ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो......
फिर ऊपर-फिर नीचे होकर मानव जीवन को दर्शाती हो
ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो।......
जिस तरह तुम शांत जल में कलावाजीयाँ खाती हो,जीवन जीने का राज तुम सिखलाती हो।
ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो।......
अपनी आँखों को ना झप्पकाकर तुम,मानव को अपने लक्ष्य की ओर आँख खोले रखने का ध्यान दिलाती हो।
ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो।.....
जिस तरह तुम जल में भोजन की तलाश में यहाँ से वहाँ होकर, आज के मानव की स्थिति को दर्शिाती हो।
ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो।......
हमेशा जीवन में गतिशील रहने का मार्ग बदलाती हो।
ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो............ओ मच्छली तुम कितनी सुन्दर,जिस तरह तुम लहेराती हो......
— अतुल सोनी
Pen is the tongue Of mind















