बीते दिसंबर माह में अपना कार्यकाल यूपी भाजपा अध्यक्ष के रूप में पूरा कर चुके मेरठ शहर से भाजपा के विधायक और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे डाॅक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई के स्थान पर कौन या फिर वहीं? को लेकर चली चर्चा आठ अप्रैल को उस समय समाप्त हो गई जब देश को कई प्रधानमंत्री देने वाले इलाहाबाद के फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से विजयी सांसद श्री कैशव प्रसाद मोर्या को यूपी के भाजपा अध्यक्ष की कमान सौंप उन्हे पिछड़ा वर्ग को आकर्षित करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। तीन साल 11 माह 25 दिन के कार्यकाल में डाॅक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई के नेतृत्व में यूपी में चुनाव लड़ी भाजपा के 73 सांसद जीत कर आए दस नगर निगमों में भाजपा के मेयर बने और 2 करोड़ के आसपास इस पार्टी की लोगों ने सदस्यता ग्रहण की। इन उपलब्धियों के साथ ही बीते वर्ष और माह संपन्न हुए स्थानीय निकायों के एमएलसी व ब्लाॅक प्रमुखों जिला पंचायत अध्यक्षों व ग्राम पंचायतों के चुनाव में भाजपा को भारी पराज का मुंह देखना पड़ा। और गाजियाबाद, मेरठ, स्थानीय निकाय क्षेत्रों में तो उसे उस समय भारी फजीयत उठानी पड़ी थी जब सपा से लाकर विरेंद्र यादव को संभावित उम्मीदवार बनाया गया और कुछ ही घंटे बाद वह सपा में चले गए तथा भाजपा अपना उम्मीदवार भी यहां लड़ा न पाई। ऐसी शर्मनाक स्थिति के अलावा इस पार्टी में गुटबंधियां भी खुब रही। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कैशव प्रसाद मोर्या के माध्यम से भाजपा पिछड़ों को आकर्षित कर 2017 का विधानसभा चुनाव यूपी में जीत सकती है। तो मेरे को लगता है कि ऐसा संभव नहीं है क्येांकि जाट आरक्षण को लेकर तथा चैधरी चरण सिंह के स्मारक को दिल्ली में जगह न देने से यूपी ही नहीं देशभर का जाट मतदाता इस पार्टी से फिलहाल खिन्न नजर आ रहा है तो दूसरी ओर भाजपा का परम्परागत मतदाता भी इससे कोई ज्यादा खुश नजर नहीं आते क्योंकि जिस दिन से केंद्र में भाजपा की सरकार श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी है तब से वैश्य समाज की अवहेलना और उत्पीड़न तथा व्यापारियों के खिलाफ केंद्र सरकार का एक अनकहा उत्पीड़ानात्मक आंदोलन जो शुरू हुआ उसने देश के सर्राफा व्यवसायों के रूप में व्यापारियों की कमर तोड़कर रख दी है और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या भविष्य में यह पार्टी हमे संरक्षण दे पाएगी। कल क्या होगा यह तो वक्त ही बता सकता है लेकिन फिलहाल देश भर के सर्राफा व्यवासायी व अन्य व्यापारी भाजपा से दूर नजर आ रहे हैं ऐसे में अगर 2017 के विधान सभा चुनाव तक डाॅक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई को ही यूपी की कमान सौंपी गई होती तो इस पार्टी के लिये उचित था वहां क्योंकि सब कुछ ढंका छिपा था । वाजपेई सबकी नब्ज टटोले हुए थे जो चुनाव यह पार्टी हारी तो उससे पहले से ही उसका कोई बड़ा जनाधार वहां नहीं था। हां कुछ निणर्य गलत रहे तो ऐसा सिर्फ डाॅक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई के साथ ही नहीं सब के साथ है।
जिसके उदाहरण के रूप में पीएम मोदी जी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह साहब बिना चुनाव जीते केंद्र वित्त और सूचना मंत्रालय का काम संभाल रहे अरूण जेटली साहब और मानव संसाधन मंत्रालय का काम देख रही स्मृति ईरानी की कार्यणाली को देख सकते है। क्योंकि आज अरूण जेटली की कार्यणाली से देश का आम मतदाता बुरी तरह आहत है तो स्मृति ईरानी द्वारा आईआईटी कानपुर की बढाई गई फीस व अन्य मुददो को लेकर इस पार्टी का काफी बड़ा विरोध हेा रहा है क्योंकि दोनो ही नेता सही मायनो में चुनाव न जीतने के कारण जनप्रतिनिधि नहीं कहलाए जा सकते इसलिये उन्हे जनता की परेशानियां का उतना ज्ञान नहीं है तो जब इन्हे आज तक मंत्री पद से भी हटाया जा रहा है तो डाॅक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई को हटाने का भी कोई बड़ा बिंदु इस समय नजर नहीं आता था। रही बात केशव प्रसाद मोर्या की तो एक चाय और अखबार बेचने वाले से वो इतने प्रतिष्ठित क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गए और अब यूपी भाजपा के अध्यक्ष बनाए गए हैं। मुझ जैसे लोग उन्हे जरूर स्पोर्ट करेंगे क्योंकि मैं खुद अपने जीवन की शुरूआत 50 पैसा महीने से एक चाय वाले की दुकान पर जसपुर उत्तराखंड में झूठे प्याले धोने से शुरू कर चुका हूं तथा मुझे मेरठ में मेरठ समाचार नामक अखबार बांटने की नौकरी भी नहीं मिल पाई थी तो मेरी और मेरे लोगों की भावनाएं तो इन कारणों से मोर्या जी के साथ हो सकती है। मगर लगता नहीं है कि वो भाजपा के 2017 के चुनाव में नैया पार लगा पाएंगे। जो भी हो यह उनकी पार्टी का मसला है और निर्णय लेने वाले नेता बेइंताह समझादार है इसलिये आज बड़े पदो पर बैठे हैं। मगर एक बात समझ से बाहर नजर आ रही है कि वो यह है कि इस पद से हटाए गए डाॅक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेई के गृह जनपद और उनके चुनाव क्षेत्र में खुद वाजपेई की उपस्थिति में खिलखिलाहट के बीच उनके खास समर्थकों द्वारा मिठाई बांटे हुए एक दूसरे को जो लडडू खिलाए गए उनकी मिठास यूपी विधानसभा चुनाव तक कायम रह पाएगी या नहीं। यह तो समय ही बताएगा।