स्त्री जातक फलित पर हम अब जिन योगों की चर्चा करेंगे वे बहुत सटीक हैं।लेकिन इससे पहले हम यह स्मरण रखें कि नारी स्वभाव से सहजशील है, वह परवश आचरण कर सकती है अत: मात्र एक अशुभयोग के आधार पर किसी महिला के चरित्र पर अन्तिम राय बना लेना ज्योतिष के प्रति अपराध ही होगा। यह एक अति संवेदनशील विषय है। अन्तत: वह हमारी जननी है।
मनुस्मृति ( मूलत: देवीभागवत) अध्याय 3, श्लोक 56 में कहा गया हैं :
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रा फलाः क्रियाः ।।
जहां स्त्रीजाति का आदर होता है वहां देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता वहां संपन्न किये गये सभी कार्य असफल होते हैं।
सोमात्मिका: स्त्रिय: सर्वा पुरुषा भाष करात्मका:।
तासां चंद्रबलात् स्त्रीणां नृणां सर्व हि सूर्यत:।। ( वशिष्ठ संहिता )
अर्थात : स्त्रियां चन्द्र के अंशबल से और पुरुष सूर्य के अंशबल से उत्पन्न होते हैं। अतः:स्त्री का शुभाशुभ चंद्र के और पुरुष का शुभाशुभ सूर्य के बल से होना चाहिए।
उपरोक्त कथन का "सुगमज्योतिष" भी समर्थन करता है:-
-पुयोषितां जन्मफलं तु तुल्य किवात्र राशिश्वर लग्नतश्च।।
: स्त्रीजातक विशेष विचार श्लोक-2. ************
भावार्थ: स्त्री तथा पुरुष जातक का फलित समान ही होता है। किन्तु स्त्रियों के जन्मफल के विचार उनके चंद्र को लग्न मानकर करने चाहिए।आधुनिक ज्योतिष में इसे महिला के संबंध में 1-लग्नभाव-लग्नेश और 2-चंद्रभाव और चंद्र से जो बलवान हो उसका चयन करें।
इसी प्रकार पुरुष जातक फलित के लिए 1-लग्नभाव-लग्नेश और 2-सूर्यभाव और सूर्य से जो बलवान हो उसका चयन करें।
ऋषि पराशर के शिष्य लग्नभाव ही को प्रधान मानते हैं। वे स्त्रीजातक और पुरुषजातक की फलित विधि में भेद नही करते।
स्त्रीजातक की कुंडली की विशेषता:
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योग संख्या -2: **********
फलदीपिका एवं सुगमज्योतिष : स्त्रीजातक विशेष विचार श्लोक-3 के अनुसार:-
वैधव्यं निधनगृहे पतिसौभाग्यं सुखं च यामित्रे।
सौन्दर्यं लग्नगृहे विचिन्तयेत् पुत्र सम्पदं नवमे।।
भावार्थ: लग्न या चंद्र जो भी भाव बलवान हो उससे आठवे भाव से महिला के पति की आयु, सातवे भाव से पति की प्राप्ति और कामसुख, लग्नभाव से रुप और सौन्दर्य और नवमभाव से सन्तान और सम्पत्ति का सुख के संबंध में जानना चाहिए।
योग संख्या -3: ************
सुगमज्योतिष : स्त्रीजातक विशेष विचार:
एषु स्थानेषु युवत्या: क्रूरास्तु नेष्ट फलदा।
भुवनेश विवर्जिता: सदा चिन्त्या:।।
अर्थात् : उपरोक्त भावों में( 1, 8, 7 और 9) में नैसर्गिक क्रूरग्रह अनिष्ट फल देते हैं। लेकिन ये क्रूरग्रह यदि अपने इन भावों में ही बैठे हो अर्थात् स्वराशिस्थ हों तो शुभफल ही देंगे, इस तथ्य को स्मरण रखें।
योग संख्या -4: ************
सुगमज्योतिष : स्त्रीजातक विशेष विचार श्लोक-4 के अनुसार:
नारिणां जन्मकाले कुज-शनि तमस: कोणकेन्द्रेषु शस्ता-
श्चन्द्रोsस्ते च प्रशस्तो बुध-सित-गुरुव: सर्व भावेषु शस्ता:।।
अर्थात् : स्त्रीजातक की जन्मलग्न कुंडली में मंगल,शनि और राहु कोण और केन्द्रभावौं में शुभ फलदायक सिद्ध होते हैं।
