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नई सड़क
नई सड़क (रविश कुमार जी का ब्लॉग) कभी कभी जाना होता हैं । आज का लेख था क्यों नहीं है मीडिया में अंबेडकर जयंती की कवरेज़ ? सवाल था पत्रकारिता की छात्र शैनन का सही भी है। मेनस्ट्रीम मीडिया ज्यादातर उन्ही खबरों को कवर करती हैं जिसमे कोई बड़ा नेता हो बस बाकी बाबा साहब के नाम पर होने वाले छोटे बड़े कार्यकर्मो को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाता है, क्यूंकि उसमे बड़ा चेहरा नहीं होता इसमें दर्द हैं, उन लोगो का जो की उस समाज से आते हैं जिन्हे मंदिरो में जाने से सिर्फ उनकी जाति और वर्ण की वजह से रोक दिया जाता था आज भी होता है । उनके कानो में शीशा पिघला कर और जबान काँट दिया जाता था। सिर्फ उनके किसी श्लोक को सुनने और उच्चारण मात्र से (सिर्फ आलोचना नहीं अब तो ये मुसलमानो में भी शिया,सुन्नी,देवबंदी,बरेलवी और काद्यानि के नाम पर होता हैं।भारत में तो सिर्फ एक दूसरे की मस्जिदो में जाने की इजाजत नहीं गर गया तो मस्जिद धुलवा दी जाती है। दूसरे देशो में तो जान ले लेते हैं) खैर अच्छा लगा देख कर की दलित अब अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। मुस्लिमो में भी बहुत जरुरत हैं बाबा साहब की सबसे पहले औरतो का मस्जिद में प्रवेश करा दें (सऊदी में होता और भी अरब देशो में हैं ) ताकि वो भी अल्लाह के घर में अपनी फ़रियाद कर सकें, औरत को निकाह पढ़ाने का और इमामत( नमाज पढ़ाने को इमामत कहते हैं) करने का हक़ और भी कई बातें वो फिर कभी।
भगवान् ने रजनीकान्त को बर्खास्त करके नरेन्द्र भाई को कार्यभार सौंपा
भगवान् ने रजनीकान्त को बर्खास्त करके नरेन्द्र भाई को कार्यभार सौंपा नरेन्द्र भाई वह सारे कार्य करेंगे, जो ईश्वर भी नहीं कर पाता था| केदार बाबा के यहाँ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है की ईश्वर से भी नहीं बन पाने वाले कार्यों को करने के लिए अब भगवान नमो आन्दोलन के प्रचारमंत्री और गुजरात में धर्मराज स्थापित करने वाले अलोकिक लोकतांत्रिक नेता सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञानी और सर्वत्र उपस्थित नरेंद्रभाई को रजनी कान्त के कार्यों का भार सौंपा गया है| विज्ञप्ति के अनुसार उन्होंने कार्यभार संभालते ही अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए अपने कन्धों पर बिठाकर 15000 लोगों को केदारनाथ से बाहर निकाला| सभी जमीनी रास्ते बंद होने के कारण उन्हें हवाई मार्ग से ये कार्य करना पड़ा| बताया जाता है की उनके हाथ में एक दूरबीन थी, जिसका प्रयोग करते हुए उन्होंने केवल गुजरातियों को चिन्हित किया और उन्हें ही बचाया| विज्ञप्ति में बताया गया है कि जब इस बात की खबर कुछ दुसरे देवताओं को लगी की नरेन्द्रभाई ने केवल गुजरातियों को बचाया है तो तो देवता बहुत नाराज हुए और नरेंद्र को याद दिलाया की अब उनका स्तर राष्ट्रीय है और उन्हें संकीर्णवाद से बचना चाहिए| इस फटकार के बाद, नरेंद्र जी ने तुरंत केदारनाथ को बनाने की जिम्मेदारी खुद पर दिए जाने की मांग कर दी है|वे देश में घूम घूम कर मांग करने वाले हैं कि भारत पर शासन करने वाले अधर्मियों को हटाकर देश की बागडोर उन्हें सौंपी जाए ताकि वे देश में धर्म का शासन लागू कर सकें, जिससे ईश्वर कुपित होकर केदारनाथ जैसा तांडव पुनः न करे
दिल्ली मेट्रो
आज फिल्म संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन भाग दो के 9 वर्ष पुरे हो गये और इसी के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री कार्यालय ने रिपोर्ट टू द पीपल २०१२-१३ नामक किताब को वितरित किया और इन्टरनेट संस्करण भी जारी किया और मैंने इसका इन्टरनेट संस्करण डाउनलोड किया ज्यादा तो मैंने भी नही देखा पर एक बात तो हैं उसमे दिल्ली मेट्रो का बहुत गुणगान किया जा रहा है कि वह सरकार कि देंन हैं पर क्या वाकई में मेट्रो सरकार कि देंन हैं। या मेट्रो मैन डॉक्टर ई श्रीधरन की जिन्होंने इस प्रॉजेक्ट को अपने स्टाइल से पूरा किया। जिन्होंने गैर जरूरी लोगो की दखलअंदाजी नजर अंदाज करते हुए, उन्होंने मेहनती