Think
बहुत मन था मेरा स्कूल जाने का पर क्या करूँ मजबूरी माँ बाप की थी और हम चाय की दूकान पर आ गए और उन्ही दुकानों पर हमने सीखा की हमारे देश में राज्य कौन करता हैं किस पार्टी ने कितना घोटाला किया सब कुछ तो हमने इसी दूकान पर सीखा है फिर भी कभी दिल करता है पढाई का तो पूछता हूँ दूकान पर आने वाले बड़ी बड़ी ऑफिस के साहेबो से की पढाई क्या होती है तो कहते छोटू तू चाय बड़ी कड़क बनाता है बस इन्ही सब तारीफों को सुनकर जी लेता हूँ और उनकी बाते सुनकर तो ऐसा लगता है लगता है पढाई में बेकार चीज है















