नई सड़क (रविश कुमार जी का ब्लॉग) कभी कभी जाना होता हैं । आज का लेख था क्यों नहीं है मीडिया में अंबेडकर जयंती की कवरेज़ ? सवाल था पत्रकारिता की छात्र शैनन का सही भी है। मेनस्ट्रीम मीडिया ज्यादातर उन्ही खबरों को कवर करती हैं जिसमे कोई बड़ा नेता हो बस बाकी बाबा साहब के नाम पर होने वाले छोटे बड़े कार्यकर्मो को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाता है, क्यूंकि उसमे बड़ा चेहरा नहीं होता इसमें दर्द हैं, उन लोगो का जो की उस समाज से आते हैं जिन्हे मंदिरो में जाने से सिर्फ उनकी जाति और वर्ण की वजह से रोक दिया जाता था आज भी होता है । उनके कानो में शीशा पिघला कर और जबान काँट दिया जाता था। सिर्फ उनके किसी श्लोक को सुनने और उच्चारण मात्र से (सिर्फ आलोचना नहीं अब तो ये मुसलमानो में भी शिया,सुन्नी,देवबंदी,बरेलवी और काद्यानि के नाम पर होता हैं।भारत में तो सिर्फ एक दूसरे की मस्जिदो में जाने की इजाजत नहीं गर गया तो मस्जिद धुलवा दी जाती है। दूसरे देशो में तो जान ले लेते हैं) खैर अच्छा लगा देख कर की दलित अब अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। मुस्लिमो में भी बहुत जरुरत हैं बाबा साहब की सबसे पहले औरतो का मस्जिद में प्रवेश करा दें (सऊदी में होता और भी अरब देशो में हैं ) ताकि वो भी अल्लाह के घर में अपनी फ़रियाद कर सकें, औरत को निकाह पढ़ाने का और इमामत( नमाज पढ़ाने को इमामत कहते हैं) करने का हक़ और भी कई बातें वो फिर कभी।