Nov 21, 2019
ब्रह्म में ढुँढ्यौ पुरानन वेदन,भेद सुन्यौ चित चौगुन चायन ।
देख्यौ सुन्यौ न कहूँ कबहुँ,वह कैसे स्वरुप औ कैसे सुभायन ।।
ढूँढ़त ढ़ूँढ़त ढ़ूँढ़ फिरयौ,"रसिखान" बतायौ न लोग लुगायन ।
देख्यौ कहाँ वह कुंज कुटीन में, बैठौ पलोटत राधिका पायन ।।
- श्री रसखान जी








