मोटेमाल की महिमा: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)
मोटेमाल की महिमा: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)
दिनों बहुत उत्साह से लोगों से ‘हाथ धुलवाने’ के प्रयास हो रहे हैं, जब तब किन्ही हाथों से गुलाबी रंग जरूर झरने लगता है मगर यह विकास का समय है. कोयला भी केवल कोयला नहीं रहा, कोयला बहुरूपिया हो गया है. वह हीरा हो सकता है, तोप या हेलिकॉप्टर भी हो सकता है. दलाली भी अब उन्नत होकर ‘डील’ कही जाने लगी है. डील का डीलडौल बहुत बड़ा होता है. बड़ी डील में हुए ‘काले हाथों’ को पकड़ना इतना आसान नहीं होता. ‘मोटा माल’…
View On WordPress









