सनातन हिंदू धर्म में त्रिदेवों में एक देव ब्रह्मा जी की पूजा नहीं की जाती.
सनातन हिंदू धर्म में त्रिदेवों में एक देव ब्रह्मा जी की पूजा नहीं की जाती.
इसी कारण संपूर्ण भारतदेश में राजस्थान राज्य में पुष्कर नामक शहर में ब्रह्मा जी का मात्र एक ही मंदिर है.
इस कुख्यात मान्यता के संबंध में श्रीमदभागवत् के इस श्लोक का कुप्रयोग किया जाता है:
वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयंभूर्हतीं मन:। अकामां चकमे क्षत्त्: सकाम् इति न: श्रुतम् ॥ (श्रीमदभागवत् 3/12/28)
इस श्लोक का साधारण सा अर्थ है किः किसी स्वयंभू (स्वयं ही राजा बना व्यक्ति) की पुत्री युवा हो गई थी किन्तु उस पर काम वासना का प्रभाव नहीं हुआ था. फिर भी स्वयंभू उस पर मोहित हो गए. ऐसा सुना जाता है.
"एतरेय् ब्राहम्ण्" नामक ग्रंथ में ऐसा ही लिखा हैः
प्रजापतिवै स्वां दुहितरमभ्यधावत् दिवमित्यन्य आहुरुषसमितन्ये तां रिश्यो भूत्वा रोहितं भूतामभ्यैत् तं देवा अपश्यन् “अकृतं वै प्रजापतिः करोति” इति ते तमैच्छन् य एनमारिष्यति तेषां या घोरतमास्तन्व् आस्ता एकधा समभरन् ताः संभृता एष् देवोभवत् तं देवा अबृवन् अयं वै प्रजापतिः अकृतं अकः इमं विध्य इति स् तथेत्यब्रवीत् तं अभ्यायत्य् अविध्यत् स विद्ध् ऊर्ध्व् उदप्रपतत् ( एतरेय् ब्राहम्ण् 3/333)
इस श्लोक का साधारण सा अर्थ है किः
प्रजापति अपनी बेटी की तरफ दौडा . उस लाल लडकी के पीछे भागा. देवताओं ने देखा. कहा कि ये प्रजापति तो गंदा काम कर रहा है. तब उन्होंने तमाम बड़े बड़े शरीर जोड़ कर एक भारी ग्रुप बना दिया. उस ग्रुप से देवताओं ने कहा कि यह प्रजापति गंदा काम कर रहा है. इसे मार दे. उस ग्रुप ने तथास्तु कहकर प्रजापति को एक तीर मारा. प्रजापति घायल हो कर वहीं गिर गया.
उपरोक्त दोनों श्लोंकों की अपरिपक्व परिभाषा के कारण ही सामान्य जन में ब्रह्मा जी के चरित्र को कंलंकित करने का दुष्प्रयास किया गया. और इस दुष्प्रयास में वे लोग सफल भी हो गए.
ऐसा भी नही कि इन दोनों श्लोकों के उपरोक्त भावार्थ की समीक्षा नही हुई किन्तु दूसरा वर्ग इसमें असफल ही रहा.
दूसरे वर्ग ने अपनी व्याख्या में कहा किः उक्त श्लोक के अनुसार प्रजापति दौड़ा लाल रंग की लड़की की तरफ दौड़ा. लेकिन ब्रह्मा की बेटी सरस्वती तो धवल यानि सफेद हैं. फिर ये लाल लड़की कौन है ?
हां उषा लाल है. उगते हुए सूरज के समय आसमान में जो लाली होती है उसे उषा कहा गया है .
लेकिन उषा तो ब्रह्मा की बेटी ही नहीं है.
अब प्रश्न है कि ये प्रजापति हैं कौन? और कौन है उसकी बेटी.
अथर्व वेद में एक श्लोक हैः
सभा च मा समितिश्चावतां प्रजापतेर्दुहितौ संविदाने। येना संगच्छा उप मा स शिक्षात् चारु वदानि पितर: संगतेषु।
इस श्लोक अर्थ है किः सभा और समिति ये दो प्रजापति की दुहिता यानि बेटियों के समान हैं.
सभा माने ग्रामसभा और समिति माने प्रतिनिधि सभा.
इन सभाओं के सभासद के लिये राजा पिता के समान हैं.
किन्तु राजा को उनकी पूजा (सम्मान) करनी चाहिए, उनसे सलाह लेनी चाहिए. राजा यानी प्रजापति की जिम्मेदारी है. वह अपनी बेटी समान सभा और समिति का पूरी सुरक्षा प्रदान करें. लेकिन पूरी सुरक्षा प्रदान करने के बावजूद वह उन पर अपना अधिकार नहीं जता सकता. प्रजा को पालने के दायित्व के कारण राजा को प्रजापति अथवा प्रजापिता कह गया. प्रतिनिधि सभा के सभासद राजा चुनने का काम करते हैं.
इसी संदर्भ में ऋगवेद का यह श्लोक देख लेंः
पिता यस्त्वां दुहितरमधिष्केन् क्ष्मया रेतः संजग्मानो निषिंचन् । स्वाध्योऽजनयन् ब्रह्म देवा वास्तोष्पतिं व्रतपां निरतक्षन् ॥ (ऋगवेद -10/61/7)
इसका अर्थ ये है कि राजा यानि प्रजापति ने अपनी बेटी यानि प्रजा पर हमला कर दिया. प्रजा ने क्रांति छेड़ दी. राजा की हार हो गई. फिर बड़े बुजुर्गों ने उस राजा के दैनिक व्यय के प्रबंध की व्यवस्था कर दूसरा राजा चुना.
सीधा सा अर्थ ये कि स्वयंभू राजा ने प्रजा से जबरदस्ती की. उसकी उसे सजा मिली.
अब अनर्थ यहां होता है ये कोई स्वयंभू अर्थात्त स्वयं ही राजा बना व्यक्ति प्रजापति दो हैं. यह कहां सिध्द होता है कि ये त्रिदेव में से एक ब्रह्मा जी ही थे. दूसरे श्लोक में प्रजापति शब्द का प्रयोग है। हर किसी राजा को प्रजा का पालक होने के कारण प्रजापति कहा जाता है। इसमें हमारे त्रिदव ब्रह्माजी का नाम कैसे लपेट दिया गया
सनातन धर्म से विद्वेष करने वाले लोगों ने दोनों को गड्ड मड्ड कर अपना कुप्रचार करना चालू रखा। दुर्भाग्यवस यह कुतर्क हमारी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता गया और हम लोग गुमराह होते रहे.











