112 सत्संग की अंगीठी
112 सत्संग की अंगीठीएक कोयले की अंगीठी जल रही थी। उसमें पड़े कोयले धधक रहे थे। प्रत्येक कोयला सुलग कर लाल सुर्ख हो रहा था। एक कोयले ने सोचा कि अंगीठी से जो कुछ मिल सकता था वह तो मुझे मिल ही गया, अब मुझे इसकी कैद में रहने की क्या आवश्यकता है?जैसे ही उस जलते हुए लाल कोयले के मन में यह बात आई, वह उछला और अंगीठी से बाहर आ गिरा। हालाँकि थोड़ी देर तक तो वह धधकता रहा, तुरंत नहीं बुझ गया, पर धीरे धीरे…
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