-चंद्रमा सातवें भाव में शुभ फलदायक होता है।
-बुध, शुक्र और बृहस्पति सभी भावों में शुभ फलदायक माने जाते हैं।
-लग्नेश सातवें भाव में और सप्तमेश लाभ भाव में और लाभेश पांचवें भाव में श्रेष्ठ फल देते हैं।
योग संख्या-5: **************
सारावली के अध्याय 3 श्लोक संख्या 9 के अनुसार:
द्वादसमण्डल भगणं तस्यार्धे सिंहतो रविर्नाथ:।
कर्कटक अत्प्रतिलोमं शशी तथान्ये अपि तत्स्थानात्।
भावार्थ:- अनन्त आकाश को कुल बारह भगों में बांटा गया है।शनि, बृहस्पति, सूर्य, बुध, शुक्र और चंद्र (पृथ्वी) आदि सात ग्रह इन बारह स्थानों ( भगण ) पर क्रमस: भ्रमण करते रहते हैं।इन बारह स्थानों (राशियों) का नाम क्रमस: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, बृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन है।
सिंहराशि से क्रमवार छ राशियों ( सिंह, कन्या, तुला, बृश्चिक, धनु, मकर) का एक अर्धमण्डल (अर्धवृत्त) है। इस मण्डल का स्वामित्व "सूर्य" को दिया गया है।
इसी प्रकार कुंभराशि से क्रमवार छ राशियों जैसे: कुंभ, मीन, मेष, वृष, मिथुन और कर्क तक की राशियों का एक अन्य अर्धमण्डल (अर्धवृत्त)। इस अर्धवृत का स्वामित्व "चंद्र" को दिया गया है।
योग संख्या-6: **************
भानोर्धे विहगै: शूरास्तेजस्विनश्च साहसिका:।
शशिनो मृदव: सौम्या: सौभाग्य युता प्रजायन्ते।।
भावार्थ:- यदि किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में सूर्यादि सभी सात ग्रह सूर्य के आधीन छ राशियों के क्षेत्र (सिंह, कन्या, तुला, बृश्चिक, धनु, मकर) में हो तो वह जातक शौर्यवान, तेजस्वी और अदम्य साहसी होता है।इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में सूर्यादि सभी सात ग्रह चंद्र के आधीन छ राशियों के क्षेत्र (कुंभ, मीन, मेष, वृष, मिथुन और कर्क ) में हो तो वह जातक सरल और शान्त स्वभाव का शत्रुहीन और सुखभोगी होता है।
उपरोक्त योग को यदि हम श्री रघुकुल गुरु श्री वशिष्ठ कृत " वशिष्ठ संहिता " के अनुसार देखते है कि, " स्त्रियां चन्द्र के अंशबल से और पुरुष सूर्य के अंशबल से उत्पन्न होते हैं।"गुरु वशिष्ठ के उपरोक्त आदेश पर हम कह सकते हैं कि, " यदि किसी महिला की जन्मपत्रिका में सूर्यादि सभी सात ग्रह चंद्र के आधीन छ राशियों के क्षेत्र (कुंभ, मीन, मेष, वृष, मिथुन और कर्क ) में हो तो वह जातिका एक सर्वगुण सम्मपन्न राजयोगी होगी होगी।
योग संख्या 07. *************
पति कि प्यारी और धन-ऐश्वर्य से पूर्ण:-
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बृध्द यवन जातक: अध्याय 63 श्लोक-11 के अनुसार:
वक्रस्तृतीये रिपुसंस्थितो
षडवर्गशुध्दो रवि जश्च लाभे।
स्थिरे विलग्ने गुरू मा च युक्ते
राज्ञी भवेत् स्त्री पतिवल्लभा।।
भावार्थ:- जिस महिला की जन्मपत्रिका मैं :
(क)- तीसरे या छठे भाव में मंगल हो या शनि हो या
(ख)- एकादस भाव में मंगल हो या शनि हो
और और ये दोनों ग्रह षड(सप्त) वर्ग मैं शुध्द हो। या
(ग)- स्थिरराशियों ( 2,5,8,11) के लग्नभाव मैं बृहस्पति हो;
