मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा प्रताप
देश में 9 मई 2018 को महाराणा प्रताप की 478 वीं जयंती मनाई जा रही है। प्रताप एक ऐसे योद्धा थे, जो कभी मुगलों के आगे नहीं झुके। जानिए मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी खास बातें - राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म महाराजा उदयसिंह एवं माता जैवन्ताबाई के घर 9 मई 1540 को हुआ था। महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी संवत् कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। 1. प्रताप का बचपन - महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। प्रताप बचपन से ही बड़े बहादुर थे. जहाँ सबका बचपन खेल -खिलौनों में बीतता है, वही प्रताप ने अपना बचपन तलवार बाजी और हथियार बनाने की कला सीखने में बीता. 2. प्रताप का राज्याभिषेक - इनका राज्याभिषेक गोगुंदा में 1 मार्च 1562 को हुआ था। राणा उदयसिंह ने अपनी सबसे छोटी पत्नी के बेटे जगमल को राजा घोषित किया. प्रताप सिंह अपने छोटे भाई के लिए अपना अधिकार छोड़कर मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे, किंतु सभी सरदार राजा के निर्णय से सहमत नहीं हुए। प्रताप सिंह ने भी सभी सरदार तथा लोगों की इच्छा का आदर करते हुए मेवाड़ की जनता का नेतृत्व करने का दायित्व स्वीकार किया।
3. प्रताप और चेतक - चेतक महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा था. घोड़ा अफगानी था.नीले रंग का. जब पहली बार प्रताप ने घोड़ा देखा तभी से वो उन्हें पसन्द था. उनके पिता ने दो घोड़े मंगाए थे.एक सफेद एक नीला. अगर वो नीला घोड़ा चाहते तो उनका भाई कभी उन्हें चेतक नही लेने देता. इसलिए उन्होंने जानबूझकर सफेद घोड़े की तारीफ कर दी. उनके भाई ने सफेद घोड़ा जिद कर ले लिया और प्रताप को इस चालाकी से चेतक मिल गया .हल्दीघाटी के युद्ध में घायल होने के बाद वे बिना किसी सहायक के अपने पराक्रमी चेतक पर सवार होकर पहाड़ की ओर चल पड़े। उनके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, परन्तु चेतक ने प्रताप को 21 फिट की नदी कूदकर बचा लिया। हालाँकि इसके बाद चेतक चल बसा.
4. चार बार दूत भेजे थे अकबर ने - प्रताप और अकबर एक दूसरे के कट्टर विरोधी थे. मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने भी सभी प्रयास किए। अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए अकबर ने प्रताप को चार बार दूत भेजकर कहलवाया लेकिन वो कभी राजी नही हुए. अकबर भी प्रताप की ताकत का लोहा मानता था. उन्होंने कई वर्षों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। 5. हल्दीघाटी का युद्ध - सन् 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में करीब बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के अस्सी हजार की सेना का सामना किया। मेवाड़ की प्रजा आधी रोटी खाकर किले के भीतर रहती और सैनिक युद्ध लड़ते. अंत में अन्न-जल की कमी के कारण प्रताप युद्ध हार गए. प्रताप को उनके कर्मचारियों ने नींद की दवाई देकर किले से दूर सुरक्षित भिजवा दिया. सैनिक युद्ध मे मारे गए और औरतों ने आग में कूदकर जौहर कर लिया.) 6. घास की रोटी भी खानी पड़ी महाराणा प्रताप को - प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि वह 'माता के पवित्र दूध को कभी कलंकित नहीं करेंगे' और ' 'चित्तौड़ के उद्धार से पहले पात्र में भोजन, शैय्या पर शयन दोनों मेरे लिये वर्जित रहेंगे' इस प्रतिज्ञा का पालन उन्होंने पूरी तरह से किया। विपत्ति काल में अपने परिवार का पर्वतीय कन्दमूल-फल द्वारा भरण-पोषण करना और अपने पुत्र अमर का जंगली जानवरों और जंगली लोगों के मध्य पालन करना, अत्यन्त कष्टप्राय कार्य था। 7. वीरता की मिसाल - महाराणा प्रताप ने एक प्रतिष्ठित कुल के मान-सम्मान और उसकी उपाधि को प्राप्त किया, परन्तु उनके पास न तो राजधानी थी और न ही वित्तीय साधन। बार-बार की पराजयों ने उनके स्व-बन्धुओं और जाति के लोगों को निरुत्साहित कर दिया था। फिर भी उनके पास अपना जातीय स्वाभिमान था। प्रताप ने कभी हार नहीं मानी. 8. गोरिल्ला वार - जब अकबर ने मेवाण पर लाखों की फौज के साथ हमला किया, तब प्रताप जंगल में जा छुपे. मुगल सेना राणा पर हमला करने को तैयार नहीं थी, जहाँ महाराणा छुपा था. मुगल सेना में ये डर था की कहीं अभी महाराणा गोरिल्ला युद्ध कर उन्हें गाजर मूली की तरह ना काट डाले. कुछ दिनों तक स्वयं अकबर अपने विशाल शाही फौज के साथ मेवाण पर ही रहा. और उसके जाने के साथ ही महाराणा प्रताप ने प्रत्याक्रमण कर धीरे धीरे मेवाण का अधिकतर भू भाग को मुगलों से आजाद करवा लिया. महाराणा प्रताप के जीवन में जितना भी लिखा जाए कम ही होगा . मेवाड़ की धरती को मुगलों के आतंक से बचाने वाले ऐसे वीर सम्राट, शूरवीर, राष्ट्रगौरव, पराक्रमी, साहसी, राष्ट्रभक्त को शत्-शत् नमन।












