बहुत पहले की बात है, एक नगर में सोमदत्त नाम का एक आदमी रहता था। वह अपना छोटा-मोटा व्यापार करता था।
एक बार कुछ रुपयो की वसूली के लिए दूसरे नगर में जाना पड़ा । नगर बहुत बड़ा था। वह पैदल ही चल पड़ा । उस नगर में पहुँचकर उसने अपना सारा काम निपटा लिया। उसने बड़े कोशिश की कि अन्य यात्री उसके साथ वापस चले । लेकिन कोई यात्री तैयार न हुआ। निराश होकर वह अकेला ही चल पड़ा।चलते चलते रास्ते में ही शाम हो गया। सामने एक गाँव दिखाई पड़ा । उसने तय किया कि रात इसी गाँव में बिताये जाए क्योंकि जंगली रास्ता था जहाँ चोर डाकुओं का भय था । इसलिए व्यापारी ने उससे गाँव में रात बिताने का निश्चय किया।लेकिन समस्या यह थी कि इतना धन लेकर वो कहाँ ठहरे । अगर किसी ऐसे वैसे आदमी को पता चल जाये कि उसके पास इतना धन है तो वह उसे मारकर धन हड़प सकता है।अगर किसी अपरिचित आदमी को धन रखने को देते हैं तो क्या पता बाद में उसकी नीयत बदल जाए और वह धन न लौटाये।
बहुत खोजने पर उसे एक सराय का पता चला । वह सराय में पहुँचा और चौकीदार से रात भर रूकने की जगह माँगी। सराय का चौकीदार उसे भला आदमी लगा, क्योंकि उसने उसे तुरंत एक दहलीज पर सोने की जगह दे दी। सोमदत्त ने विचार किया कि क्यों न वह अपना धन इस चौकीदार के यहाँ रखवा दे सवेरे जाते समय ले लेगा।
यह तय करके उसने अपना सारा धन चौकीदार को दे दिया।
लेकिन इतना धन पाकर चौकीदार की नीयत बदल गयी। उसने सोचा कि किसी तरह रात में इस व्यापारी को मारकर सारा धन हड़प लूँ ।रात में ही सेठ जी की लाश नदी में बहाकर ठिकाने लगा दूँगा।इसके बात का किसी को पता नही चलेगा। उस चौकीदार का एक बेटा था जो नशेड़ी था। रात-दिन नशे में मस्त रहता था। उस दिन उसे खूब अफीम खा ली थी। रात में वह नशे में लौटा। वो अपनी जगह एक आदमी को सोया देखकर बिगड़ गया और कहा - ' दूसरी जगह सोओ यहाँ रोज मैं सोता हूँ।
सोमदत्त ने सोचा झगड़ा झंझट से कोई फायदा नहीं है। किसी तरह रात बितानी है।वह उठकर दूसरी जगह सोने चला गया ।चौकीदार का बेटा चादर ओढ़कर वही सो गया। आधी रात को "जैसी करनी वैसी भरनी "
बहुत पहले की बात है, एक नगर में सोमदत्त नाम का एक आदमी रहता था। वह अपना छोटा-मोटा व्यापार करता था।
एक बार कुछ रुपयो की वसूली के लिए दूसरे नगर में जाना पड़ा । नगर बहुत बड़ा था। वह पैदल ही चल पड़ा । उस नगर में पहुँचकर उसने अपना सारा काम निपटा लिया। उसने बड़े कोशिश की कि अन्य यात्री उसके साथ वापस चले । लेकिन कोई यात्री तैयार न हुआ। निराश होकर वह अकेला ही चल पड़ा।चलते चलते रास्ते में ही शाम हो गया। सामने एक गाँव दिखाई पड़ा । उसने तय किया कि रात इसी गाँव में बिताये जाए क्योंकि जंगली रास्ता था जहाँ चोर डाकुओं का भय था । इसलिए व्यापारी ने उससे गाँव में रात बिताने का निश्चय किया।लेकिन समस्या यह थी कि इतना धन लेकर वो कहाँ ठहरे । अगर किसी ऐसे वैसे आदमी को पता चल जाये कि उसके पास इतना धन है तो वह उसे मारकर धन हड़प सकता है।अगर किसी अपरिचित आदमी को धन रखने को देते हैं तो क्या पता बाद में उसकी नीयत बदल जाए और वह धन न लौटाये।