तो उपरोक्त योगों में वह महिला अपने पति कि प्यारी और धन-संपत्ति से पूर्ण होती है।
ग्रह कब शुध्द होता है ? *************
-कोई भी ग्रह जब सप्तवर्गकुंडलियों मैं तीन से अधिक वर्गकुंडलियों में अपनी राशि में, अपनी उच्चराशि में या अपने अधिमित्रग्रह की राशियों में आते है तो ग्रह शुध्द (शुभ फलदायक ) माना जाता है।षट्वर्ग : लग्न, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, त्रिशांश ये छः वर्ग होते है।सप्तवर्ग : उपरोक्त षट्वर्ग मे सप्तांश जोड़ देने पर सप्तवर्ग हो जाते है।विशेष: 1-सूर्य और चंद्र का त्रिशांश वर्ग नहीं होता।
2-होरा वर्ग केवल सूर्य और चंद्र का होता है शेष 05 ग्रहों मंगल से शनि तक का नहीं।
इस प्रकार से हम सभी 07 ग्रहों का अध्ययन केवल 06 वर्गों में ही कर पाते हैं।
प्रकृतिस्थ लग्नेन्द्वो: समभे सच्छोल रुपाढ्या।
भूषण गुणैरुपेता शुभवीक्षित योश्च युवति: स्याता।।
भावार्थ: यदि महिला जातक के दोनों लग्न ( जन्म और चंद्र) समराशि (12,2,4 में विशेषकर) हों तो वह पतिव्रता और सुन्दर चरित्र की होती है।
ऐसे दोनों लग्न यदि किसी नैसर्गिक सौम्यग्रह से देखे जाए तो निश्चित ही वह अलंकारों से युक्त नित्य रमणी बनी रहती है।
पिता एवं ससुराल पक्ष के लिए धनदात्री महिला :-
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होरारत्न: अध्याय-10 श्लोक-18के अनुसार:-
सौम्य क्षेत्रे उदये चंद्रे सार्धं शुक्रेण सा वधु:।
सुखी पिता पर्तिद्वेषा नित्यम स्थिरचारिणी।।
भावार्थ:- किसी स्त्री जातक का जन्मलग्न बुध की राशियों वाला (3 या 6) हो तथा
इस लग्नभाव में शुक्र और चंद्र की युति हो तो ऐसी महिला अपने पिता के घर में अपने लिए सभी प्रकार के सुख के साधन उत्पन्न कराती है और सुखी जीवन जीती है।अपने विवाह के पश्चात ऐसी महिलाए अपने ससुराल में भी अपना ऐश्वर्य और पूर्ण नियंत्रण बनाए रखती हैं।
संक्षेप में यह कन्या साक्षात लक्ष्मी और दुर्गा का स्वरुप होती है।
होरारत्न: अध्याय-10 श्लोक-19 के अनुसार:-
चन्द्रज्ञौ यदि लग्नस्थौ कुलाढ्या ब्रह्मवादिनी।
न शुक्रो यदि लग्नस्थौ सौम्य स्थाने कुलाढ्या।।
भावार्थ:- किसी स्त्री जातक का जन्मलग्न बुध की राशियों वाला (3 या 6) हो, तथा इस लग्नभाव में शुक्र आसीन हो या न भी आसीन हो तो भी ऐसी महिला सभी प्रकार से सुखी जीवन जीती है।[ उपरोक्त योगों के संबंध में कुछ विद्वानों का मत है कि यदि मिथुन लग्न हो तो कर्क और मीन के नवांश में न हो।यदि कन्या लग्न हो तो धनु और मीन के नवांश में न हो।]
जातक पारिजात के अध्याय -16 श्लोक-10 के अनुसार :-
युगल में विलग्ने कुज-सौम्य-जीव,
शुक्रैर्बलिष्ठे: खलु जातकन्या।
विख्यात-नाम्नी सकलार्थ तत्त्व,
बुध्दिप्रसिध्दा भवतीह साध्वी।।
भावार्थ:- यदि किसी महिला जातक की जन्मकुंडली का लग्नभाव समराशि का हो,मंगल, बृहस्पति,शुक्र और बुध बलवान हों तो वह जातिका सर्वगुणसंपन्न, विख्यात और दूसरों की पथप्रदर्शक (साध्वी ) होती है।विशेष: इस योग में केवल लग्न का ही समराशि में होना अनिवार्य है। ग्रहों का नहीं।
जातक पारिजात के अध्याय -16 श्लोक-21 के अनुसार :-
