साइलेंट फ़िल्मों में आवाज़ का जादू: 1920 के दशक के वे 'बेंशी' (Benshi) जो परदे के पीछे से कहानी सुनाते थे
आज का दौर है डॉल्बी एटमॉस साउंड का। अभिनेता की हर साँस, फुसफुसाहट, तलवार की हर झनकार हमारे कानों तक सीधे पहुँचती है। लेकिन एक जमाना ऐसा भी था जब पर्दे पर बस छायाएँ नाचती थीं और उन्हें आवाज़ देता था एक इंसान। जी हाँ, एक इंसान, जो फिल्म के पर्दे के बगल में, मंच पर खड़ा होकर पूरी कहानी, हर पात्र का संवाद, हर मनोभाव, यहाँ तक कि घोड़े की टापों और तलवारों की आवाज़ तक खुद अपनी वाणी से पैदा कर देता…











