पत्रिका के वाचन (फलित) करने से पहले जांच के आवश्यक मापदण्ड:-
पत्रिका के वाचन (फलित) करने से पहले जांच के आवश्यक मापदण्ड:- भाग-1
************************
फलित ज्योतिष में अनेंक राजयोगों का वर्णन है।यह तो अविवादित तथ्य है ही कि अपनी ही राशि में बैठे (स्वराशिस्थ) ग्रह सदा अपने भाव से संबंधित शुभफल ही देते हैं। और स्वराशिस्थ ग्रह की यह स्थिति यदि लग्न से केन्द्रीय भावों में हो तो "पंचमहापुरुष" नामक राजयोगों तक का निर्माण कर देती हैं।
इसी आधार पर कोई सामान्य ज्योतिषी एक ही ग्रह अथवा योग देख कर अन्य जातको के लिए भी वही स्वर्णिम कल्पनाएं कर लेता है जो अब तक उसका अनुभव बना है। किन्तु ज्योतिष के विभिन्न ग्रंथों में स्वर्णाक्षरों में वर्णित तथाकथित ये "राजयोग" किसी "जातक विशेष" को उस मात्रा में नही मिलते जितना हमने भविष्यवाणी कर दी थी।तब ज्योतिषी अथवा जातक के मन में शंका होती है कि ये "राजयोग" क्या मात्र एक कल्पना भर है?तो इसका एक सरल सा उत्तर है, नही! उचित प्रश्न तो यह बनता है कि क्या हमने इस पत्रिका के वाचन (फलित) करने से पहले जांच के आवश्यक मापदण्ड प्रयोग कर लिए थे?
क्या हैं वे आवश्यक मापदण्ड?
1-क्या हमारा वह स्वराशिस्थ अथवा राजयोगकरक ग्रह किसी अन्य नैसर्गिक क्रूर, पापक, शत्रु या त्रिकभाव के स्वामिग्रह से कोई संबंध बना रहा है? (संबंधयोग चार प्रकार से बनता है)
2-क्या हमारे उस स्वराशिस्थ अथवा राजयोगकरक ग्रह से दूसरे, बारहवे, छठे या आठवे भाव में कोई नैसर्गिक क्रूर, शत्रु या पापक ग्रह है?(स्मरण करें कि चंद्र और सूर्य का पूर्ण फल जांचने में हम उपरोक्त सूत्र का उपयोग करते है किन्तु अन्य ग्रहों के बारे में न के बराबर)।
3- यदि हमारा स्वराशिस्थ अथवा राजयोगकरक ग्रह लग्न भाव मे है तो उससे पंचम और नवमभाव में कोई नैसर्गिक क्रूर, शत्रु या पापक ग्रह है?
4-यदि हमारा स्वराशिस्थ अथवा राजयोगकरक ग्रह चतुर्थ भाव मे है तो उससे पंचम और नवमभाव (यहां अष्टम और द्वादसभाव) में कोई नैसर्गिक क्रूर, शत्रु या पापक ग्रह है?
5-यदि हमारा स्वराशिस्थ अथवा राजयोगकरक ग्रह सप्तम भाव मे है तो पंचम और नवमभाव ( यहां एकादश और तृतीयभाव) में कोई नैसर्गिक क्रूर, शत्रु या पापक ग्रह है?
6-यदि हमारा स्वराशिस्थ अथवा राजयोगकरक ग्रह दसमभाव मे है तो पंचम और नवमभाव ( यहां द्वितीय और षष्टमभाव) में कोई नैसर्गिक क्रूर, शत्रु या पापक ग्रह है?
