हौज़ ख़ास मैट्रो स्टेशन की पटरी के बीचों बीच गौतम क्यों और कैसे खड़ा था ये उसे भी ज्यादा याद नही था। चारों ओर अंधेरा था, और सर घूम रहा था। कल रात की पार्टी से वो निकला भर था-ये याद था और कुछ नही। मैट्रो रेल की दूर से आवाज़ आ रही थी, पर गौतम में न उठ कर भागने की ताकत थी न इच्छा। उसने अपने पतलून की जेब को टटोला और उसे तीन सदियों की तीन निशानियां मिली- कैंची,लाइटर और बंद घड़ी। गौतम को याद है साफ साफ हर सदी जो वो जी आया था, वो तीन सदी जो इन तीन बेज़ान चीजों में जिंदा थी। ******* पहली सदी- कैंची ***** कहानी उस सदी की है जब दुनिया मे सब कठपुतली थे। सबके हाथ पाँव से आसमान को जाते धागे निकले थे, जाने कौन था आसमान में जो उनका खेल दिखा रहा था। हर कोई अपने किरदार से बंधा था, कोई तोड़ने की कोशिश करता तो धागे उसे वापस अपनी जगह पहुंचा देते। पर उसे याद है कि एक दिवस उस सदी के, उसे झंडेवाला मेट्रो स्टेशन पे वो नज़र आयी थी। वो जिसके हाथ पांव से कोई धागा न निकला हुआ था। "तुम्हारे धागे कहाँ है? बिन उनके चलती कैसे हो तुम?" "काट दिए उन्हें,आसान है", वो मुस्कुराती हुई बोली। "काट दिए? पर कैसे?" "ऐसे", उसने उसे कैंची देते हुए कहा। अपने धागे खुद भी काटे जा सकते है उसे उस सदी पता चला।। ********* दूसरी सदी- लाइटर ********* ये वो सदी थी जब सब अंधेरा था। लोग बिना एक दूसरे को देखे चले जा रहे थे। अंधेरे में दूसरों का खुशी-दुख-दर्द सब एक सा होता है, काला। इस अंधेरे भरे सदी में वो भी जीने लगा था। उसे भी बस लोगों की आवाजों से मतलब था- चेहरे के लिए न वक़्त था न रोशनी। पर एक दिन राजीव चौक पे वो दुबारा उससे मिला। उसका चेहरा दमक रहा था। सब ओर अंधेरा तो था, पर वो अपने चारों ओर रोशनी करती चल रही थी। "तुम इस सदी क्या कर रही हो?" "मैं हर सदी मिलती रहूँगी" "और ये रोशनी कैसे की?" "बस ऐसे आसान है", उसने उसके बदन को छुआ और वो जलने लगा। एक लाइटर उसने उसकी जेब मे डाल दिया। रोशनी होने के लिए, लोगो को समझने के लिए, खुद का जलना जरूरी है। ये सीखा उसने उस सदी में। ********* तीसरी सदी: बंद घड़ी ********* ये वो काल था जब सब वक़्त दस गुना तेज़ी से बहना सिख गया था। लोग किसी फ़ास्ट फारवर्ड की हुई मूवी की तरह चलते मिलते थे। पूरी दुनिया हड़बड़ी में दिखाई देती थी। साल तो एक दिन का हो चला था। लोगो रुकते नही थे। और वो भी तेज भागना सीख गया था। जाने कितने साल हो गए थे कि जब उसने किसी को रुका देखा था। जब उसने देखा था किसी को किसी के लिए वक़्त निकालते। पर फिर इसी सदी में उसे वो फिर मिली थी कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पे, चुपचाप कोने में बैठे-एक के बाद एक ट्रेन छोड़ते। उसे कहीं जाना नही था, बस ट्रेनों की हड़बड़ी को देखना भर था। "गौतम! रुको", पर कोई रुक कैसे सकता है। उसने रुकना नही सीखा था। पर जैसे ही उसने लपक कर हाथ थाम बोला, "अरे! कहाँ भागे जा रहे हो, रुको तो सही", गौतम के साथ साथ वक़्त भी रुक गया था। "अब ये वक़्त रोकना कैसे सीख लिया तुमने" "ऐसे", उसने गौतम के हाथ पे एक बंद पड़ी घड़ी बांधते हुए कहा। उसे उस सदी पता चला कि वक़्त रुकता भी है, हाथ बंधता भी है। ********** इस सदी ********** वो तीनों उसकी मुठ्ठी में थे। सामने से अंधेरा चीरते एक मैट्रो भागी आ रही थी। लाइटर से उसने खुद को जलाया। बंद घड़ी से वक़्त को रोका। ट्रेन उसके चेहरे को छू रही थी। कैंची उसने उस ट्रेन की ओर फेंक दिया। ट्रेन गुब्बारे की तरह फट गया और गौतम फिर होश खो बैठा। ******* आज ******* 'सर ट्रेन में चढ़ते ही आप बेहोश हो गए थे। किसी भली लड़की ने बटन दबा कर आपकी मदद की' 'किसने?' 'मैंने' वो वापस आ चुकी थी। हर सदी पूरी हो चुकी थी। एक नयी सदी शुरू हो चुकी थी।। http://ift.tt/2zNt0Cs







