आज बन्द हूँ एक कमरे में, यहं अन्धेरे मे इतनी गहराई की मेरे हांथ भी नही पा रही हूँ। ऐसा लगता ह मानो किसी सागर की गहराई की तली मे गिरती जा रही हूँ। मेरा जीवन भी ऐसे ही अंधेरो मे कहीं खो गया है, मन को लगता ह जैसे कहीं कोई उमीद नही है, लेकिन क्या सच मे ऐसा ही है मैने तो सुना और पड़ा है की प्रक्रति मे कभी कुछ खतम नही होता फिर मैं भी तो इसी प्रक्रति का एक हिस्सा हूँ फिर मेरे अंदर कैसे कुछ भी खतम हो सकता है क्यूं मै इन अंधेरो मे गिरती जा रही हूँ।आखिर कब होगा वो सवेरा जिसका मुझे इन्तजार है।।