क्रमांक 3,4,5 और 6 के संबंध में व्याख्या इस प्रकार है कि, -जन्मकुंडली में लग्न, पंचम और नवमभाव मिल कर एक त्रिकोण कि निर्माण करते हैं। यह सर्वख्यात है। इस त्रिकोण को हम "धर्म त्रिकोण" कहते हैं। परन्तु मानव जीवन के तीन अन्य पुरूषार्थ अभी आने शेष हैं जिन्हें हम अर्थ, काम और मोक्ष " कहते हैं।
भाव संख्या दशम, द्वितीय और षष्ठम से मिलकर " दूसरा त्रिकोण" भी बनता है जिसे हम "अर्थ त्रिकोंण" कहते हैं।
इसी प्रकार भावसंख्या सप्तम, एकादश और तृतीय से मिलकर "तीसरे त्रिकोण" का सृजन होता है, जिसे "काम त्रिकोण" औरभावसंख्या चतुर्थ, अष्टम और द्वादश भाव से मिलकर "चतुर्थ त्रिकोण" का सृजन होता है, जिसे "मोक्ष त्रिकोण" कहते हैं।
यह आवश्यक नही कि हमारा योगकारक ग्रह लग्न के प्रथम,चतुर्थ,सप्तम या दसम भाव में ही हो। यहां पर प्रत्येक त्रिकोण के प्रत्येक भाव का समान महत्व है। जैसे 4,8,12 हो या 8,12 और 4 ।इस प्रकार किसी भी स्वराशिस्थ राजयोगी ग्रह को सन्तुलित रखने के लिए उसके वर्ग के ही किसी एक कोणपति को अपने ही वर्ग के किसी कोण में अनिवार्यत: आना होगा। जैसे 4,8,12 भाव के न्यनतम दो भावों के स्वामि ग्रहों को 8, 12 और 4 भावों में ही आना शुभ होता है।**स्मरण रखलें कि जब उपरोक्त त्रिकोणेश का फलित होगा तब त्रिकादि भावों के गुणा-व-गुण विशेष अर्थ नही रखते। ( हमने अनेंक कुंडलियों में देखा है कि त्रिक में बैठे ग्रह बिना विपरीतराजयोग बनाए भी शुभफल देते हैं।)
आदरणीय अमिताभ बच्चन जी की कुंडली में 4, 8 और 12 भावों "मोक्ष त्रिकोण" के स्वामि शुक्र,बुध और शनि अपने ही कोण में है जो उन्हे आयु के इस दौर में भी प्रतापी बनाए हुए हैं। पनामा पेपर्स हो या me-too के सच्चे-झूठे आरोपों के बावजूद भी *जनता के हृदय सम्राट (4,8,12) बनें हुए हैं।
7-अब योगकारक ग्रह का:-1-पूर्णबल षडबल सारणी से, 2-उसकी विशेष कारकता का फल तत्तसंबंधित वर्गकुंडलियों से, और 3-उस भाव का फल भावबल सारणी से देखने के पश्चात एक धारणा बनालें।
8-अन्त में उस "राजयोगकरक" ग्रह के प्राप्त हो सकने वाले शुभफल की अन्तिम मात्रा (विस्तार या सीमा) जानने के लिए उसी भाव को लग्न मानते हुए "भावात्-भावम्" के सिद्धांत का पालन कर ले।9-उपरोक्त मापदण्ड़ स्वयं में कोई योग नही अपितु केवल यंत्र समान हैं। उस पुष्प की खिलती स्वस्थ्य पत्तियां हैं जिनसे भविष्य में फल बनेगा।10-इस सब के पश्चात अब नि:सन्देह हमारी वाणि में भी भगवान "वराह-पाराशर" का अंश अवश्य ही होगा। .........क्रमस:(अगले अंक में त्रिकोणों और भावात्-भावम् पर लघु चर्चा।) पत्रिका के वाचन (फलित) करने से पहले जांच के आवकश्यक मापदण्ड:- भाग-2
**********************************
फलितज्योतिष के ग्रंथों में उपलब्ध विभिन्न अध्याय जैसे: -"ग्रहशीलाध्याय:" -हमें क्रमस: ग्रहों के "गुण-धर्म और स्वभाव" से पूर्ण अवगत करा कर देते हैं।