बहुत खोजने पर उसे एक सराय का पता चला । वह सराय में पहुँचा और चौकीदार से रात भर रूकने की जगह माँगी। सराय का चौकीदार उसे भला आदमी लगा, क्योंकि उसने उसे तुरंत एक दहलीज पर सोने की जगह दे दी। सोमदत्त ने विचार किया कि क्यों न वह अपना धन इस चौकीदार के यहाँ रखवा दे सवेरे जाते समय ले लेगा।
यह तय करके उसने अपना सारा धन चौकीदार को दे दिया।
लेकिन इतना धन पाकर चौकीदार की नीयत बदल गयी। उसने सोचा कि किसी तरह रात में इस व्यापारी को मारकर सारा धन हड़प लूँ ।रात में ही सेठ जी की लाश नदी में बहाकर ठिकाने लगा दूँगा।इसके बात का किसी को पता नही चलेगा। उस चौकीदार का एक बेटा था जो नशेड़ी था। रात-दिन नशे में मस्त रहता था। उस दिन उसे खूब अफीम खा ली थी। रात में वह नशे में लौटा। वो अपनी जगह एक आदमी को सोया देखकर बिगड़ गया और कहा - ' दूसरी जगह सोओ यहाँ रोज मैं सोता हूँ।
सोमदत्त ने सोचा झगड़ा झंझट से कोई फायदा नहीं है। किसी तरह रात बितानी है।वह उठकर दूसरी जगह सोने चला गया ।चौकीदार का बेटा चादर ओढ़कर वही सो गया। आधी रात को चौकीदार तेज धारदार छूरा लेकर चुपके से आया और दहलीज पर सोये आदमी को छूरा भोक दिया।थोड़ी देर तेज धारदार छूरा लेकर चुपके से आया और दहलीज़ पर सोये आदमी को छूरा भोक दिया।थोड़ी देर छटपटाने के बाद वह आदमी ठंडा हो गया।चौकीदार ने बड़ी सावधानी से लाश उठाया और उसे नदी में फेंक दिया।
चौकीदार बहुत प्रसन्न था। उसने बिना किसी झमेले के यह काम कर लिया। अब सेठ जी का पूरा धन उसका होगा। कल से वह इस धन से सूखी से जीवन बितायेगा।उसने सोचा - इस धन से वह खेत खरीदेगा। मकान बनवायेगा और अपने दरवाजे पर पक्का कुँआ खुदवायेगा। यह सोचते -सोचते उसे नींद आ गया। सबेरे उठा तो सामने सोमदत्त को खडा़ देखाकर चौक पड़ा। उसे लगा कि उसके सामने भूत खड़ा है।अब वह क्या करें?विवश होकर उसे सारा धन सोमदत्त को लौटाना पडा़।धन पाकर सोमदत्त अपने घर की ओर चल पड़ा।सोमदत्त के जाने के बाद चौकीदार सोचने लगा कि रात को मैने किसकी हत्या की थी। वह घबराहट में नदी के पास पहुँचा।बहुत ढूंढने के बाद उसे एक लाश दिखाई दी। वह जल्दी-जल्दी उसके पास पहुंचा।वहाँ अपने बेटे की लाश को देखकर वह छाती पीट-पीटकर रोने और चिल्लाने लगा-हाय मैं कितना बड़ा पापी हूँ। धन की लालच में मैने अपने ही बेटे को मार डाला। मुझे मेरे पाप का फल मिल गया।
रोते-रोते वह कुछ दिन में पागल हो गया।
शिक्षा:
हमे कभी भी दूसरों का बुरा नहीं सोचना चाहिए।
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