लोगों का चयन किया। जहां एक टेंडर को हमारे देश में जारी करने में 6 से 9 महीनों का समय लग जाता है, वहां उन्होंने अपना काम सिर्फ 19 दिनों में ही पूरा कर लिया । जब सरकार ने इस प्रॉजेक्ट के लिए पैसे मुहैया कराने से हाथ खड़े कर दिए, तब डॉ. श्रीधरन ने सरकार का रोल ही काट दिया और जैपनीज बैंक ऑफ इंटरनैशनल को-ऑपरेशन से 5 बिलियन यूएस डॉलर के लोन की मंजूरी ली। दुनिया के टॉप-मोस्ट टैलेंटेड लोगों से उन्होंने अपनी टीम बनाई। यह सब भारत के इतिहास में पहली बार हो रहा था। नतीजतन, मेट्रो का पहला फेज निर्धारित समय से तीन साल पहले और बिना किसी तरह के भ्रष्टाचार के, बजट के अंतर्गत पूरा हुआ। और तो और सरकार ने उनसे एक और शर्त रखी कि जनता को कोई परेशानी न हो। डॉ. श्रीधरन ने न केवल इन बातों का ध्यान रखा, बल्कि जितना हो सके जनता को इसके चल रहे काम की भनक से भी दूर रखा। कहीं ऊपर से तो कहीं जमीन के नीचे से उन्होंने मेट्रो का रूट तैयार करने की प्लैनिंग की। डॉ. श्रीधरन ने दिल्ली मेट्रों को निर्धारित समय से तीन साल पहले और निर्धारित राशि से कम के बजट में सौभाग्यपूर्वक पूरा कर दिखाया। अब मेट्रो निर्माण प्रक्रिया में चाहे वो केंद्र सरकार हो या फिर दिल्ली सरकार मुझे तो नही लगता कि उनका किसी प्रकार का सहयोग हो । पर आखिर क्यूँ चुनाव नज़दीक होने कि वजह से सरकार दिल्ली मेट्रो को अपनी उपलब्धि बनाने पर तूली हुयी है और टेलीविज़न पर भी ये जोर शोर पर प्रचारित किया जा रहा है । अगर किसी को समझ आये तो मेरा भी ज्ञान बढाना महेरबानी होगी
Happy Mother's day 2013
माँ अपने बच्चे की पहली गुरु होती है. अब यह उसके हाथ में है कि वह मानवता की जननी बनना चाहती है या सिर्फ अपने बच्चे की. मां वो शब्द है जिसमे कायनात समाई है… जिसकी कोख मे शुरु हुआ था जिन्दगी का सफर, जिसकी गोद मे खोली थी आखें पहली बार, जिसकी नजरो से ही दुनिया को देखा था, जाना था, जिसकी उन्गलियां पकड कर चलना सीखा था पहली बार !! उसी ने हमारी खुद से करायी थी पेह्चान, दुनिया का समना करना भी उसी ने सिखाया, जनम से ही दर्द से शुरु हुआ था रिश्ता हमारा, शायद हर दर्द पे ईसीलिये निकलता है शब्द मां हर बार !! मां की जिन्दगी होती है उसके बच्चे मे समायी, पर बडे होते ही दूर हो जाती है राहे उसकी जिन्दगी की, भुला देता है इस शब्द की एहमियत अपनी व्यस्तता मे कही, फिर अचानक कही से सुनाई देती है आवाज मां, आखें भर आती है बस धार धार !! मदर्स डे पर सभी माताओं को हार्दिक शुभकामनायें
गुरुवाणी
१६ दिसम्बर को जब दामिनी के साथ हादसा हुआ था तो कुछ हमारे सभ्य समाज के लोग या तो दामिनी पर इल्जाम लगा रहे थे। की वो रात में क्यूँ घूम रही थी या कुछ लोग अनर्गल बातें कर रहे थे और तो और कुछ तो सारा दोष उस मुर्गे को दे रहे थे जो उन दरिंदो ने उस रात खाया था । अब लगता है आज वो सारा दोष अश्लील फिल्म को ही देंगे क्यूंकि हम पुरुष तो भगवान् से शराफत का सर्टिफिकेट लेकर पैदा हुए थे । गुरुवाणी
दिल्ली आज फिर से शर्मिंदा हैं।
दिल्ली आज फिर से शर्मिंदा हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में जहाँ पर लोकतंत्र का मंदिर है जहाँ पूरे देश से चुने हुए हमारे माननीय आते हैं और देश का भविष्य तय करते हैं। पर इस निगोड़ी दिल्ली में क्या हमारी माँ बहन और बेटी सुरक्षित हैं। क्या इसका कारण सरकार का ढुलमुल रवैया हैं तो हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं और सरकार ने तो हमें The Criminal Law Amendment bill 2013 दे दिया और जस्टिस वर्मा समिति ने भी अपनी रिपोर्ट भी देदी हैं । पर क्या ये सब हमारी हमारी बलात्कारिक मानसिकता को खत्म करने में कुछ कर सकती हैं। क्यूंकि हमारी मानसकिता महिलाओं को लेकर सिर्फ भोग विलासिता तक ही सीमित रह जाती है। हम लोग महिलाओं को चाहे वो नौकरानी या फिर किसी की बहन बेटी या बीवी के रूप में हम उसको सिर्फ भोगने की ही नज़र से ही देखते हैं । और अब तो छोटी छोटी बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं कभी उन्हें टॉफी देने के बहाने कभी खलेने के बहाने अपने ही गली मोहल्लो में