इसी क्रम में -"भावफलाध्याय:" -हमें ग्रहों के गुण-धर्म और स्वभाव से आगे ग्रहों की विभिन्न भावों की स्थिति से जन्में सामान्य फलों से अवगत करा देते हैं और -"राजयोगाध्याय:" -हमें ग्रहों की विभिन्न शुभभावों में स्थिति, उनके बलाबल और उनके परस्पर संबंध से जन्म लेने वाले "अति विशेष " फलों से अवगत कराते हुए एक "अद्भुत संसार " में ले जाते हैं।......और तब हम स्वयं को किसी जन्मपत्रिका का फलित करने में सक्षम मान लेते हैं।
किन्तु अनुभव में आता है कि कुछ जन्मपत्रिकाएँ तो ऐसी होती हैं जो किसी ज्योतिषी के हाथ में आते ही " तोते सी वाचाल" हो जाती हैं। ....परन्तु कुछ ऐसी भी होती हैं जिनकी पर्ते खोलने में एक विद्वान ज्योतिषी को भी बहुत सोचना पड़ जाता हैं।उदाहरण के लिए दिशाहीन होकर स्वराशिस्थ ग्रह से बना या शत्रुग्रह के लग्नों में अपनी उच्चराशि से बनने वाले राजयोग। या कुंडली के दृश्यभाग (भावसंख्या 1,12,11,10,9,8) अथवा अदृश्यभाग (भावसंख्या 7,6,5,4,3,2) में बनने वाले शत्रुग्रहों के युति योग।
अब एक विद्वान ज्योतिषी फलित के सैध्दान्तिक मार्ग (theoretical approaches) के साथ-साथ साथ कुछ व्यवहारिक मार्ग को अपनाता है।
इन व्यवहारिक मार्ग (practical approaches) में सर्वप्रथम विधि है "भावात्-भावम् " ।
"भावात्-भावम् " विधि से किसी जन्मपत्रिका के वाचन की कला है। यह एक विद्वान और अनुभवी ज्योतिषी की असीमित और अनन्त उड़ान है, जहां शेष भी अशेष है।...और फिर भी यदि कुछ शेष है तो अन्तिम विधि के रुप में प्रयोग की जाती है -जन्मपत्रिका की " त्रिकोण विस्तार विधि "।त्रिकोण विस्तार विधि :--यह सरल है, छोटी है। किन्तु इतना सटीक है कि किसी जातक के अन्तिम परिणाम की भविष्यवाणी भी सटीक रुप में कर ही देती है।
आज जन्मपत्रिका की " त्रिकोण विस्तार विधि " पर ही चर्चा करते हैं ।
त्रिकोण विस्तार विधि :- न तो जन्म समय पर किसी का नियंत्रण है न मृत्यु की घड़ी पर। फिर किस भाव में कौन राशि शुभ है और कौन नही , यह विचारने से क्या लाभ।
इस विधि में किसी भी लग्न की जन्मकुंडली के बारह भावों को चार त्रिकोणों में ( विन्यास) या विभाजित कर दिया जाता है।
1-प्रथम त्रिकोण:- लग्न, पंचम और नवम।
2-दूसरा त्रिकोण:- द्वितीय, षष्ठम और दशम।
3-तीसरा त्रिकोण:- तृतीय, सप्तम और एकादश।
4-चतुर्थ त्रिकोण:- चतुर्थ, अष्टम और द्वादश भाव।
इन चतुष्कोंणों में प्रत्येक त्रिकोण का पहला कोणभाव साक्षात श्री विष्णु का रुप है। दूसरा कोण साक्षात भगवती लक्ष्मी का और तृतीय कोण साक्षात भगवती श्री का स्वरूप जाने।
कुंडली में चतुष्कोंण:-1. -किसी भी लग्न की जन्मकुंडली के लग्नभाव, पंचमभाव और नवमभाव से बना ये प्रथम त्रिकोण है। इसे "धर्म त्रिकोण" माना जाता है।
