क्या तुम्हे पता है
मैं तुम्हे कहा कहां महसूस करती हूं?
शायद नहीं
आओ तुम्हे संग ले चलूं
वो मेरे माथे के दाई ओर
जो तिल है न
उसमें रहते हो तुम
जितनी बार आँखें छूती हूं
महसूस तुम्हे कर लेती हूं।
वो मेरी कलाई पर
तेरे छूने का एक निशान है न
तेरी उंगलियों में बंधे मेरे हाथ
सोच लेती हूं
बस अपने हाथों को देख देख
तुझे भी हर पल देख लेती हूं।
कमर पर तेरा हाथ सोच कर
हर करवट में खुद को उसकी
आगोश में समेट लेती हूं।
तेरी झप्पियां आज भी
मेरी पीठ में समाई हुई है
खुद को, उस से
कभी जुदा ही नहीं कर पाती हूं।
याद है पैरों में पैर और घुटने मोड कर
जब तुझे खुद से लिपटाया था
वो एहसास उन्हीं पैरों में
आजतक तेरी याद दिलाता है
सोच इन पैरों में तुझे साथ लिए
दिन भर
मैं कैसे घूम लेती हूं।
कानों में वो हल्की सी
तेरी आवाज
बुदबुदाता हुआ वो एहसास
वो तेरी बातों का मधुर स्वाद
जब भी अपनी बालियां
दिन में सौ दफा छूती हूं
हर बार तुझे सुन लेती हूं।
हर बाली को बीस बार
तेरे खयाल में
हाथों से सहला कर
शायद तुझे यूंही बेवजह
चूम लेती हूं।
तेरे हाथ
तेरी उंगलियां
जिनसे मुझे बेहद है प्यार
उन्हें अपने शरीर के हर कोने में
तेरी छुअन से आह भर लेती हूं
हर पल
हर क्षण
तुझे खुद में
मैं यूंही
दिनभर
सोच लेती हूं।
तेरे सीने की छुअन
और खुशबू
मेरी उंगलियों में
मैं
ओढ़ लेती हूं।
बस ऐसे ही बेवजह
मैं तुझे
हर पल सोच लेती हूं।