सुरक्षित नहीं है । कभी कभी तो लगता हैं की ये सारी खबरें झूठी हैं क्यूंकि कोई भी पुरुष इतनी हैवानो जैसी हरकत कर सकता हैं । अफ़सोस कुछ लोग तो पुरुष शब्द को ही एक गाली बनाने पर तुले हुए हैं । क्या हम अपनी मर्दानगी का सुबूत बलात्कार के जरिये ही दे सकते हैं । हमारी पुलिस तो औरत शब्द से महरूम ही लगती है अगर उनके घर में माँ बहन बेटी होती तो शायद वे किसी की बहन को विरोध प्रदर्शन करने पर थप्पड़ ना मारते और किसी गरीब बाप से उसकी बेटी की इज्ज़त की कीमत २००० न लगाते थू हैं ऐसी पुलिस । आज खुद को भी एक पुरुष कहने से पहले एक बार सोचना पड़ेगा । चीन द्वारा भारत की राजधानी दिल्ली को "रेप कैपिटल ऑफ़ वर्ल्ड" का नाम क्या अब हमे भी स्वीकार कर लेना चाहिए ? क्या दिल्ली दिलवालों की हैं ? या दिल-देहला देने वालों की ? ना आना दिल्ली प्रदेश लाडो। Mohammed Anas Guru
जेहाद क्या है?
जेहाद जुहद से बना है और जुहद का मतलब होता है संघर्ष। बम ब्लास्ट करने को जेहाद नही कहा जायेंगा| जेहाद अल्लाह पाक की खिदमत का स्वरुप है ।जेहाद के नाम पर अपनी अज्ञानता के कारण अतंकवादी इस्लाम को बदनाम करने अलावा और कुछ नही कर रहे हैं। आतंकवाद एक ऐसा युद्ध है जो अल्लाह के नाम पे अल्लाह के हुक्म की खुली नाफ़रमानी है। क्यूंकि कुरान पाक में अल्लाह पाक कहते हैं । ( कुरान ५:३२ में कहा गया है की अगर किसी ने एक बेगुनाह इंसान की जान ली तो यह ऐसा हुआ जैसे पूरे इंसानियत का क़त्ल किया और अगर किसी ने एक इंसान की जान बचाई तो उसने पूरी इंसानियत की जान बचाई.) • जेहाद के कई पहलूँ होते हैं:- सुबह फजिर के वक़्त जब एक मुसलमान अज़ान की आवाज़ सुनता है तो नफ्स कहता है ज़रा और सोने दो पर वो अपने अंदर की आवाज को जोर देकर कहता है , 'उठो अल्लाह की इबादत का वक़्त हो गया है. और एक जेहाद शुरू हो जाता है इन्सान और उसके नफ्स के बीच. यह भी एक जेहाद है | • जब एक मुसलमान किसी गुनाह ( बुराई) की तरफ अमादा होता है तो उनके दिल से एक आवाज़ आती है देखो तुम ग़लत कर रहे हो | यह आवाज़ बलात्कारी के पास भी आती है, चोर के पास भी आती है और ज़ालिम के पास भी आती है | अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुन कर गुनाह से खुद को रोक लेना भी एक जेहाद है | • समाज मैं जब बुराई बढ़ जाती है और नेकी कम हो जाती है तो बुराई को ख़त्म करने के लिए भी जेहाद किया जाता है । फिर चाहे वो कलम के ज़रिये समाज में, अमन कायम करने के लिए और ज़माने में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए. यह भी अल्लाह की इबादत का एक रूप है। • इस्लाम हमें बताता है कि मुसलमानों को पहले अपने स्वयं के भीतर की बुराइयों के खिलाफ जेहाद करना चाहिए, हमारे बुरी आदतों के खिलाफ , झूठ बोलने की आदत के खिलाफ,फितना ओ फसाद फैलाने की आदत के खिलाफ, जलन, द्वेष, नफरत के खिलाफ , इस जेहाद को स्वयं के खिलाफ संघर्ष कहा जाता है। यह जेहाद का जिक्र श्रीमद् भगवद गीता में कुछ ऐसे किया गया है: • शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। • सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥२५॥ • भावार्थ : शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से प्रेम और द्वेष मत करो, सबमें अपने आप को ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो ॥२५॥ • कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्। • आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥२६॥ • भावार्थ : काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ, जो आत्म- ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं वो बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं ॥२६॥ अपनी मेहनत की कमाई से मजबूरो, लाचारो, यतीमो और बेवाओं और गरीबों की सहायता करना भी एक जेहाद है । इस जेहाद का दर्जा बहुत ऊंचा है। और सबसे आखिरी जेहाद है हथियार का, यह जेहाद केवल रक्षात्मक ही हो सकता है। या यह कह लें की सिर्फ बचाव मैं ही हथियार उठाया जा सकता है, सामने से हमला करना जेहाद नहीं...