डाकिया डाक लाया, खुशी का पयाम कहीं...
हम 90 के दौर के बच्चे जिस वक्त में बड़े हुए हैं, उस वक्त में खतों का आना-जाना एक आम बात होती थी। जब बेटी दूर देस में ब्याही जाती थी, तो उसके पत्र में लिखे हुए एक-एक अक्षर को मां एक नहीं, सौ बार पढ़ा करती थी। "यहां सब ठीक है अम्मा, तुम कैसी हो?"—बस इतना भर ही तो काफी हो जाता था एक मां के लिए। लेकिन खैर, वक्त गुजरा, टेलीफोन आए और टेलीफोन के बाद अब मोबाइल का जमाना ऐसा है कि आप चाहे सात समंदर पार हों या फिर सात मकान दूर रहते हों, वीडियो कॉल की वजह से अब कोई दूरी, दूरी ही नहीं रह गई है। लेकिन हां, वो खत और उनमें लिखी हुई जज़्बों की इबारत अब भी ज़ेहन में मौजूद है।...
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