चाय के कप से उड़ते धुंए में मुझे तेरी शक्ल नज़र आती है. . .
तैरे इन्ही ,खयालों में खोकर, मेरी चाय अक्सर ठंडी हो जाती है... ! ! !
अमित बिंजोला
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चाय के कप से उड़ते धुंए में मुझे तेरी शक्ल नज़र आती है. . .
तैरे इन्ही ,खयालों में खोकर, मेरी चाय अक्सर ठंडी हो जाती है... ! ! !
अमित बिंजोला
मुद्दा यह नहीं कि मैं कैसा लिखता हूँ
सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि किसके लिए लिखता हूँ
तुम बस इशारा कर देना आँखों से मैं फिर से वहीं आके रूकता हूँ वो जो तुम्हारे नाम का पहला अक्षर है।
अमित बिंजोला
बेआबरू सि फिर रही हैं हसरतें मेरी
कोई बताए तो मुकम्मले लिबास मुझे ।
अमित बिंजोला
मोहब्बत नमाज़ मे बैठी हो या आरती में
क्या फर्क पड़ता है।
इजहार तुमने किया या उसने किया
क्या फर्क पड़ता है।
दिल तुमने दिया या उसने दिया
क्या फर्क पड़ता है।
बेबस होकर रातों में तुम रोए या वो
क्या फर्क पड़ता है।
दर्द छुपा के तुम मुस्कराए और वो तुम्हे देख शर्माए
क्या फर्क पड़ता है।
मोहब्बत में जब सब फर्क से फर्क ना पड़े
तो वो हसीन मोहब्बत है वर्ना
क्या फर्क पड़ता है।
अमित बिंजोला
किनारे पे खडा मै देखता ही रह गया ख्वाहिशो के पुल को ज़िम्मेदारियों का तुफान उड़ा ले गया।
अमित बिंजोला
उनके आँसुओ के खरीदार और मुस्कुराहट के कर्जदार थे हम।
उन्होंने हमें गम दिये सारे यह कहकर कि उनके हकदार थे हम।
अमित बिंजोला
ज्ञान रूपी दीपक का मैं प्रकाश बन चलूँ ।
तेरे जीवन के उत्थान का मैं साथी बन चलूँ ।
कर संकल्प दृढ तेरे संकल्प का मैं शूत्र बन चलूँ ।
जो हो अज्ञानता का अन्धेरा सूर्य का प्रकाश बन चलूँ ।
मुश्किलों से घबरा नहीं जो हो साहस तो मैं तेरा त्रिशूल बन चलूँ ।
ज्ञान रूपी दीपक का मैं प्रकाश बन चलूँ ।
अमित बिंजोला
प्यार सच्चा और चाय का रंग पक्का ना हो... तो...
दोनों को आग पर रख देना चाहिए।
अमित बिंजोला