भावार्थ:- यदि किसी महिला जातक की जन्मकुंडली के लग्नभाव में या सातवे भाव में कोई भी राशि हो लेकिन नवमांशकुंडली के सातवे भाव में शुभग्रहों (बुध, बृहस्पति, सूर्य या शुक्र ) की राशियां आती हो और
2-वह नवांश राशीश लग्नकुंडली में शुभ प्रभाव रखता हो तो वह महिला अपने पति की प्राणवल्लभा होती है।3-साथ ही उस महिला का पति सर्वगुणसंपन्न होता है।
यह महिला के लिए सुखदायक स्थिति होती है।
मन-वाणी-कर्म से सत्यनिष्ठ महिला:-
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जातक पारिजात के अध्याय -16 श्लोक-25 के अनुसार :-
कलत्रराश्य अंशगते महीने मन्देक्षिते दुर्भ गमेति कन्या।
शुक्रांशके सौम्यदृशा समेते कलत्रराशौ पतिवल्लभा स्यात्।।
भावार्थ: - किसी स्त्री जातक के लग्नभाव में बलवान चंद्र और बुध की युति हो तो ऐसी महिला ईश्वर के प्रति अपने मन-वाणी-कर्म से सत्यनिष्ठ होती हैं।
[उपरोक्त योग के संबंध में कुछ विद्वानों का मत भी है कि लग्नभाव मंगल की राशि 1 या 8 का न हो।]
सुगमज्योतिष स्त्रीजातक/श्लोक-10 के अनुसार :-
सौम्याभ्याम् प्रवरा शुभत्रय युते जाता भवेद् भूपते:।
सौम्यर्केन पतिप्रिया मदनभे दृष्टे युते जन्मनि।।
भावार्थ:- किसी स्त्री जातक के सातवेभाव में तीन सौम्यग्रह (चंद्र-बुध- बृहस्पति-शुक्र में से) हों तो वह स्त्री रानी के समान जीवन जीती है।
2- यदि सातवें भाव में केवल एक सौम्यवह ग्रह ही हो लेकिन वह सौम्यग्रह द्वारा देखा जा रहा हो तो वह स्त्री अपने पति (जो बड़ा अधिकारी, मंत्री आदि हो) की प्राण-प्यारी होती है।
उपरोक्त कथन की पुष्टि जातक पारिजात अध्याय-16 श्लोक-34 भी करता है:-
राज अमात्य वरांगना यदि शुभे कामं गते कन्यका।
मारस्थे तु शुभत्रये गुणवती राज्ञी भवेद् भूपते।।
सामान्यतः लग्नभाव में स्थित चंद्रमा को (स्वराशिस्थ या अपनी उच्चराशि में स्थित के अतिरिक्त ) शुभ नहीं माना जाता किन्तु जातक पारिजात, अध्याय-16 श्लोक-36 का मत है कि:
स्त्रीजन्मलग्ने.....सर्वत्र चंद्रे सति तत्र जाता,
सुखान्विता वीतरतिप्रिया स्यात् ।।
भावार्थ- यदि किसी स्त्रीजातक की जन्मकुंडली के लग्नभाव में बलवान चन्द्र हो तो वह महिला सुन्दर,पति की प्यारी और सुखी रहती है। वह अपने वैवाहिक सुख और जीवन का संयत और संतुलित विधि से एक वीतरागी संन्यासी की तरह से निर्वहन करती है।।
बलवान चन्द्र से सामान्य आशय :-
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जन्मकुंडली में स्थित सूर्य से आगे तीसरे भाव और सूर्य से पीछे के तीसरे भाव में चंद्र को (सभी राशियों में) बलवान माना जाता है केवल अपने नीच नवांश में न हो।
सुगमज्योतिष स्त्रीजातक/श्लोक-4 के अनुसार :-
सप्तमेशे त्रिकोणस्थे केन्द्रे वा शुभवीक्षिते।
गुरुयुक्तं यदा मित्रे पतिसौख्यं ध्रुवम भवेत्।।
1-यदि किसी स्त्री जातक की जन्मकुंडली केे सातवेभाव का स्वामि किसी केन्द्र अथवा त्रिकोण भाव में हो, या
2-किसी सौम्यग्रह के साथ युति में हो, या
3-बृहस्पति या किसी सौम्यग्रह से दृष्ट हो तो उसे पति का सुख अवश्य मिलता है।
