𖤓 माता के लिए नैवेद्य भोग 𖤓
उत्सव में प्रसाद एवम नैवेद्य का मूल उद्देश्य " तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा " की भावना पर निहित है । जो प्रकृति का है वह प्रकृति को समर्पित है । प्रकृति की आधारभूता मां भवानी आद्याशक्ति को समर्पित है ।
मां कात्यायनी ने इस स्वरूप में महिषासुर का मर्दन किया था , और मां अत्यधिक क्रोध में थी अतैव शहद अर्थात् मधुपान करके मां ने उष्णता को और थकान को शांत किया था। शहद जो की पुष्प मकरंद से निर्मित है , विभिन्न प्रकार के पोषक और खनिज तत्वों से भरपूर है , जो शरीर के वात,पित्त और कफ संबंधित असंतुलन को ठीक कर चयापचय और ग्रंथियों के कार्यान्वन को नियमित करता है । अतैव मां को नैवेद्य स्वरूप शहद एवम शहद से निर्मित भोग समर्पित करते हैं।
भोग हेतु
मधुरस एवम मधुपाक
एवम इस के साथ साबूदाना समैया की खीर , काशी हलवा के साथ
जलपान हेतु
गुलाब अर्क से निर्मित दूध एवम जल
ब्रहमार्पणं ब्रहमहविर्ब्रहमाग्नौ ब्रहमणा हुतम्।
ब्रहमैव तेन गन्तव्यं ब्रहमकर्मसमाधिना ॥
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु।
मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:: ॥
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