अपने बचाव मैं किये गए जेहाद का भी नियम है. बच्चों, औरतों और बूढ़े,और बेकसूरों जो आपको नुकसान नहीं पहुंचा रहे,उनको न तो कुछ कहो और न ही नुकसान पहुँचाओ, अगर कोई शांति की अपील करे तो उसे भी जाने दो। दुश्मन अगर पीठ दिखा जाए तो उस पर भी हमला मत करो. यह जेहाद भी सिर्फ अल्लाह की राह में उसके दीन को बचाने के लिए किया जा सकता है। अगर इस्लाम पे कोई हमला करे तो उसको बचाने का काम हथियार से होता है, जो की केवल रक्षात्मक ही हो सकता है और इस्लाम फैलाने का काम , कलम से, खुतबे से , नेक एखलाक पेश करने से, और न्याय करने से होता है. इस्लाम मैं जब्र (जबरदस्ती ) नहीं हैं और इस्लाम को फैलाने के लिए जब्र मना है. कुरआन २: 256. दीन (के स्वीकार करने) में कोई ज़बर्दस्ती नहीं है. २: १९० . जो तुम से लड़े, तुम भी उनसे अल्लाह की राह में जंग करो, परन्तु हद से न बढ़ो (क्योंकि) अल्लाह हद से बढ़ने वालों से प्यार नहीं करता। २: १९२ . अगर वह अपने हाथ को रोक लें तो अल्लाह बड़ा क्षमा करने वाला और दयावान है। जब इस्लाम इस रक्षात्मक जेहाद मैं इतनी शर्तें लगा सकता है तो यह इंसानों की जान लेने जैसी हरकतों को कैसे सही ठहरा सकता है, जिसमें यह भी नहीं पता होता की मरने वाला, बच्चा है, की औरत, बूढा है या , जवान, गुनाहगार है या बेगुनाह ? इस्लाम ने उन लोगों को दो चेहरे वाला (मुनाफ़िक़) कहा है जो इस्लाम का नाम ले के कुरान की हिदायत के खिलाफ कोई भी काम अंजाम देते हैं. कुरआन में कहा गया है की (मुनाफ़िक़ यह समझते हैं कि) वह अल्लाह व मोमिनों को धोका दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं को धोका देते हैं, लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं। जेहाद की बेहतरीन मिसाल आप को वाक़ए कर्बला मैं हजरत इमाम हुसैन रजि का आन्दोलन मानव इतिहास की एक अमर घटना जेहाद देखने को मिलेगी और यहीं पे जेहाद और युद्ध या आतंकवाद का फर्क भी देखने को मिलेगा. सन 61 हिजरी में हजरत इमाम हुसैन रजि अपने खानदान के साथ २ मोहर्र्र्र्म उल हराम के दिन जंग में शरीक हुए थे करबला कि उस लडाइ मे जालिमो ने बुड्डे जवान सब को शहीद कर दिया गया था । यह तक कि जालिमों नें इमाम हुसैन रजि के बेटे हजरत अली असगर जो कि सिर्फ ६ महीने थे उन जालिमो ने उस बच्चे भी शहीद कर दिया था उस दिन जो कुछ भी कर्बला की धरती पर हुआ, वह केवल एक असमान युद्ध और एक दुख भरी कहानी नहीं थी । ये घटना सदगुणों के सम्मुख अवगुणों और भले लोगों से अत्याचारियों का युद्ध थी ।
फेस्ट ऑफ़ इंडिया
आज नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के फेस्ट ऑफ़ इंडिया के कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। जिसमे उन्होंने उदिता गोस्वामी जी को नाचने और पब्लिक को नचवाने के लिए बुलाया था लोग थिरक रहे थे कि एक दम अचानक से सारी लाइट बंद हो गयी और धुआं धुआं सा माहोल हो गया फिर एक परदे के बीच में आग जलाया गया और पर्दा गिरा दिया गया तो मुझे लगा की अब इसमें से एक लड़की निकलेगी पर गलत उसमे से तो फिल्म अभिनेता इमरान हाश्मी निकले तो मुझे बहराइच के दरगाह शरीफ मेले में लगने वाले ओ पी शर्मा के जादू की याद आ गयी जो बचपन में देखा था वो भी ऐसे ही करता था। फिर थोड़ी देर बाद सब समझ आ गया की ये फिल्म एक थी डायन के स्टार कास्ट टीम है । इतने में बो बो की आवाज़ निकलते हुए कल्कि कोएच्लिन जी आती है और एक छोटे से टेबल पर लेट जाती हैं और इमरान हाश्मी उन्हें अपने जादू से धीरे धीरे ऊपर उठाते हैं । मुझे ही आज पता चला इमरान को जादू भी आता है । फिर फिल्म की टीम जिसमे हुमा कुरैशी कल्कि कोएच्लिन और इमरान हाश्मी थे । वे सब मिलकर कुछ सीडियां लोगो पर फेकने लगे और उसे देखकर हमारे सभ्य समाज के नौजवान ऐसा टूट पड़े जैसे बाड़ पीडितो को खाना और मोमबती हवाई जहाज से फेंका जा रहा हैं । पर इस कार्यक्रम की एक बात तो निराली थी कार्यक्रम का एंट्री पास बारहवीं पास के छात्रों को मुफ्त में दिया जा रहा था । इसका तो सीधा सीधा मतलब ये न निकाला जायें की आजकल शिक्षा माफिया फ़िल्मी कलाकारों को दिखाकर भोले भाले छात्रों को लुभाया जा रहा हैं
गाँधी की राह पर आम आदमी पार्टी ?
