सत्य की मुट्ठी
कहते हैं मुट्ठी में रेत हो तो वह फ़िसल जाती है समय को कोई पकड़ नहीं सकता मेरी मुट्ठी से भी रेत निकल गई लेकिन रिक्त नहीं हैं मेरे हाथ, पास मेरे हैं अनुभव कई
ये सच है कि वक्त रोका नही जा सकता पर मैं उसका ग़ुलाम नहीं बाँध नही सकता वह मुझे करता हूँ हर बार जो है सही
सत्य की मुट्ठी से जब रेत फ़िसलती है तो रेगिस्तानों से नदियाँ निकलती है सत्य के रास्ते समुंदरों को रेगिस्तान और रेगिस्तानों को समुन्दर बनते देखा है
~ राहुल सिंह











