'एक कहानी यह भी' का 'एक ‘मलाल’ यह भी': समीक्षालेख (सौरभ शेखर)
‘एक कहानी यह भी’ का ‘एक ‘मलाल’ यह भी’: समीक्षालेख (सौरभ शेखर)
“आखिर आत्म-कथाओं में ऐसा क्या होता है कि वे साहित्य ही नहीं साहित्येतर पाठकों को भी आकर्षित करती हैं. क्या दूसरों की ज़ाती ज़िन्दगी में ताक-झाँक और उससे उत्पन्न ‘विकेरिअस प्लेज़र’ इस आकर्षण के मूल में होता है? या प्रसिद्ध और कामयाब शख्शियतों की ज़िन्दगी से जुड़े संघर्षों, उनकी दुविधाओं, उनकी नाकामियों, उनके मान-अपमान में कहीं हम अपनी साधारण सी ज़िन्दगी का कोई अक्स तो नहीं ढूंढ रहे होते; अपने सच और झूठ…
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