॥विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त॥
जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी राजनारायणाचार्य महानुभाव ! निम्नलिखित लघुप्रबन्ध को अवश्य ही पढ़ें ।ज्ञातव्य है कि जहाँ पर विभिन्न प्रकार के ‘ वाद ‘ होगें, वहाँ पर ‘ विवाद ‘ भी होगा,पर जहाँ पर एक ही ‘ वाद ‘ है,एक ही ‘मत ‘ है,भला वहाँ पर कैसा विवाद ?अतिशय प्राचीन ‘ श्रीसम्प्रदाय ‘ की दो मूल शाखाएँ हैं ।१. आचार्य श्रीवैष्णव { आचारी }२. वीतराग श्रीवैष्णव { वैरागी }दोनों ही विशिष्टाद्वैत सिद्धांत को…
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