जातकतत्तवम्-सप्तमविवेक-78-88. के अनुसार:-
सपापा: लग्नार्थारीशा: सप्तमें बहुदारा।।
भावार्थ:- लग्न (1),अर्थ (2) और अरि (6) भावों के स्वामि यदि लग्न से सातवें भाव में हों तो एक से अधिक विवाह और,
यदि यह युति पापदृष्ट भी हो तो अत्यधिक शारीरिक संबंध हो सकते हैं।
-मदायेशौ बलिनौ कोणगौ बहुदारा:।।
भावार्थ:- यदि मद (7) और आय (11) भावों के स्वामिग्रह किसी त्रिकोण भाव में हों तो एक से अधिक विवाह और,
यदि यह युति पापदृष्ट भी हो तो अत्यधिक शारीरिक संबंध हो सकते हैं।
-दारायपौ युतौ व अन्योन्येक्षितो बहुदारा।।
भावार्थ:- यदि दार (7) और आय (11) भावों के स्वामिग्रह किसी भी प्रकार से *संबंध बनाए हों।
यदि यह युति पापदृष्ट भी हो तो अत्यधिक शारीरिक संबंध हो सकते हैं।
*संबंध से आशय: ग्रह आपस में चार प्रकार से संबंध बनाते हैं।
1-युति, 2-एक-दूसरे को देखना, 3- एक-दूसरे की राशि में आना।
चौथे संबंध पर पराशरीय/वरा: मतानुसार कोई ग्रह यदि जिस राशि पर आसीन हो उस राशि के स्वामिग्रह को भी देखता भी हो तो यह भी द्विग्रही संबंध है, किन्तु आधुनिक विद्वानों की मानना है कि यह ग्रह का एकल संबंध है, द्विग्रही नहीं।
"फलदीपिका" एक पांचवां संबंध भी कहती हैं।
"फलदीपिका" किन्हीं दो ग्रहों के परस्पर 1, 4, 7 और 10 वे भाव में होने पर भी द्विग्रही संबंध मानती है।
उपरोक्त तीन प्रकार के द्विग्रही संबंध निर्विवादित है।
बुधो विलग्ने यदि तुंगसंस्थौ लाभाश्रितो देवपुरोहितश्च।
नरेन्द्रपत्नी वनितात्रयोगे भवेत् प्रसिध्दा धरणीतलेsस्मिन।।
यदि किसी स्त्रीजातक के लग्न में अपनी उच्चराशि (6) में स्थित बुध हो और आयभाव में बृहस्पति हों तो वह स्त्री अति धनवान और शक्तिशाली पुरुष को पतिरुप में पाती है।
सारावली अध्याय-45 के श्लोक संख्या 21 के अनुसार :-
द्यूने वृध्दो मूर्ख: सौरगृहे स्वान्नवाशके वाsय।
स्त्रीलोल: क्रोधपर: कुजभेsथ नवांशके भर्ता।।
भावार्थ: यदि किसी महिला जातक की जन्मकुंडली के सातवे भाव में कोई भी राशि हो लेकिन,
नवमांशकुंडली के सातवे भाव में शनि की राशि मकर या कुंभ आयी है तो उस महिला का पति उससे आयु में बड़ा और कम बुध्दि वाला हो सकता है।
इसी प्रकार से यदि यदि किसी महिला जातक की जन्मकुंडली के सातवे भाव में कोई भी राशि हो लेकिन,
नवमांशकुंडली के सातवे भाव में मंगल की राशि मेष या बृश्चिक आयी है तो उस महिला का पति स्वभाव से अधिक क्रोध करने वाला हो सकता है।
जातक पारिजात के अध्याय -16 श्लोक-25 के अनुसार :-
शून्य अस्ते का पुरुषो बलहीन सौम्य दर्शनविहीने।
चरभे प्रवासशीलो भर्त्ता क्लीबो ज्ञ-मन्दयोश्च भवेत।।
भावार्थ:- यदि महिला जातक की कुंडली में जन्मलग्न या चंद्रलग्न से ( दोनों में जो बलवान हो) सातवे भाव में:
1- कोई ग्रह न हो तो : उसका पति प्रशंसा के योग्य नही होता। अर्थात्त साधारण व्यक्तित्व का होता है।
2-किसी सौम्यग्रह की दृष्टि भी न हो तो: उसका पति शौर्य और पराक्रम से हीन हो सकता है।
3-सातवे भाव में चरराशि और चर ही नवमांश आया हो तो: पति भ्रमणशील रहता है।
4-सातवे भाव में बुध और शनि की युति हो: तो पति नपुंसक हो सकता है।।