“भूख के खिलाफ एक आंदोलन – श्री नर्मदा की जनसेवा की यात्रा”
कई बार मैं सोचता हूं, कि जब हम अपने बच्चों के भविष्य के सपने बुनते हैं, तो क्या हम यह सुनिश्चित कर पाए हैं कि उनका आज भूख से मुक्त है?
भारत, जिसकी सभ्यता पाँच हज़ार साल पुरानी है, जहां चावल की बालियाँ और गेहूं की बालियां धरती से आशीर्वाद की तरह फूटती हैं – वही भारत आज भूख के वैश्विक सूचकांक (Global Hunger Index) में 111वें स्थान पर खड़ा है।
ये आंकड़ा सिर्फ सरकारी रिपोर्ट नहीं है, ये उन करोड़ों पेटों की चीख है जिन्हें दिन में एक वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। और ये भूख सिर्फ शरीर को नहीं, आत्मा को भी तोड़ती है।
लेकिन हर अंधेरे में एक दिया होता है। और ऐसे ही एक दीपक का नाम है – “श्री नर्मदा फूड बेवरेज एंड हर्बल प्राइवेट लिमिटेड”, जिसकी स्थापना हेम नारायण तिवारी जी ने की।
एक उद्देश्य, जो व्यापार से ऊपर है श्री तिवारी जी का मानना है कि "भूख से बड़ी कोई गरीबी नहीं, और पोषण से बड़ा कोई धर्म नहीं।" इस सोच ने श्री नर्मदा को केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन बना दिया है।
यहां हर उत्पाद की आत्मा में सेवा है। यहां उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि ज़रूरतमंदों की थाली भरने के लिए होता है।
जब कंपनियां लाखों के विज्ञापन बजट में उलझी होती हैं, श्री नर्मदा गाँव-गाँव जाकर यह सुनिश्चित कर रही है कि कोई बच्चा खाली पेट न सोए, कोई महिला कुपोषण से न मरे और कोई बुजुर्ग रोटियों के इंतज़ार में दम न तोड़े।
ज़मीनी काम, हकीकत की समझ यह कंपनी बाज़ार की चकाचौंध से दूर, मिट्टी की गंध में अपनी ताकत ढूंढ़ती है। स्थानीय किसानों से फसलें खरीदकर, उन्हें संसाधित कर, पौष्टिक और सस्ते उत्पाद बनाए जाते हैं – ताकि समाज का अंतिम व्यक्ति भी अपनी थाली में पोषण पा सके।
श्री नर्मदा के पेय और खाद्य उत्पादों में न तो विदेशी रसायनों की मिलावट है, न दिखावे की पैकिंग – इनमें सिर्फ एक चीज़ मिलती है – "इंसानियत"।
रोज़गार और आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक सशक्त कदम भूख मिटाने के साथ-साथ श्री नर्मदा ने हज़ारों युवाओं को सम्मानजनक रोज़गार भी दिया है। गांव की महिलाओं से लेकर बेरोज़गार युवाओं तक, सभी को प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान किया गया है।
यहाँ काम करने वाला हर व्यक्ति सिर्फ कर्मचारी नहीं, इस मिशन का भागीदार है।
क्यों ज़रूरी है श्री नर्मदा जैसे प्रयास? क्योंकि इस देश में हर साल लाखों टन अनाज बर्बाद होता है, और वहीं दूसरी ओर करोड़ों लोग भूखे मरते हैं। यह विरोधाभास तब तक बना रहेगा जब तक कोई आगे आकर इस असमानता को तोड़ने की कोशिश नहीं करेगा।
हेम नारायण तिवारी जी ने वही हिम्मत दिखाई है – उन्होंने सिर्फ व्यवसाय खड़ा नहीं किया, "एक संकल्प लिया है भूख के खिलाफ"।
निष्कर्ष: देश की तरक्की सिर्फ इमारतों की ऊँचाई से नहीं, बल्कि हर नागरिक की थाली की गर्मी से नापी जाती है। जब तक एक भी भूखा है, तब तक विकास अधूरा है।
श्री नर्मदा फूड बेवरेज एंड हर्बल प्रा. लि. इस अधूरेपन को पूरा करने की एक विनम्र लेकिन मजबूत कोशिश है – और इसकी नींव में बसी है हेम नारायण तिवारी जी की दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और सच्ची देशभक्ति।
इस लेख के अंत में सिर्फ एक बात कही जा सकती है – भूख के खिलाफ अगर कोई सच्चा योद्धा खड़ा है, तो उसका नाम है – श्री नर्मदा।













