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उधड़ी हुई जेबों से हमेशा गिरकर कुछ खोता नहीं है
कभी-कभी अटका रह जाता है दुबका हुआ कोई सिक्का या नोट
वो नहीं जाना चाहता बाहर उस जेब से
क्यूंकि जब वो मिला था जेब में रखे कई सिक्कों से
तब सीखा था पहली बार उसने खनखनाना।
उधड़ी हुई जेब से जब सरक गए बाकी के सिक्के
तो वो बचा हुआ सिक्का जेब का एक कोना पकड़ बैठा रहा
वापस खनखनाने के लिए।
मैं जब भी
ज़िंदगी की भट्टी में तप कर
कई सच -झूठ से थक कर
कई दफ़ा ख़ुद से लड़ के
जब उस छोटी सी मेज़ तक जाती हूं
जहाँ जमा हैं कई किताबें
तो मानो यूँ लगता है
उन किताबों के पन्नों में समा गई हो
समस्त कोमलता।
रात भर खुद से बात करते हैं,
जो पड़ा हुआ है आइना,
कोने में कहीं, उसे आज फिर से पकड़ते हैं।
चलो ना आज खुद से बातें करते हैं।।
क्यों ना खुद को रात भर उधेड़ कर,
सुबह फिर से बिनते हैं।
पुराने हो चुके धागों को,
एक बार फिर से रंगते हैं।
चलो आज अपनी बातें खुद से ही करते हैं।।
कई पैमानों पर नापे जाने के बाद,
क्यों ना अपने बनाए पैमाने पर नपते हैं।
देखो, खुद से ही खुद पर कितना खरे उतरते हैं।।
रात भर खुद से बातें करते हैं।।
वो मटमेली सी यादों में,
हम अपने बिछड़े कल से मिलते हैं।
सबकी बातें छोड़,
आज रात बस खुद से खुद की बातें करते हैं।
निराशा, दर्द के अंधेरे को दरकिनार कर,
उम्मीदों की रोशनी में चलते हैं।
आज रात एक नए भोर की ओर बढ़ते हैं।
रात भर खुद से खुद की बातें करते हैं।।
जो दर्द ओ जख्म दिख रहे हैं,
वो सब से छुपाएं कैसे हम?
जो छिपे हुए हैं सब से,
उन्हें दिखाए कैसे हम??
और वो देखकर मरहम लगाएगें नहीं,
ये बात दिल तक पहुंचाए कैसे हम?
झूठ को हक़ीक़त
और हक़ीक़त को झुठलाये कैसे हम?
वो आँखों से रिसते आंसू,
उनकी हथेलियों तक लाये कैसे हम??
वो चल रहे हैं रफ़्तार से मंज़िल की ओर,
हम धीरे-धीरे उन तक जाएं तो जाएं कैसे??