6 अप्रैल 2013 को आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने 22 मार्च से चल रहे 15 दिनो का उपवास यह कहते हुए समाप्त किया कि आज के ही दिन 1930 में गांधी जी ने नमक का कानून तोड़ा था और वे उसी से प्रेरणा लेते हुए अपना उपवास समाप्त कर रहे है। दूसरी तरफ आम आदमी के कार्यकर्ताओं के द्वारा यह प्रचारित करते हुए देखा गया कि वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया पर उनके उपवास को ज्यादा तव्ज्जोह न देने का आरोप लगा रहे हैं। वे कहते हैं कि मीडिया उनके उपवास से ज्यादा फालतू की खबरांे पर ध्यान दे रही है। खैर, वो भी सही कह रहे है। आजकल लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया से निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद एक कोरी कल्पना मात्र बन कर रह गया है। आज के संदर्भ में आम जनमानस के मन में मीडिया की भूमिका लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जगह ह्यमीडिएटरह्य की बन गई है। लोग अपनी राजनीतिक पहचान पहचान बनाने के के लिए पत्रकारिता को भी चुनते है। दूसरी बात यह है कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की मीडिया के प्रति नाराजगी आखिर क्यूं है? जबकि वह कहते है कि उनकी पार्टी तो महात्मा गांधी की विचारधारा पर चलती है। पर उनको शायद यह याद नहीं है जब 15 अगस्त 1947 की रात में सारा भारत देश आजादी के जश्न में डूबा था। तब गांधी बापू बंगाल और पंजाब में चल रहे कत्ल-ए-आम से विचलित देश में अमन कायम करने के लिए बंगाल के बेलियाघाट में उपवास कर रहे थे। हिन्दुस्तान की आजादी के ऐतिहासिक दिन में बीबीसी ने महात्मा गांधी का देशवासियों के नाम संदेश प्रसारित करने का फैसला किया पर गांधी जी ने उनको मना कर दिया। तब बीबीसी ने कहा कि गांधी जी वास्तव में भारत की जनता की नुमांइद्गी करते हैं, और उनके संदेश को बहुत सी भाषाओं में अनुवाद किया जायेगा क्योंकि उनका संदेश जरुरी है। पर हमारे राष्ट्रपिता ने उनको उत्तर दिया कि मुझे अंग्रेजी नही आती। आप नेहरु जी से बात कर लीजिए। दो राज्यो में चल रहे सांप्रदायिक दंगो से आहत बापू ने आजादी के जश्न को मनाने के बजाय एक दिन का उपवास रखना ज्यादा जरूरी समझा। उस मौके पर गांधी जी ने अपना संदेश बीबीसी को देने के बजाय बेलियाघाट के मैदान में खड़े होकर दिया। जिसे 30 हजार लोगांे की भीड़ ने सुना। इस बात का जिक्र यहां पर इसलिये करना पड़ा क्योंकि आज आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता मीडिया पर इल्जाम आखिर क्यूं लगा रहे हंै? क्या उनके पास गांधी टोपी और असहयोग आंदोलन सिर्फ मीडिया में आने के लिए ही है अमली जामें में नहीं । क्योंकि दिल्ली में हर रोज किसी न किसी नाम से चल रहे अनशन से जनता बोर हो चुकी है और आईपीएल भी अपने शबाब पर है। अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल भी सरकार को ब्लैकमेल से ज्यादा कुछ नहीं कर पाए, और अब उनका भी जादू बेकार है। अनस गुरु
बालासाहेब से दूर होती शिवसेना
17 नवम्बर 2012 का दिन शायद सबको ही याद होगा क्योंकि इस दिन हिंदुस्तान ने अपना एक हिंदुत्व का चेहरा बन चुके शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे को खो दिया। जोकि शिवसेना के लिए एक अपूर्णीय क्षति हैं। बाला साहेब ठाकरे सिर्फ एक कट्टर हिंदुत्ववादी नेता ही नहीं बल्कि एक अच्छे इंसान भी थे। हम सब उनका ह्रदय से सम्मान करते हैं , जब बालासाहेब ठाकरे के निधन की खबर देशकी जनता को लगी तो पूरे देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी । लोगो के बीच इस बात की चर्चा होने लगी कि अब शिवसेना पर से बालासाहेब के परिवार का वर्चस्व ख़त्म हो जायेगा | क्योंकि बालासाहेब छवि उनके बेटे उद्धव ठाकरे में नहीं बल्कि उनके भतीजे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे में दिखती हैं | हालाँकि राज और उद्धव के बीच तो बालासाहेब के सामने ही मतभेद था | इसी कारण से राज ने अपनी एक अलग पार्टी बनायीं थी | इस वजह से उनकी शिवसेना में वापसी लगभग असंभव सी लग रही हैं। आज 1993 के मुंबई बम धमाकों के मामले में प्रतिबंधित हथियार रखने के दोष में बॉलिवुड स्टार संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजा सुनाई गई है | और उनकी सजा पर जब प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने महाराष्ट्र के राज्यपाल शंकर