विवाह मेलापक: एक अध्ययन:- **********************
विवाह मेलापक: एक अध्ययन:- भाग-1.
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जब भी कोई यजमान हम से कुण्डली मिलान करने के लिए आग्रह करे तो सर्वप्रथम हम उससे एक प्रश्न अवश्य करें: प्रश्न:- यदि मेरी गणना में यह परिणाम आता है कि यह संबंध (proposal) आपके अनूकूल नही है, तब क्या आप यह proposal सरलता से छोड़ देंगे? अब यदि यजमान सहर्ष अपनी स्वीकृति दे तो हम यह मान लें कि इस यजमान की ज्योतिष में और हम पर पूर्ण आस्था है। अब हम यजमान को बताएगें कि :-
( अ ) -कुंडली मिलान के चार सोपान हैं :-
1-मंगलीक मिलान:- मुख्यत: भावी अनिष्ट का पता चलता है।
2-कुछ विशेष विवाह मेलापक निषेध योग।
3-गुण मिलान:- मुख्यतः वर एवं कन्या के आपस की समझदारी और सन्तान की सरलता से प्राप्ति का पता चलता है।
4-प्रस्तावित वर-वधु की अन्य विशेषताएं:-i- चरित्र, ii-सन्तान योग, iii-वैवाहिक सुख, iv-सौभाग्य/बहुविवाह योग, v-लग्नेश-चतुर्थेश और दसमेश की स्थिति।और...( ब )- हमारी यह .....फीस है।{अब हम किसी के
🌸कुलपुरोहित तो है नही इसलिये दक्षिणा की भावना या फीस बोलने में संकोच न रखें }और दूसरी परिस्थिति में यदि हमारा यजमान यह संकेत दे कि,
1-यह प्रपोजल बहुत मुसकिल से मिला है,
2-सब देखे-भाले लोग है या रिश्तेदारी में से ही हैं,
3-बात बहुत आगे बढ़ गई है...तब यह कहने की आवश्यकता नही कि यह यजमान केवल अपनी आत्मसन्तुष्ठी के लिए हमारी स्वीकृति चाहता है। उसे ज्योतिष में या हम पर कोई विशेष आस्था नही है।अपनी सेवाएं तो हमें दोनों परिस्थितियों में देनी ही हैं।अब कोई बेशक कहे के यह गंदा है, पर क्या करें ? आजीविका है धन्दा है।
क्रमस: विवाह मेलापक: एक अध्ययन:- भाग-2.
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विवाह मेलापक के लिए हमारे पास दो प्रकार के यजमान आते हैं।
1- वे जो केवल अपनी आत्मसन्तुष्ठी के लिए हमारी स्वीकृति चाहते हैं।
2- वे जिन्हें ज्योतिष में और हम पर और हमारे ज्योतिषीय ज्ञान पर पूर्ण आस्था है।
वे यजमान जो केवल अपनी आत्मसन्तुष्ठी के लिए हमारी स्वीकृति चाहते हैं हमें उन्हे सन्तुष्ठ करना ही चाहिए। यह अनैतिक कर्म नही है अपितु यह हमारा नैतिक दायित्व है। ज्योतिषफलित का उद्देश्य क्या है ? अन्ततः हमें अपने यजमान को उसके अनागत भविष्य को संभालने, सवांरने या उसके त्रिविध कर्मो से संभावित हुए शुभ और अशुभ फलों को सहन कर पाने के लिए मानसिक रुप से तैयार करना ही तो है।विश्वास कीजिए वह यजमान इस समय फंसा हुआ है। उसके पास दूसरा मार्ग नही है, और इस सत्य को वह यजमान जानता भी है। वह केवल आपसे आत्मसंबल चाहता है।....आपत्ति काले मर्यादा नास्ति। इस वेदवाक्य (महाभारत) का स्मरण कर उसकी सहायता करें।जहां तक "नैतिक धर्म" के पालन का प्रश्न है वह तो हमें अपने प्राणों की परवाह न करके भी करना चाहिए। लेकिन किसी अन्य पर यदि संकट उपस्थित हो तो उस समय प्रचलित आदर्श और मर्यादाओं से समझौता किया जा सकता है। यह "आपत्ति धर्म" कहलाता है।अब इस स्थिति से निबटने के लिए हम वर की पत्रिका को:
1-कन्या की चंद्रराशि से, 2-कन्या के प्रसिद्ध नाम राशि से, 3-कन्या का नाम बदल कर,
4-खड़शास्त्रियो या स्वयंभू: गोल्डमैडलिस्टो द्वारा स्वरचित मंगल, राहू, नीचभंग आदि की काट के योगों का उपयोग से मेलापक कर सकते हैं।अब यजमान की आंखों में भी चमक आ जाती है और फिर वह अपनी जेब में भी हाथ डाल...।
क्रमसः विवाह मेलापक: एक अध्ययन:- भाग-3.
