट करने का एक अवसर है, अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक यज्ञ है तथा परस्पर छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, सहजता को, निरहंकारिता के सुख को उभारने का उत्सव है ।”
इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी व साधना में उन्नतिकारक पहलुओं को उजागर करते हुए बापू कहते हैं : ”होली के बाद 20-25 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है । इस दिनों में पचने में भारी भोजन करना हानिकारक है । होली (16 मार्च) की रात को जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है ।”
रासायनिक नहीं प्राकृतिक रंगों से खेलें होली
रासायनिक रंगों से होली खेलना स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है । काले रंग में उपस्थित लेड ऑक्साइड गुर्दे की बीमारी व दिमाग की कमजोरी पैदा करता है । कॉपर सल्फेट जो कि हरे रंग में पाया जाता है, उससे आँखों में जलन, सूजन तथा अस्थायी अंधत्व जैसी समस्याएँ होती हैं । लाल रंग में उपस्थित मरक्युरी सल्फाइड त्वचा का कैंसर पैदा करता है । दूसरे अन्य रंगों में भी कई हानिकारक रसायन पाये गये हैं, जो शारीरिक हाँनियों के अलावा स्वभाव में शुष्कता, उग्रता आने जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न करते हैं ।
रासायनिक रंगों से बचकर प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की सीख देने के साथ-साथ आशारामजी बापू परमात्मा की भक्ति के अछूट रंग में रँग जाने की बात पर विशेष जोर देते हुए कहते हैं : ”ऐसी परिस्थितियों से बचना जो आपको दुर्व्यसनों के जहरीले रंगों से रँगना चाहें । आप तो बस, अपने-आपको हरिभक्ति के रंग से… प्रभु और प्रभु के प्यारे संतों के आत्मानंद से रँग देना… इतना रँगना, इतना रँगना कि रंग नाहीं छूटे…’’
आज श्री चैतन्य महाप्रभुजी जयंती भी है ।
Special Day for Jap and Meditation – Holi – Surat Sant Sammelan
कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
Special Day for Jap and Meditation – Holi – Surat Sant Sammelan
कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
Special Day for Jap and Meditation – Holi – Surat Sant Sammelan
कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
Special Day for Jap and Meditation – Holi – Surat Sant Sammelan
कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
Special Day for Jap and Meditation – Holi – Surat Sant Sammelan कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना - समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ?
होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
जिस उद्देश्य से होली के पर्व की शुरुआत हमारे ऋषियों द्वारा की गयी थी उसके बारे में बताते हुए संत आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘यह होली का त्यौहार हास्य-विनोद करके छुपे हुए आनंद-स्वभाव को जगाने के लिए है। जो हो गया – हो… ली… बीत गया सो बीत गया, उससे राग-द्वेष मत करो। भविष्य का भय मत करो। वर्तमान में कहीं फँसो नहीं, आसक्ति करो नहीं। अपने दिल को प्रह्लाद की नाईं रसमय बना दो।’’ इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए वे कहते हैं कि ‘‘होली के दिनों में सुबह 20-25 नीम के कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है।’’ पलाश के फूलों से होली खेलने की परम्परा का फायदा बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘पलाश कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। साथ ही रक्तसंचार में वृद्धि करता है एवं मांसपेशियों का स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति व संकल्पशक्ति को बढ़ाता है। होली की रात्रि (16 मार्च) को पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है।’’ केमिकल रंगों की हानियों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करें।
प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ
* केसरिया रंग : पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें। सुबह केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लायें या उबालकर, उसे ठंडा करके होली का आनंद उठायें।
सूखा हरा रंग : केवल मेंहदी चूर्ण या उसे समान मात्रा में आटे में मिलाकर बनाये गये मिश्रण का प्रयोग करें।
गीला पीला रंग : 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह उबालें।
गीला लाल रंग : दो चम्मच मेंहदी चूर्ण को एक लीटर पानी में अच्छी तरह घोल लें।