नारायण से अपील की है कि वह भारतीय सविंधान के अनुछेद १६१ के तहत संजय दत्त को माफ़ कर दें | इससे राजनीतिक हलको में गर्माहट आ गयी | अनुछेद १६१ (अनुछेद १६१ के अंतर्गत माफ़ी देने का अधिकार न्यायिक शक्ति से अलग हैं क्योंकि किसी अदालत के द्वारा फैसला सुनाने के बाद राज्यपाल या राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह दोषी की सजा कम या माफ़ कर सकता है ) जस्टिस काटजू की इस अपील का कुछ लोगो ने समर्थन भी किया हैं। लेकिन मुद्दा यह है की शिवसेना की एमएलसी नीलम गोर्हे ने संजय दत्त की माफ़ी का विरोध किया है। इससे साफ़ लगता है की अब शिवसेना बालासाहेब की विचारधारा और उनके फैसलों को कोई महत्व नहीं देता | आज शिवसेना बालासाहेब ठाकरे से अलग अपना रास्ता बना रही हैं | क्योंकि जब 26 अप्रैल 1993 को फिल्म अभिनेता संजय दत्त जुर्म कबूलने के बाद १६ महीने के लिए जेल गए थे तब उनके पिता सुनील दत्त जी हर तरफ से थक हार कर आखिर में रात को ११ बजे बालासाहेब ठाकरे से मिलने मातोश्री गए । बालासाहेब ने उनसे सिर्फ एक ही सवाल किया था की क्या उनको लगता है की उनका बेटा निर्दोष हैं | सुनील दत्त कहाँ हाँ उसके बाद बालासाहेब ने उनको दिलासा दी की उनका बेटा जल्द ही जेल से छूट जायेगा | क्योंकि उस समय महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना गठबंधन की सरकार थी | जमानत से बाहर आने के बाद संजय दत्त सबसे पहले सिद्धिविनायक मंदिर माथा टेकने गए फिर उसके बाद मातोश्री में बालासाहेब से आशीर्वाद लिया | बालासाहब भी संजय दत्त को पूरा स्नेह देते थे | अफ़सोस आज जब संजय फिर से परेशानी में घिर गए तो उनके साथ ना ही उनके पिता सुनील दत्त साहेब है और ना ही बालासाहेब ठाकरे ऐसे में तो वर्तमान शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे का फ़र्ज़ बनता हैं कि अपने पिता की तर्ज़ पर संजय दत्त कि मदद करना चाहिए । बालासाहेब के लहू से सींची गयी शिवसेना आज संजय से खुद को अलग कर रही है ।
Think
बहुत मन था मेरा स्कूल जाने का पर क्या करूँ मजबूरी माँ बाप की थी और हम चाय की दूकान पर आ गए और उन्ही दुकानों पर हमने सीखा की हमारे देश में राज्य कौन करता हैं किस पार्टी ने कितना घोटाला किया सब कुछ तो हमने इसी दूकान पर सीखा है फिर भी कभी दिल करता है पढाई का तो पूछता हूँ दूकान पर आने वाले बड़ी बड़ी ऑफिस के साहेबो से की पढाई क्या होती है तो कहते छोटू तू चाय बड़ी कड़क बनाता है बस इन्ही सब तारीफों को सुनकर जी लेता हूँ और उनकी बाते सुनकर तो ऐसा लगता है लगता है पढाई में बेकार चीज है
शहीद भगत सिंह
Bhagat Singh 23 मार्च का दिन उन आम दिनों की तरह ही शुरू हुआ जब सुबह के समय राजनीतिक बंदियों को उनके बैरक से बाहर निकाला जाता था। आम तौर पर वे दिन भर बाहर रहते थे और सूरज ढलने के बाद वापस अपने बैरकों में चले जाते थे। लेकिन आज वार्डन चरत सिंह शाम करीब चार बजे ही सभी कैदियों को अंदर जाने को कह रहा था। सभी हैरान थे, आज इतनी जल्दी क्यों। पहले तो वार्डन की डांट के बावजूद सूर्यास्त के काफी देर बाद तक वे बाहर रहते थे। लेकिन आज वह आवाज काफी कठोर और दृढ़ थी। उन्होंने यह नहीं बताया कि क्यों? बस इतना कहा, ऊपर से ऑर्डर है। चरत सिंह द्वारा क्रांतिकारियों के प्रति नरमी और माता-पिता की तरह देखभाल उन्हें दिल तक छू गई थी। वे सभी उसकी इज्जत करते थे। इसलिए बिना किसी बहस के सभी आम दिनों से चार घंटे पहले ही अपने-अपने बैरकों में चले गए। लेकिन सभी कौतूहल से सलाखों के पीछे से झांक रहे थे। तभी उन्होंने देखा बरकत नाई एक के बाद कोठरियों में जा रहा था और बता रहा था कि आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। हमेशा की तरह मुस्कुराने वाला बरकत आज काफी उदास था। सभी कैदी खामोश थे, कोई कुछ भी बात नहीं कर पा रहा था। सभी अपनी कोठरियों के बाहर से जाते रास्ते की ओर देख रहे थे। वे उम्मीद कर रहे थे कि शायद इसी रास्ते से भगत सिंह और उनके साथी गुजरेंगे। फांसी के दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील मेहता को उनसे मिलने की इजाजत मिल गई। उन्होंने अपने मुवक्किल की आखिरी इच्छा जानने की दरखास्त की थी और उसे मान लिया गया। भगत सिंह अपनी कोठरी में ऐसे आगे-पीछे घूम रहे थे जैसे कि पिंजरे में कोई शेर घूम रहा हो। उन्होंने मेहता का मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या वे उनके लिए 'दि रेवोल्यूशनरी लेनिन' नाम की किताब लाए हैं। भगत सिंह ने मेहता से इस किताब को लाने का अनुरोध किया था। जब मेहता ने उन्हें किताब दी, वे बहुत खुश हुए और तुरंत पढ़ना शुरू कर दिया, जैसे कि उन्हें मालूम था कि उनके पास वक्त ज्यादा नहीं है। मेहता ने उनसे पूछा कि क्या वे देश को कोई संदेश देना चाहेंगे, अपनी निगाहें किताब से बिना हटाए भगत सिंह ने कहा, मेरे दो नारे उन तक पहुंचाएं..इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद। मेहता ने भगत सिंह से पूछा आज तुम कैसे हो? उन्होंने कहा, हमेशा की तरह खुश हूं। मेहता ने फिर पूछा, तुम्हें किसी चीज की इच्छा है? भगत सिंह ने कहा, हां मैं दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं। भगत ने कहा, पंडित नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने जो रुचि उनके मुकदमे में दिखाई उसके लिए दोनों का धन्यवाद करें। मेहता के जाने के तुरंत बाद अधिकारियों ने भगत सिंह और उनके साथियों को बताया कि उन्हें फांसी का समय 11 घंटा घटाकर कल सुबह छह बजे की बजाए आज साम सात बजे कर दिया गया है। भगत सिंह ने मुश्किल से किताब के कुछ पन्ने ही पढ़े थे। उन्होंने कहा, क्या आप मुझे एक अध्याय पढ़ने का भी वक्त नहीं देंगे? बदले में अधिकारी ने उनसे फांसी के तख्ते की तरफ चलने को कहा। एक-एक करके तीनों का वजन किया गया। फिर वे नहाए और कपड़े पहने। वार्डन चतर सिंह ने भगत सिंह के कान में कहा, वाहे गुरु से प्रार्थना कर ले। वे हंसे और कहा, मैंने पूरी जिंदगी में भगवान को कभी याद नहीं किया, बल्कि दुखों और गरीबों की वजह से कोसा जरूर हूं। अगर अब मैं उनसे माफी मांगूगा तो वे कहेंगे कि यह डरपोक है जो माफी चाहता है क्योंकि इसका अंत करीब आ गया है। तीनों के हाथ बंधे थे और वे संतरियों के पीछे एक-दूसरे से ठिठोली करते हुए सूली की तरफ बढ़ रहे थे। उन्होंने फिर गाना शुरू कर दिया-'कभी वो दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे, ये अपनी ही जमीं होगी ये अपना आसमां होगा। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही नाम-ओ-निशां होगा।' जेल की घड़ी में साढ़े छह बज रहे थे। कैदियों ने थोड़ी दूरी पर, भारी जूतों की आवाज और जाने-पहचाने गीत, 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' की आवाज सुनी। उन्होंने एक और गीत गाना शुरू कर दिया, 'माई रंग दे मेरा बसंती चोला' और इसके बाद वहां 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आजाद हो' के नारे लगने लगे। सभी कैदी भी जोर-जोर से नारे लगाने लगे। तीनों को फांसी के तख्ते तक ले जाया गया। भगत सिंह बीच में थे। तीनों से आखिरी इच्छा पूछी गई तो भगत सिंह ने कहा वे आखिरी बार दोनों साथियों से गले लगना चाहते हैं और ऐसा ही हुआ। फिर तीनों ने रस्सी को चूमा और अपने गले में खुद पहन लिए। फिर उनके हाथ-पैर बांध दिए गए। जल्लाद ने ठीक शाम 7:33 बजे रस्सी खींच दी और उनके पैरों के नीचे से तख्ती हटा दी गई। उनके दुर्बल शरीर काफी देर तक सूली पर लटकते रहे फिर उन्हें नीचे उतारा और जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सब कुछ शांत हो चुका था। फांसी के बाद चरत सिंह वार्ड की तरफ आया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपनी तीस साल की नौकरी में बहुत सी फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी को भी हंसते-मुस्कराते सूली पर चढ़ते नहीं देखा था, जैसा कि उन तीनों ने किया था। मेरा रंग दे बसंती चोला, माए रंग दे बसंती चोला दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है देख के वीरों की क़ुरबानी अपना दिल भी बोला मेरा रंग दे बसंती चोला ... हमारे सच्चे शहीद को श्रद्धांजलि
बहुत थक गया हूँ
जिन्दगी की दौड मे थक गया हूँ कुछ देर आराम चाहता हूँ! इस भाग दौड़ मेँ बहुत कुछ पीछे छुट गया है बैठ के फिर से उनको संभालना चाहता हूँ आसमान को छूने का इरादा था मगर हौसला टुटा है, अब जंमी पर ही घर बनाना चाहता हूँ सदियों से इस दुनिया को परख नहीं पाया मैं कुछ लम्हे देकर परखना चाहता हूँ एक सवाल बन गया था हर एक नजर मे इस सवाल का जवाब ढूंढना चाहता हूँ दिखावें में जीते हैं जो लोग आजकल रुह की अहमियत उन सबको बताना चाहता हूँ.... जिन्दगी की दौड मे थक गया हूँ कुछ देर आराम चाहता हूँ किसी वृछ की ठंडी छाव मेँ सदियों की गर्मी को मिटाना चाहता हूँ... बहुत जख्म है इस दिल के सागर में कुछ अलफ़ाज़ के जरिये जताना चाहता हूँ हर तरफ अजनबी लोग हैं भरे इस जमानो में कुछ लोगो से भागना चाहता हूँ
