मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)
मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)
(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ….. ” का तीसरा दिन ……..परसाई द्वारा मुक्तिबोध पर लिखा गया संस्मरण)
प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया था। हम लोगों ने सलाह की कि इसे रमेश के नाम से बैंक में जमा कर देना चाहिये। मुक्तिबोध पर…
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