Marad Maar Dalega Lyrics - Khesari Lal Yadav
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शंकर जी---तुम्हारे ख्वाब से दिलकश नज़ारा और क्या होगा!
By
Shyam Shankar SharmaJaipur,Rajasthan
चल सके तो चल इस तरह से तू नजीर कि तू न चल सके तो तेरी दास्ताँ चले!महान युगंधर संगीतकार शंकर सिंह रघुवंशी पर यह दो पंक्तियाँ अक्षरक्षः सत्य स्थापित होती है।शंकर जी वास्तव में अपने समस्त जीवन में अपने रघुवंशी नाम को सार्थक करते रहे।"रघुकुल रीती सदा चली आई,प्राण जाय पर वचन न जायी"रघुकुल की भांती इस रघुवंशी ने भी सदा मर्यादित जीवन जिया और सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर भी कभी अहंकार नहीं किया,हाँ स्वाभिमान उनकी रगों में कूट कूट कर भरा था।जो मर्यादित होते है उन्हें सदैव कठिन परीक्षा देनी होती है,जिस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को कई परीक्षाएं देनी पड़ी ठीक उसी प्रकार शंकर जी को अंतिम समय तक कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा,किन्तु संगीत का यह महान योद्धा निर्भीक होकर काल प्रस्तर पर अपने अमिट चिन्ह छोड़ता गया और अंतिम सांस तक सिर्फ और सिर्फ संगीत की वायु में जिया।सिर्फ संगीत इसके अलावा शंकर जी का ध्यान कही जाता ही नहीं था,संगीत साधना में ही जिए और उसी में रत रहते हुए संसार से ख़ामोशी से विदा ली।तुम्हे अपना कहने की चाह मेंकभी हो सके न किसी के हमयही दर्द मेरे जिगर में हैमुझे मार डालेगा बस ये गमजिन्हें इस जहाँ ने भुला दिया मेरा नाम उनमे ही जोड़ दो!जिस प्रकार कुम्भ का केंद्र गंगा है,संगीत का केंद्र शंकर जी थे।भारतीय सिने इतिहास में उन जैसा गुणी संगीतकार पैदा ही नहीं हुआ।वो नितांत अकेले थे,संगीत उनका साथी था और जिसका साथी संगीत होता है वह प्रकृति प्रदत्त महान इन्सान होता है।दक्षिण भारतीय हैदाराबाद निवासी इस महान व्यक्तित्व ने संगीत की वो प्रचंड गंगा अपने भागीरथी प्रयास से उत्सर्जित की कि उसकी पावन संगीत धारा समस्त हिंदुस्तान ही नहीं अपितु समस्त विश्व को आज तक आनंदित कर रही है।संगीत अध्यात्म का सामान्य अर्थ इसमे निहित सहज भाव है।मानव के व्यक्तिगत व् सामाजिक जीवन के चिंतन,चरित्र तथा व्यवहार की निरंतर परिष्कृति शंकर जी के विचारों एवम् कार्य योजना में सूर्य की स्वर्णिम किरणों की भांति झिलमिला रही थी,इनमे आशा का सवेरा हो रहा था,वर्तमान के क्षण से जिन घटनाओं को आगे बढ़ना था उसकी समस्त पृष्ट भूमि तैयार हो चुकी थी,अब तो बस संगीत के भविष्य का नव आरम्भ करना था।महानता की कसौटी क्या है? क्या है इसका माप दंड?भर्तहरि ने महानता को परिभाषित किया है।"निंदा,प्रशंसा, सम्पत्ति, विपत्ति,जीवन-मरण की स्थति में भी महा पुरुष अपना संतुलन नहीं खोते,स्थिर और शांत रहते हैं, धैर्य रखते है,"इस प्रकार के महा पुरुष ही विश्व क्षितिज पर सूर्य की भांति चमकते है,उनका प्रकाश और चमक उनके श्रेष्ठ कार्यो,सद्गुणों व् तपस्या का परिणाम होता है जो उन्हें आकाशीय ऊंचाइयां प्रदान करता है।यह सभी गुण शंकर जी को प्राप्त थे।शंकर जी का दिव्य संगीत उन्मुक्त उड़ते पंछी के मानिंद था,वह आश्चर्य जनक संगीत रचना कर शब्दो को उसमे समां लेने की योग्यता रखते थे,उनके लिए संगीत की कोई तय सीमा नहीं थी,वो संगीत के सूत्रों के हिसाब से संगीत सृजन नहीं करते थे,वो हृदय से संगीत देते थे,यह काम सिर्फ एक जीनियस ही कर सकता है और वो जिनियस थे शंकर जी। शैलेन्द्र ने उनके लिये शायद यह गीत लिखा होगा-------काम नये नित गीत बनानागीत बनाके जहाँ को सुनाना
Shyam Shankar SharmaJaipur,Rajasthan
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