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"Khi bạn gặp người ấy đúng thời điểm, đó là duyên may. Khi bạn quyết định đi cùng người ấy bất kể đắng cay, đó là lựa chọn."❤️
नयों का खेल
1. संयोग जैसे पुत्र,स्त्री,मकान, धन, धान्य आदि मेरे उपचरित असद्भूत व्यवहार नय से कहलाते है लेकिन वास्तव में ये मेरे नहीं है। क्योंकि जिसका जो होता है वह वही होता है। दोनों में मात्र निमित्त नेमित्तिक संबंध है ।
2. शरीर आदि और उनसे होने वाली क्रिया आदि अनुपचारित असद्भूत व्यवहार नय से मेरे है लेकिन वास्तव में ये मेरे नहीं है । क्योंकि जिसका जो होता है वह वही होता है। दोनों में मात्र निमित्त नेमित्तिक संबंध है ।
3. दान, दया, भला आदि करने का विकल्प उपचरित सद्भूत व्यवहार नय से मेरा कहलाता है लेकिन वास्तव में त्रिकाल धुव्र का आश्रय करने की अपेक्षा से ये मेरी सत्ता में होने पर भी मेरे नहीं। क्योंकि जिसका जो होता है वह वही होता है। दोनों में मात्र निमित्त नेमित्तिक संबंध है ।
4. निर्मल पर्याय का परिणमन अनुपचरित सद्भूत व्यवहार नय की अपेक्षा से मेरा कहने में आते है लेकिन यह पर्याय भी एक समय की होने से मेरी व्यवहार नय से कहने में आती है लेकिन वास्तव में यह भी मेरी नहीं ।क्योंकि जिसका जो होता है वह वही होता है। दोनों में मात्र निमित्त नेमित्तिक संबंध है ।
5. निश्चय से पर द्रव्य को स्वयं मानना या देह को स्वयं का मानना और मैं विकार करने वाला रागी ही हूं ऐसा कहना अशुद्ध निश्चय नय से कहलाता है लेकिन वास्तव में जीव किसी भी अवस्था में रागी हो ही नहीं सकता क्योंकि वो तो सदा शुद्ध ही है।
6. साधक अवस्था में आत्मा के श्रृद्धान से जितनी वीतरागता प्रगट है वह एक देश प्रगट करने योग्य उपादेय है जो एक देश शुद्ध निश्चय नय से वीतरागी कहने में आता है।
7. केवली की दशा में आत्मा के श्रद्धा न से जो पूर्ण वीतराग ता प्रगट है वह सकल प्रगट करने की अपेक्षा से परम उपादेय है लेकिन वह भी शुद्ध निश्चय नय से वीतरागी कहने में आता है।
8. जो आश्रय करने योग्य अपना ध्रुव आत्मा है जो अनंत गुणी और जिसमें कोई भेद ना करें और न ही किसी अन्य को मिला कर आश्रय करने योग्य तत्व को ही समय का सार वीतरागी कहने में परम शुद्ध निश्चय नय से कहने में आता है और यह ही परम आश्रय करने योग्य उपादेय है ।
यहां ध्यान देने योग्य यह बात है कि नय तब ही लागू पड़ते है जब आश्रय करने योग्य परम उपादेय ध्रुव आत्मा का ही निश्चय में निर्णय हो तब ही निश्चय नय और व्यवहार नय लागू पड़ सकते है अन्यथा तो वह कहना ही झूठ है और मात्र व्यवहार को ही निश्चय मान कर ग्रहण करें तो सारा ज्ञान अज्ञान ही कहलाता है।
सात तत्व या नव पदार्थ का सार भी यही है -
1. जीव और अजीव, राग करने नहीं अपितु मात्र मेरे ज्ञान का ज्ञेय है
2. आश्रव, पाप, पुण्य, बंध हेय है अर्थात द्वेष नहीं अपितु छोड़ने योग्य है।
3. संवर और निर्जरा, राग और द्वेष से रहित मात्र एक देश प्रगट करने योग्य उपादेय है अर्थात पर्याय में प्रगट करने योग्य तो है लेकिन आश्रय करने योग्य नहीं है।
4. मोक्ष तत्व, वीतरागी पर्याय होने पर सकल प्रगट करने योग्य उपादेय है लेकिन आश्रय करने योग्य नहीं है।
5. इन सबसे भिन्न मेरा निज त्रिकाली ध्रुव आत्मा ही एक मात्र ऐसा पदार्थ है जो आश्रय करने योग्य उपादेय है।
नोट: संवर, निर्जरा और मोक्ष तत्व प्रगट ही तब होते है जब जीव अपनी त्रिकाली ध्रुव आत्मा का आश्रय लेता है ।