यह शब्द भी है और सभ्यता भी है। यह व्यक्ति के भूत, वर्तमान और भविष्य का स्पष्ट आईना है। कोई भी व्यक्ति इन से अपने जीवन में गुजरता है, अनुभव करता है और इसी के आधार पर अपना मौन परिचय वो दुनिया को देता है। देखना हमारी दृष्टि से संबंध रखता हैं लेकिन नियंत्रण हमारे मस्तिष्क से होता हैं, कितनी विस्तृत नजरों से हम देख पाते हैं यह मस्तिष्क तय करता हैं और हमारा देखना यह भी तय करता हैं कि आने वाले समय में हम किस प्रकार से देखें जायेंगे। समय और हालात से बढ़कर हमारी ही दृष्टि तय करती हैं कि हम क्या होने वाले है। देखने के बाद सबसे पहली प्रतिक्रिया जो मस्तिष्क में होती हैं वो होती हैं उसे समझने की। आपने हिंसा देखी तो मन में क्रोध उत्पन्न हुआ यह आपकी समझ का परिणाम हैं, आपने हिंसा देखी और मन में करुणा उत्पन्न हुई यह भी आपकी समझ का ही परिणाम हैं। हमें जरूरत हैं अपनी समझ को उस स्तर पर ले जाने कि जहां से सम्यक दृष्टि से हम दुनिया को देख सकें। दृष्टि की उपयोगिता बिना समझ के व्यर्थ है। किसी सुंदर स्त्री को देखकर आपने जाना कि देखने का सुख भी अद्भुत हैं लेकिन समझ ने आपको उस सुंदरता का सम्मान करना सिखाया। जब से सभ्यता का विकास होना प्रारंभ हुआ तब से ही व्यक्ति की देखने के प्रति समझ विकसित हो रही है। आकाश में उड़ते पंछी को देखकर स्वयं उड़ने की कल्पना देखने और समझने का ही परिणाम है। किसी के दुःख से स्वयं दुखी हो जाना भी हमारी दृष्टि और समझ के फलस्वरूप ही होता है। हम क्या देख रहे हैं उससे कही महत्वपूर्ण हैं कि हम क्या समझ रहे है। दृष्टि ईश्वर की देन है लेकिन समझ हमारे मानसिक श्रम का परिणाम है।