*कविता - प्रेम-कविता *
प्रिय! मेरा लिखा तो पढने की फुरसत हैं ही नहीं तुम्हे. प्रेम कवितायेँ पसंद हैं तुम्हे, तुम्हे खाने में, मीठा पसंद है, मुझे भी पसंद है, प्रिय, पर कुछ कड़वे के बाद, ज्यादा मज़ा आता है तुमने कवितायेँ ना पढ़ मेरी थोड़ी, कडवाहट घोल दी अब मैं,प्रेम कविता लिख हमारी, मिठाई का बन्दोबस्त करता हूँ. सुनो अब प्रिय! स्मृतियों की बात करता हूँ..
स्मृतियाँ अनखुली चिट्ठियाँ हैं प्रिय पता तो है कि अन्दर क्या होगा कब कितना होगा नहीं पता
अब एक स्मृति है अड़हुल के फूलों की प्रिय द्वार एक दो तीन नहीं चार पेड़ थे
दो तरह के अड़हुल अब दोनों साथ याद आते हैं
याद आती हैं अपनी अंजुलि द्वार पर ही का कुआँ याद आता है
फिर कुँए के साथ याद आती है कुँए के बगल की हरी घास फिर घास के याद आते पुआल के टीले याद आते है फिर टीलों से उनपर चढ़ तितलियाँ बघुआ तितलियाँ पकड़ना फिर तितलियों से नहर याद आता है जो वही से आती थी तितलियाँ फिर नहर से छठ और तैरना फिर तैरने से पानी याद आता है फिर नहर का अंजुलि में बंद छितरता पानी फिर
याद आते हैं अड़हुल फिर याद आती हो तुम प्रिय यह तो केवल
प्रेम ही होगा..
यह तो केवल
प्रेम ही होगा.. ------ -पुष्कर