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अब बात... व्यवसाय की... ! .....समर्पण की ! मेलापक में "मंगलीक योग" !जातक का आयुष्य परीक्षण कर लेने के पश्चात यह सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा।ज्योतिषफलित का यह "स्थापित सत्य" है कि किसी मंगलीक जातक का मेलापक यदि ऐसे जातक से संपन्न किया जाय जो मंगलीक न हो तो विवाह 100% अनिष्टकारी सिध्द होता है।
अब मंगलीक कौन?
1-उत्तर भारतीय परंपरा में जातक की जन्मकुंडली में यदि मंगलग्रह स्वयं लग्नभाव में हों या लग्नभाव से 4, 7, 8 या 12वें भाव में स्थापित है तो जातक मंगलीक है। (भाव सं 02 नही लेते )
2-जन्मकुण्डली के सौम्य अथवा कामसुख से संबंधित भाव जैसे स्वयं लग्नभाव में या लग्नभाव से 4, 7, 8 या 12वें भाव में मंगल के अतिरिक्त अन्य कोई दो क्रूरग्रह (सूर्य, शनि, राहू या केतु) की युति हो। [चंद्र और शुक्र से केवल बस्ता भारी। ]यह "स्थापित सत्य" है कि मंगल यदि कुंडली के लग्नभाव में हो तो जातक स्वच्छंद प्रवृत्ति वाला और क्रोधी स्वभाव का होता है।
-इसी प्रकार द्वितीय में क्रूर ग्रह हो तो धनहीनता और कौटुम्बिक कलह, -चतुर्थ में यह स्थिति हो तो दैनिक रोजगार में बाधा, -कलत्रभाव से अग्नि-दुर्घटना, -अष्टमभाव से आयु कष्ट एवं -द्वादशभाव में क्रूर होने से अपव्यय,भ्रष्टशैया सुख से कष्ट पाता है।अत: सन्तोषजनक मेलापक के लिए यहअनिवार्य है कि:
1-वर एवं कन्या दोनों ही मंगलीक न हों या
2-वर एवं कन्या दोनों ही मंगलीक हो।
मेलापक में ज्योतिषी दो शब्दों का उपयोग करते हैं :- ( 1 ) -आंशिक (सौम्य) मंगलीक: -वह कुंडली जो मंगलीक तो हैं, लेकिन किसी अन्य योग के कारण उसका मंगलीक दोष समाप्त हो रहा है।( 2 ) -क्रूर मंगलीय :
1-कुंडली मंगलीक है और दोष निवारण के लिए कुंडली में कोई स्थापित योग उपलब्ध नही है।आंशिक मंगलीक जातक का मेलापक हम इसी प्रकार के आंशिक (सौम्य) मंगलीक अथवा गैर मंगलीक कुंडली से कर सकते हैं किन्तु क्रूर मंगलीक जातक का मेलापक हमें अनिवार्य रुप से क्रूर मंगलीक कुंडली से ही करना चाहिए।जहां समस्या है तो वही उसके समाधान के लिए फलित ज्योतिष में सदा मार्गदर्शन होता है।
विद्वान एवं सुधिजन मित्रों के सम्मुख मंगलीक दोष निवारण के योग लिखने की आवश्यकता नही।किन्तु कुछ तथ्यों पर चर्चा कर लेते हैं।
1-वर/कन्या की कुंडली में मंगल या दो क्रूर ग्रहों की युति जिस भाव (1,4,7,8 या12) में हो तो दूसरी कन्या/वर की कुंडली में उसी भाव विशेष में यह योग हो तो मंगलीय दोष का समाधान नहीं होता।2-यदि 1,4,7,8 या 12 भाव में मंगल के साथ राहू या शनि की युति है तो मंगलीय दोष का समाधान नहीं होता। राहू या शनि मंगल के दोष का निवारण नही कर सकते।मंगलग्रह को राहु,बुध और शनि से अधिक नैसर्गिक बलवान माना गया है।फलितज्योतिष शास्त्र में;1-राह का दोष बुध के प्रभाव से नाश हो जाता है।
