The poultry sector is possibly the fastest growing and most flexible of all livestock sectors. Driven primarily by very strong demand, it has expanded
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The poultry sector is possibly the fastest growing and most flexible of all livestock sectors. Driven primarily by very strong demand, it has expanded
Kadaknath Chicken Chicks 1 year old for sale order online free delivery low price
Management of Kadaknath Hen
मुर्गी पालन में कुक्कुट प्रबंधन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है कुक्कुट व्यवसाय में लगभग प्रतिशत समस्याएं कुक्कुट प्रबंधन में की गयी लापरवाही के कारण ही उत्पन्न होती है| अत: कड़कनाथ पालक को प्रबंधन के पूर्व जानकारी होनी चाहिए ताकि आर्थिक क्षति का सामना न करना पड़े|
ऐसा देखा गया है कि मुर्गी पालक मुर्गी शेड में क्षमता से अधिक चूजों का पालन करते है, और जगह के अभाव के कारण बीमारियों की शुरुआत हो जाती है| जगह का अभाव होने पर सबसे पहले बुरादा गीला हो जाता है | अमोनिया बनती है फिर सांस संबंधी समस्या उत्पन्न होती है, ई. कोलाई बैक्टीरिया आती है, काक्सीडियोसिस परजीवी आती है , पीकिंग (नोचना) होती है| इस प्रकार कुक्कुट आवास बीमारियों का जनक बन जाता है|
किसी भी मुर्गी पालक को ऐसे विकट समय का सामना न करना पड़े, इसलिए व्यवसाय में कदम रखने के पूर्व पूर्ण विश्वास के साथ जानकारी अर्जित कर लेना चाहिए|
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Method of giving grains and water in Kadaknath Chick
पानी देने का तरीका- पानी हमेशा साफ़ व ताज़ा पिलाना चाहिए| पानी देने से पूर्व पानी के बर्तन को हमेशा निरमा से स्वच्छ कर लेना चाहिए तत्पश्चात बर्तन धूप में सुखा कर साफ़ कपड़े से पोंछकर फिर ताज़ा पानी लगाना चाहिए| पानी में विटामिन या कोई भी अन्य दवा देना हो तो, सुबह के समय पहले पानी में देना चाहिए| दवाइयां पिलाने के लिए कम पानी का उपयोग करना चाहिए| जिससे कि दवायुक्त पूरा पानी चूजे पी सके| दवायुक्त पानी समाप्त हो जाने के बाद सादा पानी लगा देना चाहिए|
दाना देने का तरीका:- दाना देने से पूर्व दाने के बर्तनों की सफाई आवश्यक रूप से कर लेना चाहिए एवं दाना फीडरों में इतना भरना चाहिए कि दाना गिरने न पायें| दाना भरने के बर्तनों को सप्ताह में दो बार निरमा या ब्लीचिंग से अवश्य धोना चाहिए| प्रत्येक दो घंटे में दाना डालना चाहिए या तो फीडरों में खाली हाथ चलाना चाहिए ताकि दाने में जो पाउडर हो वह भी दाने के बड़े टुकड़ों के साथ उठता (खपत) जाए क्योंकि दाने में जो पाउडर होता है,आवश्यक तत्व उसी में अधिक मात्रा में पाये जाते है|
