भूख
एक आग जिसकी प्रखर ज्वाला मेंदिनरात झुलसाया खुद को मैनेसुख सुकून सब सपने अपनेकर दिये स्वाहा समक्ष उसके मैनेउस आग को बुझाने ख़ातिरक्या न प्रयास किया मैंनेपरिणाम यही निकलकर आयाजैसे पावक में घी डाला मैनेलगता है मुझको ,ये अम्रत रस का पान करके आई हैभूख कभी न मिटने का वरदान लेकर आई है
View On WordPress