2-राहु+बुध दोनों के दोषों नाश शनि के प्रभाव से हो जाता है।
3-राहु+बुध+शनि के दोषों का नाश मंगल के प्रभाव से हो जाता है।
4-राहु+बुध+शनि+मंगल के दोषों का नाश बलवान शुक्र कर देते हैं।
5-राहु+बुध+शनि+मंगल+शुक्र के दोष नाश बलवान बृहस्पति कर देते हैं।
6-राहु+बुध+शनि+मंगल+शुक्र+वृहस्पति के दोष को बलवान चन्द्रमा नष्ट कर देते हैं,
7-उक्त सभी ग्रहों के दोषों का नाश सूर्य कर देते हैं। विशेषकर उत्तरायण के सूर्य कर देते हैं।{उत्तरायण यानि सूर्य जब मकर,कुम्भ, मीन, मेष, वृष और मिथुन राशि पर गोचर कर रहे हैं} ।विशेष:- यह दोषहरण इन ग्रहों की पूर्णदृष्टि या इन ग्रहों के साथ युति ! दोनों दशाओं में संभव है। किन्तु प्रतिबंध यह है कि दोषहारक ग्रह को षड़बल में इन ग्रहों से बलवान होना चाहिए।
"राहूदोषं बुधो हन्यात् उभयोस्तु शनैश्चर। त्रयाणां भूमिजो हन्ति चतुर्णा दानवार्चित:।।
पंचानां देवमंत्रि च षण्णां दोषस्तु चंन्द्रमा। सप्तदोषं रविर्हन्यात् विशेषात् उत्तरायणे।।"
अगामी क्रम में अष्टकूट। क्रमस: विवाह मेलापक: एक अध्ययन:- भाग-4.
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किसी युवक और युवती के परस्पर विवाह करने से पूर्व भारतीय ज्योतिष जगत में मेलापक के लिए 1-आयुष्य, 2-मंगलीय दोष के उपरान्त " वशिष्ठ संहिता" में 18-कूटों (Point) का वर्णन हैं।
लेकिन आचार्य नारायण दैवज्ञ ने अपने ग्रंथ "मुहूर्त मार्तण्ड" में एवं आचार्य राम दैवज्ञ ने अपने ग्रंथ "मुहूर्त चिन्तामणि" में केवल आठ कूट (परीक्षा) को महत्व दिया है। उसके पश्चात आचार्य केशवार्क ने विवाह संबंधित अपने ग्रंथ " विवाह वृन्दावन " में "बृहज्ज्योतिष सार" एवं एवं "ज्योतिर्निबंध" आदि अन्य प्रसिद्ध ग्रंथो के मत का उल्लेख कर "अष्टकूट" को ही पर्याप्त माना।
दक्षिण भारत में विवाह मेलापक के लिए अष्टकूट के स्थान पर दसकूट विधि का उपयोग किया जाता है जिसे "पोरथम" कहते हैं। आज इस विषय पर हम उत्तर भारतीय परंपरा पर अध्ययन करेंगे। लेकिन अष्टकूटों के नाम, गुण-धर्म, उनको प्राप्त करने की विधि और (सारणी) आदि की चर्चा के बिना। क्योंकि मेरा मानना है कि इस ग्रुप के सदस्य मेरे मित्रों के लिए और विशेषकर वे जो ज्योतिष-व्यवसाय में हैं, उनके लिए यह "मेलापक" तो दैनिक कार्य है।