Brandvance Galactic Invaders, Tangerine Computers, c. 1980


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Programmable TV-GAME
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टीवी-गेम से बच्चों में हो रहा यह बड़ा नुकसान टीवी-गेम से बच्चों में हो रहा यह बड़ा नुकसान - बच्चे स्कूली किताबों के इतर कुछ भी पढ़ने से दूर होते जा रहे हैं। यही वजह है कि बच्चों की तमाम पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। कभी बच्चे कॉमिक्स खूब पसंद करते थे, लेकिन अब टीवी ने उन्हें इससे भी दूर कर दिया है। शायद यही वजह है कि किताबों के बहुत से कार्टून कैरेक्टर अब टीवी पर नजर आने लगे हैं। पत्रिकाओं से दूरी की वजह से बच्चों में कल्पनाशीलता घट रही है और टीवी उन्हें दूसरी कई समस्याएं दे रहा हैं। ज्यादातर बच्चे स्कूल से आने के बाद दिन भर टीवी से चिपके रहते हैं। स्कूल की किताबों से इतर वह दूसरी किताबों को नहीं पढ़ पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी वजह से उनमें कल्पनाशीलता घट रही है। बदलते दौर में बच्चों की दुनिया सीमित होती जा रही है। उनके मानसिक विकास में भी कमी आ रही है और उनकी सोचने की क्षमता पर भी बहुत फर्क पड़ रहा है। टीवी की वजह से भाषा का नहीं हो पा रहा विकास : टीवी देखने का समय भी अभिभावक आमतौर पर निर्धारित नहीं करते हैं। या तो बच्चे स्कूल और होमवर्क में व्यस्त रहते हैं या फिर कार्टून चैनलों में। आधुनिक माओं का यही मानना है कि बच्चा जितनी देर टीवी में व्यस्त रेहगा तो उन्हें अपना काम करने में आसानी रहेगी और साथ हीे उन्हें बच्चे पर नजर रखने में सुविधा रहेगी। ऐसे में टीवी एक सरल माध्यम के तौर पर उन्हें उपलब्ध है। लेकिन विषय से अलग किताबें न पढ़ने की वजह से एक तो उनमें ज्ञान की कमी आ रही है, इसके अलावा वह सामान्य बोलचाल की हिंदी पढ़ने में भी उन्हें कई बार दिक्कत आती है। इसकी वजह भी साफ है, स्कूली किताबों की और दूसरी किताबों की भाषा में फर्क होता है। सोशल साइट पर भी कार्टून बच्चों की पसंद को ध्यान में रखते हुए व उनकी दिलचस्पी को देखते हुए स्कूलों में कार्टून स्केच और प्रोजेक्टर के द्बारा बच्चों को बातें समझाई जाती हैं। ज्यादातर बच्चे भी उसी चीज के तरफ आकर्षित होते हैं। ठीक उसी प्रकार मां-बाप अगर बाहर कहीं जाते हैं तो उनके फोन में पड़ी कार्टून वीडियो दिखा कर शांत कराते हैं और वीडियो न हो तो वह यू-टूयोब के जरिए बच्चों को कार्टून दिखाते हैं। आज के समय में ज्यादातर बच्चे लोरी नहीं टीवी में प्रदर्शित जिंगल या विज्ञापन सुन कर शांत होते हैं। अगर टीवी देखने को न मिले तो यह काम उनका मोबाइल आसान कर देता है। अधिकतर बच्चे मोबाइल में गेम ख्ोलना पसंद करते हैं। 8० फीसदी घट गई है कॉमिक्स की बिक्री बच्चों की कई पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं और अब धीरे-धीरे कॉमिक्स का बाजार भी सिमट रहा है। राजाजीपुरम के तुलसी बुक डिपो के मालिक अजय राजपूत बताते हैं कि पिछले पांच साल में 8० फीसदी कॉमिक्स की बिक्री घटी है। उनका भी मानना है कि बच्चे अब कम ही मैग्जीन या कॉमिक्स खरीदने बाजार आते हैं। उन्होंने बताया कि सिर्फ पत्रिकाओं से ही नहीं बच्चे अब कलरबुक भी कम ही खरीदते हैं। और अगर कुछ बच्चे इनके लिए आते भी हैं तो वह भी उन्हें कार्टून कैरेक्टर वाला ही चाहिए। पिक्चर से मोशन पिक्चर में गया कार्टून जैसे-जैसे दुनिया में डिजिटल का विस्तार हुआ बच्चों के ख्ोलने और टाइम पास के तरीके भी बदल गए। पुराने जमाने में बच्चे ख्ोल-कूद में समय बिताते थ्ो। इसके बाद कॉमिक्स का दौरा आया जिससे चित्रों के साथ कहानी का लजवाब संग्रह था। अब तकनीक ने हाथ फैलाए तो बच्चों के टाइम पास के लिए लिए भी विभिन्न तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत होते है। आज के दौर में कॉमिक्स के किरदार टीवी के कार्टून में उतर आए हैं।
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