श्री कृष्ण माखन चुराने में ही नहीं, मार्शल आर्ट में भी उस्ताद थे
श्री कृष्ण माखन चुराने में ही नहीं, मार्शल आर्ट में भी उस्ताद थे
आज दुनियांभर में मार्शलआर्ट खासा लोकप्रीय हो चुका है। दुनियांभर के लोग इसे आत्मरक्षा के लिए सीखते हैं। वैसे इसके उत्पत्ति को लेकर भी दुनियांभर में काफी मतभेद हैं, लोगों का मानना है कि मार्शल आर्ट की उत्पत्ति चीन में हुई थी। वहीं भारतीय पौराणिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि मार्शल आर्ट की उत्पत्ति भारत में ही भगवान कृष्ण ने की थी। यानी मार्शल आर्ट हमारी भारतीय परंपरा है।
श्री कृष्ण और प्रशुराम को लेकर है मतभेद
मार्शल आर्ट की उत्पत्ति को लेकर श्री कृष्ण और प्रशुराम को लेकर लोगों में मतभेद है
धर्म ग्रंथो में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि मार्शलआर्ट का प्रयोग सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया था। कई पौराणिक ग्रंथों में इस बात की जानकारी भी मिलती है, लेकिन वहीं कई और पौराणिक ग्रंथ में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि मार्शल आर्ट की शुरुआत कलरीपायट्टु नाम से भगवान प्रशुराम ने किया था।
दुनियां का सबसे पुराना विधा है कलरीपायट्टु
कलरीपायट्टु दुनियां की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट विधा है
बता दें कि कलरीपायट्टु वह शस्त्र विद्या है जिसे आज के युग में मार्शल आर्ट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कलरीपायट्टु दुनिया का सबसे पुराना मार्शल आर्ट है और कलरीपायट्टु को सभी तरह के मार्शल आर्ट का जनक भी कहा जाता है।
इसी विधा की मदद से श्री कृष्ण ने कई दैत्यों का मार गिराया
कृष्ण और चाणूर के बीच कुश्ति
पौराणिक ग्रंथों में उल्लिखित है कि इस विद्या के माध्यम से ही श्रीकृष्ण ने चाणूर और मुष्टिक जैसे दैत्य मल्लों का वध किया था। उस समय भगवान कृष्ण की उम्र 16 वर्ष की थी। इसकी मदद से भगवन कृष्ण ने मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था।
ब्रज के जंगलो में हुई थी इसकी उत्पत्ति
कहा जाता है कि ब्रज के जंगलो में कृषण ने मार्शल आर्ट की शुरुआत की थी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। कालारिपयट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। हालांकि इसके बाद इस मार्शलआर्ट के इस विद्या को अगस्त्य मुनि ने पूरी दुनियां तक प्रचारत कर पहुंचाया था।
नारायणी सेना के शक्तियों का राज भी यही है
अर्जुन और दुर्योधन कृष्ण से मदद मागने उनके पास पहुंचे
इस विद्या के कारण ही ‘नारायणी सेना’ उस समय की सबसे बलवान और प्रहारी सेना के रुप में मानी जाती थी। बता दें कि नारायणी सेना श्री कृष्ण की सेना थी। द्वापरयुग में जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों श्रीकृष्ण से सहायता मांगने गए थें, तो श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को पहला अवसर प्रदान किया। श्रीकृष्ण ने कहा कि वह उसमें और उसकी सेना नारायणी सेना में किसी को एक चुन लें। दुर्योधन ने नारायणी सेना का चुनाव किया और अर्जुन ने श्रीकृष्ण का चुनाव किया था। इसे चतुरंगिनी सेना भी कहते हैं।
श्री कृष्ण ने रखी थी कलरीपायट्टु की नींव
केरल मे कलरिपायट्टु आज भी सिखाई जाती है
ग्रंथों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी थी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध देशों में पहुंची। वर्तमान में कलरीपायट्टु विद्या विद्या केरल और कर्नाटक में प्रचलित है।