अष्टकूट जांच विधि में एक मुख्य बात यह है कि यदि एक कूट में दोष है किन्तु उससे आगामी (दूसरा) कूट शुध्द है तो वह अपने पहले कूट के दोष समाप्त (लगभग) कर देता है। यह क्रम सातवे कूट " भृकुट" तक चलता है। लेकिन पिछले कूट का दोष कितना कम हुआ है कंप्यूटर जनित मेलापक में इसका ज्ञान (अभी तक तो) नही होता। अत: कई बार अच्छे मेलापक वाली जोड़ी को नकारा भी जा सकता है। हम अष्टकूटों के दोषों को दूर करने वाले विभिन्न सूत्रों के आधार पर बनी एक ऐसी विधि को आपके सम्मुख रख रहें हैं जिसको यदि एक बार समझ लिया जाय तो फिर किसी सारणी की आवश्यकता शायद न बने।
जी हां ! यह वास्तविकता है।यह विधि मेलापक के समय "अष्टकूटों" में पाए जाने दोषों को समाप्त (शोधन ) मानने के विभिन्न सूत्रों पर ही उनके "स्वभाविक और सरल रुप" में आधारित हैं।आश्चर्यजनक है! किन्तु सत्य है कि, ज्योतिषफलित के "अष्टकूट मेलापक" में भी " ग्रह " दलगत राजनीति से ही कार्य करते हैं।"स्वभाविक मित्रता" के आधार पर ग्रहों के दो दल हैं:-
(अ)-सूर्य, चंद्र, मंगल और बृहस्पति। (ब)-बुध,शुक्र और शनि।
मेलापक की जांच करते समय सबसे पहले हम यह देख लें कि युवक और युवती की चन्द्रराशि, उसका नक्षत्र और नक्षत्र का चरण (पद) क्या है?इस प्रकार हमें 6-स्थिति मिलती हैं।
1- युवक और युवती ! दोनों के चंद्र एक ही राशि में (अलग-अलग नक्षत्र पदो में) स्थिति है। ...या
2- दोनों के चंद्र एक ही ग्रह की दो विभिन्न राशियों में है। ( जैसे शुक्र की वृषभ और तुला)। ...या
3- दोनों के चंद्र एक ही दल के दो विभिन्न ग्रहों की राशियों में हैं (जैसे सूर्य, चंद्र, मंगल और बृहस्पति में ही हैं )।
4-दोनों के चंद्र आस-पास की ऐसी दो राशियों में है जो स्वाभाविक मित्र नही है किन्तु दोनों के चंद्रमा एक ही नक्षत्र में हैं।
5- दोनों के चंद्र एक ही राशि में और एक ही नक्षत्र में स्थिति है।
6- दोनों के चंद्र अलग-अलग दल के ग्रहों की राशियों में हैं (जैसे एक का शुक्र की राशि वृषभ/तुला पर और दूसरे का बृहस्पति की राशि धनु/मीन पर)।
अष्टकूट में गुण प्राप्ति:-
1- यदि युवक और युवती ! दोनों के चंद्र एक ही राशि में (अलग-अलग नक्षत्र पदो में) स्थिति है तो इस स्थिति में अष्टकूट के कुल 36 गुणों में से 34 -28* (संशोधित) तक के गुण मिल जाते है। मेलापक अति उत्तम मानना चहिए।
2- यदि दोनों के चंद्र एक ही ग्रह की दो विभिन्न राशियों ( जैसे शुक्र की वृषभ और तुला) में हैं तो इस स्थिति में 33-24* (संशोधित) तक के गुण मिल जाते है। मेलापक उत्तम मानना चहिए।
3- यदि दोनों के चंद्र एक ही दल के दो विभिन्न ग्रहों की राशियों में हैं ( जैसे सूर्य, चंद्र, मंगल और बृहस्पति में ही हैं ) तो इस स्थिति में 35-32 (संशोधित) तक के गुण मिल जाते है। मेलापक अति उत्तम मानना चहिए।