संत आशारामजी बापू द्वारा पिछले तीन दशकों से ‘सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली रंगोत्सव’ मनाया जाता है जिसमें पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंग में गंगाजल, तीर्थों का जल आदि मिलाकर प्राकृतिक रंग बनाया जाता है । इस होली महोत्सव से रोग, शोक, दुःख, संताप मिटने के अनेकों के अनुभव हैं । रासायनिक रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति लगभग 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि संत आशारामजी बापूजी के सान्निध्य में खेली जानेवाली सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली में प्रति व्यक्ति लगभग 30 से 60 मि.ली. से कम पानी लगता है । इस प्रकार देश की जल-सम्पदा की हजारों गुना बचत होती है । पलाश के फूलों का रंग बनाने के लिए उन्हें इकट्ठे करनेवाले आदिवासियों को रोजी-रोटी मिल जाती है ।
इस होलिकोत्सव से गरीबों, अनाथों, आदिवासियों तथा पूरे समाज की सेवा के आश्रम संचालित वार्षिक सेवा प्रोजेक्ट्स की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं तथा संत श्री आशारामजी बापू के अवतरण दिवस (20 अप्रैल) से इनका नया प्रारूप क्रियान्वित हो जाता है । गर्मियों में प्याऊ, शरबत वितरण अभियान भी राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जाता है ।
वैदिक ढंग से होली मनाना होता है हितकारी
होली का पर्व बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है । ऋषियों द्वारा समाज की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के उद्देश्य के शुरू किये गये इस पर्व का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए संत आशारामजी बापू कहते हैं कि
”होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये ।
संतान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये ॥
तुम संतों और ऋषि-मुनियों की संतान हो । यदि तुम होली खेलना चाहते हो तो भाँग पीकर बाजार में नाचने की जरूरत नहीं है, दारू पीकर अथवा दुर्व्यसन करके अपने-आपको अधोगति में डालने की जरूरत नहीं है । सच्ची होली तो यह है कि ब्रह्मविद्या की अग्नि प्रकट हो जाय, भक्तिरस की अग्नि भभक उठे और उसमें तुम्हारी चिंता, दारिद्रय, मोह, ममता स्वाहा हो जाय । तुम कंचन जैसे शुध्द हो जाओ । इसीका नाम होली है ।”
इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए बापूजी कहते हैं : ”होली के बाद 20-25 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है । होली (16 मार्च) की रात को जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है । होली आदि पर्वों के दिन भूलकर भी संसार-व्यवहार नहीं करना चाहिए ।”
केमिकल रंगों से होली खेलने से अनेक हानियाँ होती है अतः संत आशारामजी बापू प्राकृतिक ढंग से होली खेलने का मार्ग बताते हैं ।
होली की नीति समझकर मनायें तो होगा ज्यादा लाभ
आज होली तो हम मना लेते हैं परंतु हमारे ऋषियों ने जिस उद्देश्य से इस पर्व की नीति बनायी थी, उससे हम मीलों दूर रह गये हैं । इस कारण होली का यथार्थ लाभ हमें नहीं मिल पा रहा है, उल्टा इस पर्व को रासायनिक रंगों से मनाने की कुप्रथा चल पड़ी और अनर्गलता ने इसे और भी विकृत बना दिया है ।
होली पर्व के उद्देश्य को बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं : ”होली का पर्व भेदभाव मिटाकर पारस्परिक प्रेम व सद्भाव प्रकट करने का एक अवसर है, अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक यज्ञ है तथा परस्पर छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, सहजता को, निरहंकारिता के सुख को उभारने का उत्सव है ।”
इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी व साधना में उन्नतिकारक पहलुओं को उजागर करते हुए बापू कहते हैं : ”होली के बाद 20-25 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है । इस दिनों में पचने में भारी भोजन करना हानिकारक है । होली (16 मार्च) की रात को जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है ।”
रासायनिक नहीं प्राकृतिक रंगों से खेलें होली
रासायनिक रंगों से होली खेलना स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है । काले रंग में उपस्थित लेड ऑक्साइड गुर्दे की बीमारी व दिमाग की कमजोरी पैदा करता है । कॉपर सल्फेट जो कि हरे रंग में पाया जाता है, उससे आँखों में जलन, सूजन तथा अस्थायी अंधत्व जैसी समस्याएँ होती हैं । लाल रंग में उपस्थित मरक्युरी सल्फाइड त्वचा का कैंसर पैदा करता है । दूसरे अन्य रंगों में भी कई हानिकारक रसायन पाये गये हैं, जो शारीरिक हाँनियों के अलावा स्वभाव में शुष्कता, उग्रता आने जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न करते हैं ।
रासायनिक रंगों से बचकर प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की सीख देने के साथ-साथ आशारामजी बापू परमात्मा की भक्ति के अछूट रंग में रँग जाने की बात पर विशेष जोर देते हुए कहते हैं : ”ऐसी परिस्थितियों से बचना जो आपको दुर्व्यसनों के जहरीले रंगों से रँगना चाहें । आप तो बस, अपने-आपको हरिभक्ति के रंग से… प्रभु और प्रभु के प्यारे संतों के आत्मानंद से रँग देना… इतना रँगना, इतना रँगना कि रंग नाहीं छूटे…’’
आज श्री चैतन्य महाप्रभुजी जयंती भी है ।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ? होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।
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