-इन भावों में मित्र, स्वराशि या अपनी उच्चराशि में स्थित ग्रहों के कारण अथवा इन भावों के स्वामि ग्रहों का परस्पर कोई संबंध के शुभप्रभाव से जातक के व्यक्तित्व, उसके शील-संस्कार, बुध्दि कौशल और उसकी निर्णय क्षमता पर "सात्विक प्रभाव " पड़ता है। -यह जातक साक्षात प्रज्जवलित अग्नि के समान है जो स्वयं को भी तप्त करता है।
-यह जातक की बालावस्था है, ब्रह्मचर्य आश्रम है, शिक्षा और ज्ञान के विस्तार का भाग है। -जातक अपने जीवन में एक "क्षत्रिय" के समान अपने नैतिकबल के आधार पर अपने जीवन के परम परुषार्थ करता है।
-अपने वंश के पूर्वज और अगामी सन्तति को सम्मान और सुसंस्कृति दे पाने की क्षमता पाता है।
2. -किसी भी लग्न की जन्मकुंडली के द्वितीयभाव, षष्ठभाव और दसमभाव से बना यह दूसरा त्रिकोण है। इसे "अर्थ त्रिकोण " माना जाता है।
-इन भावों में मित्र, स्वराशि या अपनी उच्चराशि में स्थित ग्रहों के कारण अथवा इन भावों के स्वामि ग्रहों का परस्पर कोई संबंध के शुभप्रभाव से जातक के व्यक्तित्व में एक विशेष प्रकार के आकृषण की भावना की जागृति होती है।
-जातक अपने व्यक्तिगत परिवार से बहुत प्रेम करता हैं साथ ही उसके भरण-पोषण और "योग-क्षेयम् " को वहन करने में सक्षम होता है।
-अपने बुध्दि कौशल और साम-दाम-दण्ड़ और भेद आदि सभी नीतियों को अपनाता हुए अपनी निर्णय क्षमता के आधार पर अपने आत्मीय परिजनों की विपत्ति के समय उनकी रक्षा करता है।
-यह जातक की बाह्यमुखी (Extroverted) अवस्था है। यह गृहस्थ आश्रम है।-यह साक्षात वैश्य प्रवृत्ति है। वह धन का सद्उपयोग करना जानता है।
-यह जातक अपने सामाजिक मान, पद, प्रतिष्ठा का महत्व जानता है और उसे बढ़ाते रहने का सतत प्रयास करता है।
3. -किसी भी लग्न की जन्मकुंडली के तृतीयभाव, सप्तमभाव और एकादभाव से बना यह तीसरा त्रिकोण है। इसे "कामना अथवा काम त्रिकोण " माना जाता है।
-इन भावों में मित्र, स्वराशि या अपनी उच्चराशि में स्थित ग्रहों के कारण अथवा इन भावों के स्वामि ग्रहों का परस्पर कोई संबंध के शुभप्रभाव से जातक के व्यक्तित्व में एक विशेष प्रकार के समर्पण के भाव की जागृति होती है।
-यह जातक की अन्तर्मुखी (introverted) अवस्था है। यह वानप्रस्थ आश्रम है।
-यह साक्षात शूद्र प्रवृत्ति है। यह समझौते और समन्वय का त्रिकोण है। यहाँ बात स्वाभिमान पर आ कर नहीं रुकती। यह कामनाओं का त्रिकोण हैं। अनन्त इच्छाओं का त्रिकोण है।
-इसकी पूर्ति केे लिए जातक धन उपार्जन के अतिरिक्त साधन के रुप में अपनी पत्नि अथवा अपने इष्टमित्रों का भी उपयोग लेता है।
4. -किसी भी लग्न की जन्मकुंडली के चतुर्थभाव, अष्टममभाव और द्वादसभाव से बना यह चौथा त्रिकोण है। इसे "मोक्ष त्रिकोण " माना जाता है।
-इन भावों में मित्र, स्वराशि या अपनी उच्चराशि में स्थित ग्रहों के कारण अथवा इन भावों के स्वामि ग्रहों का परस्पर कोई संबंध के शुभप्रभाव से जातक के व्यक्तित्व में एक " विशेष मार्ग " पर चलने की विकृषण रुचि की जागृति होती है।