4-यदि दोनों के चंद्र आस-पास की ऐसी दो राशियों में है जो स्वाभाविक मित्र नही है किन्तु दोनों के चंद्रमा एक ही नक्षत्र में हैं तो इस स्थिति में 35-32 तक के (संशोधित) गुण मिल जाते है। यह मेलापक अति उत्तम मानना चहिए।
जैसे:4.1-मेष-वृष राशियों में मेलापक "कृतिका" के कारण,
4.2-मिथुन-कर्क राशियों में मेलापक "पुनर्वसु" के कारण,
4.3-सिंह -कन्या राशियों में मेलापक "उत्तराफाल्गुनी" के कारण,
4.4-तुला-वृश्चिक राशियों में मेलापक " विशाखा" के कारण,
4.5-धनु-मकर राशियों में मेलापक "उत्तराषाढ़ा" के कारण,
4.6-कुंभ-मीन राशियों में मेलापक "पूर्वाभाद्र"के कारण। अन्य स्थितियों में नही।
5- यदि दोनों के चंद्र एक ही राशि में और एक ही नक्षत्र में है तो दोनों की एक नाड़ी होने के कारण "नाड़ीदोष" बन जाता है।
नाड़ी दोष के संबंध में "नारद संहिता" ने कहा है:
एक नाड़ी विवाहश्च गुणे: सर्वें: समन्वित:। वर्जनीभ: प्रयत्नेन दंपत्योर्निधनं।।
अर्थात:- वर-कन्या की नाड़ी एक ही हो तो विवाह वर्जनीय है, भले ही उसमें सारे गुण हों। अन्यथा पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की उत्पन्न होता है।6- यदि दोनों के चंद्र अलग-अलग दल के ग्रहों की राशियों में है जो परस्पर शत्रु हैं। ( जैसे एक का शुक्र की राशि वृषभ/तुला पर और दूसरे का बृहस्पति की राशि धनु/मीन पर) तो इस स्थिति में अष्टकूट के कुल 36 गुणों में से मात्र 21-08 गुण मिल पाते है।स्थिति क्रम संख्या 5 और 6 में यदि युवक और युवती! दोनों के राशिपति एक ही ग्रह के "नवांश" में हों ( एक ही राशि या दोनों से एक ही ग्रह हो ) तो समस्त दोषों का शोधन हो जाता है। इस स्थिति में 35-32 तक के (संशोधित) गुण मिल जाते है। अन्यथा यह मेलापक अस्वीकार्य है। क्रमस: विवाह मेलापक: एक अध्ययन:- भाग-5.
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अनेंक अवसर ऐसे आते है कि जब हम सुनते हैं कि, पति-पत्नि में स्थाई वैमनस्यता है। दुराव है। तलाक की नौबत आ गई है, या किसी एक ने सदा के लिए साथ छोड़ दिया है, जबकि हमने तो पंडितों से कुंडली मिलान भी कराया था। फिर ऐसा क्यों हुआ?
आधुनिक विद्वान इस सबका मुख्य कारण मेलापक में केवल चंद्रराशि और चंद्र नक्षत्र को ही महत्व देना मानते है।
वर्तमान विद्वान पुरजोर कहते हैं कि कि जब संपूर्ण फलितज्योतिष अब " लग्न आधारित" है तो मेलापक " लग्न " के अनुसार क्यो नही?
आधुनिक विद्वान अपना दूसरा तर्क देते हैं कि जब आठ में से सात कूट राशिमित्रता के आधार पर ही है ( स्मरण रहें कि ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री और लग्नानुसार ग्रहों की मैत्री समान है) तो अन्तिम कूट (नाड़ी) के परीक्षण के लिए चंद्र के नक्षत्र के स्थान पर लग्न का नक्षत्र क्यों नही?
