बंदर का ख्याल
बेचारे लंगूर वाले के घर मे जश्न की तैयारियाँ बिना किसी इत्तला के चिंता का सबब बन गईं। दरअसल हुआ यूं की जब शहंशाह ने जंगल कटवा कर शिकारगाह बनवाया तो उन पेड़ो पर रहने वाले बंदरों के हजूम ने; राजमहल को, जंगल के बाद दूसरी सबसे मुफीद जगह पाया क्योंकि जंगल का कानून; राजमहल में, जंगल से ज़्यादा नज़र आता था, जो की बंदरों को घर का एहसास दिलाता था।
खैर, बंदरों की बढ़ती आबादी को कुछ दिन तो दरबारियों ने बर्दाश्त किया, फिर कुछ ने शांतिपूर्ण ऐतराज किया, और फिर कुछ छंटे हुए दरबारियों ने बंदरों के गंभीर खतरे से आगाह करते हुए, देशव्यापी हिंसक आन्दोलन का भी प्रस्ताव किया| कुल जमा यह की दरबार में कई दिनों तक बंदरों को लेकर बहस चलती रही, कुछ को बन्दर अल्पसंख्यक नज़र आये और कुछ को विस्थापित लेकिन ज़्यादातर लोग कोई राय ना बना पाए और अपनी चुप्पी के चलते के साथ उन लोगों के साथ नज़र आये जो पूरी बन्दर जात को ही देश विरोधी बताते थे |
यहां महल के अंदर बहस में डूबे दरबारी, दूध मलाई चाप रहे थे और वहाँ बन्दर महल के बाहर फाके काट रहे थे | फिर किसी ने ख़बर फैलाई की बंदरों ने कइयों के चश्मे और टिफिन हथिया लिए हैं, तत्परता का परिचय देते हुए शहंशाह के कुछ मुँहलगों ने बंदरों के कटखने होने का डर दिखाया और नाखून और दाँत के किस्से सुना सुना कर CAA और NRC का आर्डिनेंस पास कराया। तय हुआ कि फ़ौरन, ट्रिब्यूनल की तर्ज़ पर एक लंगूर स्क्वाड, बंदरों को डरा कर भगाने के लिए बनाया जाए ।
राजभवन के चहेतों के लिए तो ‘बन्दर भगाओ’ बस एक जुमले का कॉन्ट्रेक्ट था; लेकिन लंगूर वाला इसे अच्छे दिन का वादा समझ बैठा| डेप्यूटेशन पाने के लिए उसने एड़ी-छोटी का जोर लगाया, टांके यहां के वहाँ भिड़ाने के लिये चादर से लंबा पैर फैलाया और कॉन्ट्रैक्ट हाथ आया तो जश्न मनाने के लिए उधार भी लिया, हलवाई भी लगाया लेकिन हाय रे किस्मत;
ड्यूटी के नाम पर अभी रजिस्टर में नाम चढ़ाया ही था कि पता नही दरबार में वो कौन था जिसको लंगूर और लंगूर वाले की किस्मत के, आपस मे जुड़े हुए तार तो नही दिख पाए मगर लंगूर के पट्टे में जानवरों के प्रति इंसानी क्रूरता के सबूत नज़र आये।
दरबार में जानवरों के अधिकारों जैसी फ़िजूल बातों पर हो हल्ला मचा तो असहिष्णु कहलाने के डर से वर्किंग कमेटी ने वो किया जो सबसे आसान था। सबसे पहले तो बन्दर भगाने की बात से ही पल्ला छुड़ाया फिर लंगूर सहित सभी जानवरों को बंदी बनाए जाने पर बैन लगाया।
बस; इधर तो सिर्फ लँगूरवाले और बचपन से घर मे पले लंगूर का साथ छूटा लेकिन उधर राजमहल में बंदरों की मौजूदगी का मुद्दा जनसंख्या, गरीबी और आरक्षण की तरह उलझता जा रहा था| माना के बन्दर विस्थापित थे लेकिन दरबारी, पशु प्रेमी बाद में थे पॉलिटीशियन पहले, बंदरों पर कोई साफ़ स्टेण्ड लेते भी तो कैसे?
ऐसे में दरबार के मोठा भाई को एक सही उपाय नज़र आया, उन्होंने जंगल तो नही लौटाया लेकिन लंगूर पर बैन के सहारे खुद को विस्थापित बंदरों का सबसे सच्चा हमदर्द साबित कर दिखाया
उसके बाद घर से बेघर हुए लंगूर का किस्सा कुछ इस तरह सुनाया की सब ने बंदरों को भगाने वाले लंगूर को दरबार ही नही देश की सुरक्षा के लिए भी घातक ठहराया
फिर लंगूर वाले कि रोज़ी रोटी पर बैन को स्वतंत्रता और नव निर्माण के लिए ज़रूरी कदम बताया
और आखिर में बेरोज़गार लंगूर वाले को मुंह काला कर, लंगूर की आवाज़ निकालने का स्किल डवलपमेंट कोर्स कराया और नकली लंगूर बन कर दिन भर बंदर भगाने की नौकरी पर रख लिया और इस तरह उसे स्किल डवलपमेंट और नए रोज़गार के अवसरों पर होने वाली हर बहस जीतने का रामबाण जीवंत उदाहरण बनाया
अंत भला सो सब भला, दरबारी अब बंदरों से परेशान नहीं हैं, लंगूर बेघर हैं पर जान गए के वो भी किसी के गुलाम नहीं हैं, सल्तनत में स्किल डवलपमेंट की सफलता के परचम लहरा रहे हैं और लंगूर वाले के परिवार वाले भी दो जून की रोटी खा रहे है लेकिन सबसे बड़ी बात वो जो लंगूर वाले को समझ आई; बादल देख कर घड़ा नही फोड़ते भाई