-यह साक्षात ब्राह्मण प्रवृत्ति है। रावण और विभीषण इस अन्तिम त्रिकोण से ही प्रकट होते है।-यह जातक की निर्णय कर चुकने वाले " राही " का मार्ग है। यहां जो है वह अनायास नही है।
-यह त्रिकोंण संगति के विन्यास (फैलाव) या सन्यास का आश्रम है।-यहाँ जीव का उत्थान हो या पतन ! सब अपनी चरम अवस्था में है।
-इन भावों की जागृति से जातक का अपने परिवार से मोह के बंधन की सीमाएं या वर्जनाएँ टूटने लगती हैं और बाह्य जगत से अनुराग बढ़ जाता है।
-दिशाओं की सब सीमाए समाप्त।-समाज के हृदय में बसा और परमार्थ के पथ पर चलता-बढता कोई तत्वदृष्टा गाइड; कोई महात्मा।
-जातक का मन! भागीरथ के जल सा निर्मल ! या फिर मन्थन से निकला हलाहल है। -जिससे जहां जा मिला उस जैसा रुप-रंग-आकार पा लिया। दवा बने तो जीवनदान ओर नशा बने तो....।।.....क्रमस:अन्तिम भाग में " भावात्-भावम् " ।। पत्रिका के वाचन (फलित) करने से पहले जांच के आवकश्यक मापदण्ड:- भाग-3
*********************************
फलित के सैध्दान्तिक ज्ञान में पारंगत हो जाने पर अब " साधक " एक " वादक " में रुपान्तरित हो जाता है।
"अनागत "(अकल्पनीय भविष्य) के प्रति यह " अनाहत " (ज्ञान का शंखनाद) की घोषणाए अब किसी वीणा के स्वर के समान उसकी वाणि से झंकृत होने लगती हैं।
क्योंकि अब उस ज्योतिषी के हाथों में आई कोई भी जन्मपत्रिका मात्र एक व्यक्ति की ही पत्रिका नही रह गई है। अब वह ज्योतिषी उस व्यष्टि ( एक/ईकाई) से उसकी संपूर्ण सृष्टि का निर्माण कर लेता है।
जन्मपत्रिका वाचन की इसी कला का नाम है "भावात्-भावम् "।
भावात्-भावम् ! संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है--" भावसे भाव का " परीक्षण करना।
स्मरण करें कि फलितज्योतिष के सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ "बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् " अथवा " फलदीपिका " से हमने समझा है कि;
1) -छठेभाव से छठाभाव अर्थात्त ग्यारहवा भाव भी रोग-ऋण-शत्रु,मामा आदि बड़े संबंधियों का भाव माना जाता है। इसी प्रकार
2) -मारकेश का बल और मृत्यु का तरीका देखने के लिए हम आठवे से आठवा अर्थात्त तीसरे भाव को भी देखते हैं।
यही प्रक्रिया यदि हम अन्य भावों के लिए भी प्रयोग करें तो हमारे फलित का आश्चर्यजनक रुप से विस्तार हो जाता है।
इस विषय को दक्षिणी भारत के विद्वान श्री रामानुज ने अपने एक लघु ग्रंथ " भावार्थ रत्नाकर " में विस्तार से लिख कर पुनः मान्यता दी है।
इस विधि की कुछ विशेषताएँ:-
1-जन्मकुंडली का लग्नभाव स्वयं में दीप समान है। अत: भावात् भावम् विधि में लग्नभाव की पुनर्परीक्षा नही की जाती। क्योकि लग्न का विस्तार तो पहले ही शेष ग्यारह भावों में किया जा चुका है।
2-अब भावात् भावम् में दो विधि आती हैं:
I) -लग्न के अतिरिक्त हम जिस किसी भी भाव का फलित विस्तार करना चाहते हैं उस भाव को ही लग्न मान कर उससे अगामी भावों को धन, पराक्रम,सुख आदि मान कर चलें।