दाना मिलाने का तरीका- यदि दाने में कोई दवा मिलाना हो तो दवा की सही मात्रा तौलकर पहले थोड़े से दाने में मिला लेना चाहिए| इसके बाद दवा मिले हुए दाने को, जितने दाने में मिलाना हो उसके ऊपर बुरक लेना चाहिए बुरकते समय ध्यान रखना चाहिए कि दवा मिले दाने का पाउडर न उड़ने पाये नहीं तो दवा की मात्रा भी उड़ जायेगी| इसके लिए सावधानी पूर्वक दाने में दवा मिलानी चाहिए| दाने में दवा का बुरकाव कर लेने के बाद दाने के ढेर को फावड़े की सहायता से पहले दो बार मिलाना चाहिए| इसके बाद फावडे को घुमा-घुमा कर दाना मिक्स करना चाहिए मिक्स दाने को खुला नहीं छोड़ना चाहिए इसे पुन: बोरे में भरकर रखना चाहिए| दाना मिलते समय यह देखना आवश्यक है कि दाने में नमी, फफूंद आदि तो नहीं है यदि है तो ऐसे दाने का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए या नमी युक्त ढेलों को छानकर अलग कर लेना चाहिए एवं दाने को सुखा लेना चाहिए| ध्यान रहे नमी युक्त ढेले, दाने में मिक्स नहीं करना चाहिए| मुर्गी व्यवसाय में हमेशा अच्छा दाना , अच्छी दवा , अच्छा पानी, अच्छे चूजों का उपयोग करना चाहिए| मुर्गियों के लिए उपयोग में लाने वाला देना अधिक दिनों तक तैयार करके नहीं रखना चाहिए क्योंकि इसमें विषाक्त पदार्थ बनने लगते है जो कि मुर्गियों के लिए हानिकारक है|
दाना रखने में सावधानियां: 1. दाना हमेशां सूखी व् साफ़ जगह पर रखना चाहिए 2. दाने को लकड़ी के तख्ते के ऊपर रखना चाहिए ताकि दाने में नमी का प्रभाव न पड़ सके| 3. लकड़ी के तख्ते को दीवार से थोड़ा दूर रखना चाहिए 4. आवश्यकता से अधिक स्टॉक नहीं करना चाहिए 5. दाना गोदाम में पुराने बोरे या पुराना दाना नही रखना चाहिए 6. दाना के गोदाम में बिजली बोर्ड या बिजली के तार खुले नहीं छोड़ना चाहिए|
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Kadaknath Brooding Management
ब्रूडिंग व्यवस्था चूजों के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है| क्योकि ब्रूडिंग में ही पक्षी का भविष्य, उत्पादन एवं लाभ व हानि निर्धारित होती है| इसलिए ब्रूडिंग का सही प्रबंधन पहले दिन से लेकर 4-6 सप्ताह तक की आयु तक में करना चाहिए| जब तक की चूजा अपने आप में सक्षम नहीं हो जाता है तब तक उन्हें सेयना पड़ता है|ब्रूडिंग का समय कड़कनाथ पालन के लिए बहुत कठिन होता है| यदि कुक्कुट पालक ब्रूडिंग के समय सही व्यवस्था नहीं कर पाता तो चूजों के मरने की संख्या प्रथम सप्ताह में ही 7 से 10 प्रतिशत हो जाती है|
ब्रूडर क्या है:- यह अधिकतर बांस की टोकनी या चद्दर का बना होता है|जो चूजों को गर्मी प्रदान करता है, इन ब्रूडरो में 100 से 200 वाट के बल्ब लगे रहते है जिनके जलने से गर्मी पैदा होती है जो चूजों के लिए ठण्ड के दिनों में आवश्यक है| ब्रूडरों की ऊंचाई प्रथम सप्ताह में 6 से 10 इंच तक होनी चाहिए| स्थिति अनुसार ऊंचाई घटाई एवं बढ़ाई जा सकती है| चिक गार्ड:- यह चद्दर या कार्ड बोर्ड का बना होता है| इसकी ऊंचाई लगभग 1 फीट से 1.5 फिट तक होती है तथा पट्टी की लम्बाई 8 फिट से 10 फिट तक होती है| चिक गार्ड को ब्रूडर से 25- 30 इंच की दूरी से घेर देना चाहिए| वातावरण के मुताबिक इसकी ऊंचाई घटाई एवं बढ़ाई जा सकती है| ब्रूडर के बाहर चिक गार्ड के अंदर दाने एवं पानी के बर्तन लगा देना चाहिए| 6 से 10 दिन के अंदर ब्रूडर की ऊंचाई बढ़ा देना चाहिए एवं चिक गार्ड की आवश्यकता न हो तो निकल कर अलग कर देना चाहिए या दो चिक गार्ड मिलाकर एक कर देना चाहिए| गर्मी