इस सबके उत्तर में पुरातन विचारको के पास एक ही वेदवाक्य है, "चंद्रमा मनसो जात: । " जो अकाट्य है।
अत: परिपाटी के अनुसार मेलापक में युवक और युवती दोनों का 1-आयुष्य, 2-भाव संख्या 1, 4, 7, 8 और 12 में मंगलीय अथवा क्रूरतायोग, एवं 3- अष्टकूट आदि तीनों परीक्षण में सन्तुष्ठ हो जाने के पश्चात भी यदि निम्न " महादोष " किसी भी जातक / जातिका की कुंडली में मिल जाए तो विवाह संबंध स्पष्ट रुप से अस्वीकार कर दें।
1⃣ - युवक और युवती दोनों का जन्म कर्क लग्न में हो। [ दोनों को स्थाई बीमारी ]
2⃣ - युवक की जन्मकुंडली के अष्टमेष युवती का लग्नेश न हो। [ दुर्घटना / जीवनहानि ]
3⃣ - युवती की जन्मकुंडली के अष्टमेष युवक का लग्नेश न हो। [ दुर्घटना / जीवनहानि ]
4⃣ - युवक की जन्मकुंडली का अष्टमेष जिस राशि पर आसीन हो वह राशि युवती की लग्नराशि न हो। --दुर्घटना। [ दुर्घटना / जीवनहानि ]
5⃣ - युवती की जन्मकुंडली के अष्टमेष जिस राशि पर आसीन हो वह राशि युवक की लग्नराशि न हो। [ दुर्घटना \ जीवनहानि]
6⃣ - युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली के छठे और बारहवे भाव में राहू या केतु हो। [प्रचण्ड वैमनस्यता -स्थाई क्लेश ]
7⃣ - युवक या युवती की जन्मकुंडली के लग्नभाव, दूसरेभाव और तीसरेभाव {तीनों } में सूर्य, शनि, मंगल राहु या केतु नामक ग्रह न हो। [ प्रचण्ड वैमनस्यता ]
8⃣ -युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली में सूर्य यदि एकराशि में हों तो उनके अंशमान में 10अंश से अधिक हो। [ प्रचण्ड वैमनस्यता ]
9⃣ -युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली में शुक्र यदि एकराशि में हों तो उनके अंशमान में 10अंश से अधिक हो। [ प्रचण्ड वैमनस्यता ]
🔟 -युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली में उनके सप्तमेश परस्पर अधिशत्रु (पंचधामैत्रि ) न हों। [ वैमनस्यता ]
1⃣1⃣ - युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली में उनके सप्तमेश त्रिक ( 6,8,12) भावों में न हों। [ सदा क्रोधी और दुखी ]
1⃣2⃣ - युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली में उनके भृगु सप्तम भाव में न हों। [ असीमित वासना ]
1⃣3⃣ - युवक और युवती दोनों की जन्मकुंडली में उनके सुख या जाया भावों में दो-दो पापी ग्रह न हो। [ सदा क्रोधी और दुखी ]
1⃣4⃣ - कन्या का चंद्रमा जिस राशि में हो उससे से दूसरी से छठी राशि तक वर की राशि न हो। [ वैमनस्यता ]
1⃣5⃣ - युवक और युवती दोनों की यदि एक ही राशि हो तो उनके जन्मनक्षत्र के पद (भाग या पद )एक न हो। [ पंगुसन्तान]
1⃣6⃣ - युवक और युवती! दोनों में से किसी एक का भी सुखभाव का स्वामि और धर्मभाव का स्वामि दोनों युति बनाकर यदि छठे भाव में हो। [अशुध्द वंश से संबंध ]
1⃣7⃣ - युवक या युवती! दोनों में से किसी एक का भी छठे भाव या सातवे भाव में शनि अपनी नीच राशि में हो। [अति चरित्र हीनता, निकृष्ठ आजीविका ]
1⃣8⃣ - युवक या युवती! दोनों में से किसी एक के भी सातवे भाव में शनि, बुध, शुक्र की राशि में अपनी राशि में न होकर शनि, बुध, शुक्र में से कोई दो ग्रह हों। [प्रजनन में अयोग्यता ]
1⃣9⃣ - युवक या युवती! दोनों में से किसी एक के भी तीनों लग्न (लग्नभाव, चंद्रभाव और सूर्यभाव) पाप भाव में हों या पाप प्रभाव में हों। [ असफल जीवन ]
2⃣0⃣- युवती की विसम राशि (अर्थात 3, 5, 7, 9 या 11) है तो युवक की राशि ऊससे छठी या आठवी हो तो । [अधम योग, अपवित्रता ]
🎇 -: विशेष :- 🎇
1- यदि युवक की राशि सम ( 2, 4, 6, 8, 10, 12) है और उससे आठवी राशि यदि युवती की हो तो वैवाहिक जीवन 🕎 बहुत मंगलमय 🕎 होता है।।
इतिशुभम्।