II) -लग्नभाव के अतिरिक्त हम लग्न से क्रमवत जिस भाव का भी पुनर्परीक्षा करना चाहते हैं तो हमें उस भाव की स्वाभाविक क्रमसंख्या से उसी क्रमसंख्या वाले भाव का चयन करना होगा।
अब यह भाव हमारे अभिष्ठभाव (जिस भावका हम परीक्षण कर रहें हैं ) का "सह भाव" (अर्धभाव) है सहयोगीभाव नही।
जैसे धन (02) का धन (03) का धन (04) भाव।। इस उदाहरण में तीसरा और चौथाभाव दोनों धनभाव के सहभाव हैं।
हमें ज्ञात है कि फलितज्योतिष में जन्मकुंडली के पहले भाव से घड़ी की विपरीत गति की ओर चलते हुए भाव संख्या-2, फिर-3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 और अन्त में भावसंख्या-12 निर्धारित है।
भावात् भावम् नामक इस विधि में हम जिस भावसंख्या का फलित करना चाहतेे हैं, उस भाव से उतनी ही अगामी क्रमसंख्या के भाव को अपने अभिष्ठ भाव का "सहायक भाव " मानते हुए उसका भी परीक्षण करते चले जाते हैं। यह क्रम दोहराया और तिहराया भी जा सकता हैं।
उदाहरण हेतु: -जन्मकुंडली के भाव संख्या 02 से एक ज्योताषी किसी भी जातक की "चल-अचल धन-संपदा" के संग्रह को देखते हैं।
सामान्य परीक्षण विधि से फलित : 1-भाव संख्या 02 में भावेश स्वयं बैठा हो अथवा लग्नेश स्वयं बैठा हो या उनके नैसर्गिक मित्र का वास हो तो यह शुभयोग है।
2-भावेश या लग्नेश का मित्र ग्रह न हो किन्तु नैसर्गिक शुभग्रह आ बैठे तो भी यह शुभयोग है।
3-अब इस भाव में बैठे: I)-भावेश या लग्नेश पर या II)-इनके मित्र पर या III)-किसी नैसर्गिक शुभग्रह पर अन्य किसी नैसर्गिक मित्रग्रह का कोई भी संबंध, किसी भी भाव से बन जाय तो हम जातक को "चल-अचल धन-संपदावान" घोषित कर देते है।
4-यदि उपरोक्त से विपरीत परिस्थिति बनी है तो जातक की आय चाहे कितनी भी हो वह "चल-अचल-संपदा का संग्रह" कर पाएगा ? इसमें सन्देह बन जाता है।
भावात् भावम् से परीक्षा से प्राप्त फलित:-
1-हमारे अभीष्ठ भाव (जिस भावका हम परीक्षण कर रहें हैं ) का स्वामिग्रह यदि उसके "सहभाव" में ही बैठा हो तो यह सामान्य और सन्तोषजनक स्थिति है।
2-हमारे अभीष्ठ भाव (जिस भावका हम परीक्षण कर रहें हैं ) के स्वामिग्रह के दल का ही कोई ग्रह यदि उसके "सहभाव" में ही बैठा हो तो यह सामान्य और सन्तोषजनक स्थिति है। (दल -1 बृ, मं, चं सू और योगवश केतु । दल-2 शुक्र, बुध, शनि, और राहु )
3-हमारे अभीष्ठ भाव के स्वामिग्रह के दल से विपरीत दल का सौम्य ग्रह यदि उसके "सहभाव" में ही बैठा हो तो यह राजयोग समान शुभ होगा। (वेशी और अनफा योग का स्मरण करें ) और यदि सहभाव में विपरीत दल का क्रूर ग्रह है तो यह अशुभ स्थिति है।
भावात् भावम् की दोनों विधियों में उपरोक्त तीन नियम लागु होंगे।
फलित करते समय भी प्रश्न बन जाता है कि जब आय अच्छी हो रही है ( एकादस से और पुन: एकादस से एकादस अर्थात्त नवम भाव से ) तो फिर उस आय की क्या गति होगी? वह आमदनी "चल-अचल-संपदा" में क्यों संग्रह नही होगी?