के दिनों में 1-2 वाट बिजली प्रति चूजे के लिए पर्याप्त होती है लेकिन ठंडी के दिनों में 4-5 वाट बिजली की खपत प्रति चूजों पर होती है एक चिक गार्ड में ज्यादा से ज्यादा 250 से 300 चूजों की ब्रूडिंग की जा सकती है| ब्रूडिंग तापमान:- सही तापमान बनाए रखने को ही ब्रूडिंग कहते है| अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए प्रथम सप्ताह में 35°C से 37°C या 90°f से 95 °f होना अति आवश्यक है| प्रथम सप्ताह के बाद प्रति सप्ताह 2.5°C या 5°C तापमान कम करते जाना चाहिए| अंतिम तापमान 21°C से 23°C या 65°f से 70°f तक होना चाहिए| तापमान मापने की इकाई थर्मामीटर होती है लेकिन थर्मा मीटर पर आश्रित नहीं रहना चाहिए| सबसे अच्छा तरीका यह है कि चूजों की स्तिथि (रहन-सहन) से तापमान का अंदाजा लगाना चाहिए| यदि चिक गार्ड के अंदर स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहे हो तो ऐसी स्तिथि में यह समझाना चाहिए कि तापमान चूजों के अनुकूल है|
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Maintenance of Kadaknath Chicks for one to Seven Days
प्रथम दिन
ब्रूडर का तापमान 90 डिग्री फ़ारेनहाइट से 95 डिग्री फ़ारेनहाइट तक होना अतिआवशयक है|
चूजों को दाना खिलाने एवं पानी पिलाने का अभ्यास आवश्यक रूप से कराना चाहिए
पानी में इलेक्ट्रॉल 24 घंटे तक से देना चाहिए, ई. केयर सी दिन में एक बार देना चाहिए|
ध्यान रहे कि बुरादे के ऊपर बिछाए गए पेपर कम से कम 6 दिन तक बिछे रहना चाहिए यदि पेपर गीला होता है, या फट जाता है तो उसे बदल देना चाहिए|
8 से 10 किलो तक चिक मेज 1000 चूजों पर देना चाहिए| मात्र 24 घन्टे चिक मेज पेपर में बुरक देना चाहिए| इसके बाद ट्रे में या बेबी चिक फीडर में फीडिंग कराना चाहिए|
यदि चूजा प्रथम सप्ताह में खुले बुरादे में चलता है तो यह आवश्यक है कि आने वाले दिनों में ई कोलाई या सांस सम्बंधी समस्या बनेगी|
दूसरे दिन:- चिक फीड ( स्टार्टस मेस )चालू कर देना चाहिए एवं चूजों को देखे कि वे दाना व पानी सही मात्रा में ग्रहण करते है या नहीं| पानी में इलेक्ट्रॉल, विटामिन बी काम्प्लेक्स, एड़ी 3 ई. सी. एवं ई. केयर देना चाहिए|
तीसरे दिन:-
विटामिन, प्रोबायोटिक्स, ई. केयर सी. दिन में एक बार पानी में देना चाहिए एवं एंटीबायोटिक दवा हर पानी में देना चाहिए|
पानी के बर्तन उपयुक्त मात्रा में होने चाहिए तथा पानी के बर्तन को उल्टे स्टैंड में लगाना चाहिए ताकि छोटे बड़े सभी चूजे भलीभाँति पानी पी सके|
चौथे दिन:-
विटामिन, प्रोबायोटिक्स का पानी दिन में एक बार एवं एंटीबायोटिक दवा का पानी हर पानी में देना चाहिए|
ब्रूडर की थोड़ी सी ऊंचाई बढ़ा देनी चाहिए| चिक गार्ड की चौड़ाई भी बढ़ा देनी चाहिए देखना चाहिए चूजे आराम से है या नहीं|
पांचवे दिन:-
विटामिन, प्रोबायोटिक्स का पानी दिन में एक बार एवं एंटीबायोटिक दवा हर बार पानी में देना चाहिए|
पांचवे दिन यदि देखने में महसूस हो की जगह की कमी हो रही तो चिक गार्ड मिलाकर एक कर देना चाहिए ताकि जगह की वृद्धि हो सके और चूजों को भी आराम मिल सके
छठवें दिन:-