उड़ान
हर बाल की खाल की यह चाल भी खा जाये इसके हाथ पड़ जाये तो महीने साल भी खा जाये किसी बेहाल का बचा हाल जो हाल खा जाये बेमौत मरते मन का यह मलाल खा जाये लालु का लाल खा जाये नक्सल बाड़ी की नाल खा जाये बचपन का धमाल खा जाये बुडापे का शाल खा जाये हया तो छोड़ो बेहया की चाल भी खा जाये और अगर परोसा जा सके तो फिर आदमी भी खा जाये साभार : उड़ान
World Marathi Day Celebrates today
World Marathi Day Celebrates today 27 february 2013 An eminent Marathi poet Vishnu Vāman Shirwadkar Known as Kusumagraj’s birthday is celebrated as World Marathi Day. He was born on 27th February, 1912 in Pune, Maharashtra. He spent most of his life in Nashik, Maharashtra and his primary education was in Pimpalgaon and high school education was in New English School, Nashik, which is now called as J.S. Rungtha High School of Nashik. He was a Marathi poet and novelist, short story writer, apart from being a humanist, who wrote of freedom, justice and emancipation of the deprived, in a career spanning five decades starting in pre-independence era. And he wrote 16 volumes of poems and three novels, 8 volumes of short stories, 7 volumes of essays, 18 plays and 6 one-act plays. His works like the Vishaka (1942), a collection of lyrics, inspired a generation into the Indian freedom movement, and is today considered as one of the masterpieces of Indian literature. Natsamrat which has important place in Marathi literature. He received several state awards and National awards including the 1974 Sahitya Akademi Award in Marathi for Natsamrat, and the Jnanpith Award in 1988. He was also elected as the chairperson of the World Marathi Conference in 1989. As a 20 years youth , Shirwadkar participated in a nonviolent resistance march satyagraha- in support "untouchable" (Harijan) community. In the past the priests had not allowed free temple access to that community under the Hindu caste system. Throughout his life, he either participated in or led many movements in Nashik to counter social or political injustice of some or other kind. He published his first collection of poems, Jeevanlahari was published. Soon he also got involved with Marathi cinema in Nashik as he wrote a script for a mythological film, Sati Sulochana in which he also acted. He also worked in journalism for while, before coming back to poetry as a mainstay. 1942 was the turning point in the career of Kusumagraj, as a father-figure of Marathi literature, Vishnu Sakharam Khandekar, published Kusumgraj's compilation of poetry, Vishakha at his own expense, and in his preface describing Kusumagraj as a poet of humanity, wrote. After 1943, he started adapting the plays by literary giants like Oscar Wilde, Moliere, Maurice Maeterlinck and Shakespeare, especially his tragedies, and which played an important role in boosting Marathi theatre of the period. This continued into the 1970s when his masterpiece Natasamrat was first staged in 1970, with Sriram Lagoo as the lead. In 1950 he founded in Nasik an Organization for Social Good --Lokahitawādi Mandal. While temperamentally he ranged from reclusive to exclusive, he had a keen social sense and championed the cause of the downtrodden without jumping himself into ground level activities. But his main claim to fame was his genius as a poet and writer. In 1954, he adapted Shakespeare's Macbeth, as Rajmukut, 'The Royal Crown' to Marathi, it starred Nanasaheb Phatak and Durga Khote (Lady Macbeth) and later he also adapted Othello in 1960 He also worked as a lyricist in Marathi cinema.and he died on 10 March,1999 in Nashik Maharshtra