तब हमें धनभाव के धनभाव अर्थात्त दूसरे भाव से दूसरे अर्थात्त तृतीय भाव से उत्तर मिलेगा।
1-हम जानते है कि भाव संख्या 3 और 6 में नैसर्गिक क्रूरग्रह अपना श्रेष्ठ फल देते हैं।
2-अत: यदि धनभाव का स्वामि नैसर्गिक क्रूरग्रह है और वह तृतीयभाव में आ बैठते हैं तो यह शुभयोग बन जाता है।
3-इसके विपरीत यदि धनभाव का स्वामि नैसर्गिक सौम्यग्रह है और वहकर तृतीयभाव में आ बैठते हैं तो यह हमारे फलित "चल-अचल-संपदा से हीनता" को ही बल देता है।
"चल-अचल-संपदा से हीनता" के संबंध में यदि यहां पर भी ज्योताषी अथवा यजमान सन्तुष्ठ न हों तो फिर हमारी यात्रा होगी --***धन के धन का धन तक। अर्थात धन के धन (भावसंख्या 03) फिर ...धन का धन अर्थात्त भावसंख्या 04 पर।
-स्मरण रहे कि भावसंख्या 03 तक हम "चल-अचल-संपदा की प्राप्ति" के योग अथवा फलित को अन्तिम रुप दे चुके है। भावसंख्या 04 पर हम "चल-अचल-संपदा से हीनता" के कारण या कारक का योग खोज रहें हैं।
हम जानते हैं कि चौथा भाव सौम्यभाव है। अत: यहां सौम्य ग्रह का होना हमारी "चल-अचल-संपदा से हीनता" का सौम्य कारण बनेगा। अर्थात हमारी प्राथमिकता कुछ और होगी जैसे सन्तान की उच्चशिक्षा आदि। और यदि यहां क्रूरग्रह का वास है तो "चल-अचल-संपदा से हीनता" का कारण हमारी दुखदायक परिस्थिति है। वह सुख और दुखदाई का जिम्मेवार हमारा वह संबंधी होगा जिसका कारक ग्रह इस भाव (04) को प्रभावित कर रहा है।
**स्वाभाविक भी है कि धनभाव के पराक्रम या उसके रुप का ज्ञान हमें सुखभाव से ही होगा।
इस क्रिया से हम अपने फलित को बहुत सटीक और अधिक विस्तार दे सकते हैं। यह विधि किसी विद्वान ज्योतिषी की कल्पना की असीमित और अनन्त उड़ान है । जहां शेष भी अशेष बन जाता है।
अपने इस लेख में हमने " भावार्थ रत्नाकर " ग्रंथ से मात्र उसका "मूल विचार" ( concept) लिया है। क्योंकि यह स्वयं में मूलग्रंथ नही है अत: इसमें विद्वानों के स्वानुभूत विचारों का समावेश स्वीकार्य रहा है। यह गुरुआज्ञा के प्रति दुराग्रह की श्रेणी में नही आता।
निवेदन है कि इस लेख पर अपनी असहमति या सहमति विस्तार से दें क्योंकि "ज्ञान" पर किसी एक की बपौती नही होनी चाहिए। इतिशुभम्।