केवल विटामिन एवं प्रोबायोटिक्स का पानी देना चाहिए|
पेपर हटा देना चाहिए, पानी एवं दाने के बर्तन प्रति हज़ार चूजो पर 3:3 की मात्रा में लगाना चाहिए
ब्रूडर की ऊंचाई लगभग 1 फुट कर देनी चाहिए गर्मी के दिनों में चूजे बिना ब्रूडर के पाले जा सकते है| प्रकाश के लिए मात्र बल्ब लटका देना चाहिए|
सातवें दिन:-
इलेक्ट्रॉल प्रत्येक बार पानी में देना चाहिए एवं ई. केयर सी दिन में एक बार देना चाहिए|
लसोटा एफ -1 आँख या नाक में ड्रॉपर की सहायता से एक एक बूंद देना चाहिए, टीकाकरण हमेशा ठन्डे मौसम में या रात के समय करना चाहिए ताकि चूजे तनाव मुक्त रह सकें
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Benefits of Kadaknath- https://wingsgrow.org
बर्ड फ्लू के कारण व् बचाव
यह पक्षियों में होने वाले विषाणु जानिक संक्रामक रोग है| सामान्तयः यह पक्षियों को ही संक्रमित करताहै परन्तु यह सूकर व् अश्व को भी संक्रमित कर सकता है| इसके अतिरिक्त विपरीत परिस्थितियों में स्पीसीज बैरियर को क्रॉस कर यह मनुष्य को भी संक्रमित कर सकता है|
रोग का कारण- यह विषाणु द्वारा होने वाला रोग है यह पशु पक्षी व मनुष्यों को भी संक्रमित करता है| विषाणु ए.बी.व् सी प्रकार का होता हैजिसमे ' ए ' टाइप पोल्ट्री, सूकर व् अश्व में संक्रमण करता है| विषाणु वर्तमान में एच. एन. प्रकृति का है|
इन्क्यूवेशन अवधि- विषाणु के पक्षी में प्रवेश करने से कुछ घंटो से 3 दिन तक| यह अवधि विषाणु की प्रकृति, मात्रा , प्रवेश का मार्ग, तथा पक्षी के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है|
पक्षियों में रोग का प्रसार- संक्रमित पक्षियों की आंख, स्वाँस नलिका तहत बीट के संपर्क में आने से पक्षियों में फैलता है संक्रमित पक्षियों व कुक्कुट प्रक्षेत्र के प्रयोग में आने से रोग फैल सकता है| विदेशी, प्रवासी व् जंगली पक्षी इस रोग के कैरियर है अतः इनके संपर्क से पक्षियों में रोग फैल सकता है
पक्षियों के मुख्य लक्षण- • हरे व लाल रंग की बीट| • पक्षी को ज्वर आना| • पक्षियों के गर्दन तथा आँखों के निचले हिस्से में सूजन| • फैटल कलगी व् पैरो का बैगनी हो जाना|
मृत पक्षी में लीजन- • यकृत, तिल्ली व गुर्दे पर नेक्रोटिक फोकाई | • संदेहास्पद या आउट ब्रेक की स्थिति में किसी भी प्रकार से पोस्टमार्टम न किया जाये| • स्वांस तंत्र में फाइब्रिनस द्रव का भरा होना| • पैरों का बैगनी होना तथा कलगी का लाल होना| • मृत पक्षी को सील बंद कर कोल्ड चेन में एच. एस. ए.डी. एल प्रयोगशाला भोपाल को जाँच हेतु भेजना होता है|
रोग से बचाव हेतु सुझाव: • पक्षी फार्म, पक्षी अभ्यारण्य, जलाशय, झील के आस पास न हों| • पक्षी फार्म के आस पास सूअर पालन न करें| • फार्म के आस पास साफ सफाई रखें तथा कूड़ा करकट व गंदगी न इकठ्ठा होने दें|मृत पक्षियों का डिस्पोजल/निस्तारण गड्डे में दबाकर किया जाये • नियमित रूप से फार्म का लीटर बदलते रहे तथा समय समय पर (प्रति 15 दिन पश्चात) विसंक्रमण कार्यवाही करते रहे|
“कुक्कुट उत्पाद खाने से नही कोई नुकसान| अंडा, मांस खूब पकाकर खाए अगर इंसान||”
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