नीले पानी के नीचे
समंदर उस रात बिल्कुल शांत था।इतना शांत कि उसकी खामोशी सुनाई दे रही थी।राघव अपनी लकड़ी की नाव में बैठा दूर तक निकल आया था।उसके पास जाल था, एक पुराना लालटेन, और एक छोटा सा बैग।लेकिन आज वो मछली पकड़ने नहीं आया था।आज वो बस भागकर आया था…खुद से।दिनभर लोगों के बीच रहने के बाद भी उसके अंदर एक खालीपन था, जो हर रात और गहरा हो जाता था।घर में दीवारें उसे घूरती थीं… और नींद आते-आते कोई पुरानी याद उसे जगा देती थी।समंदर उसे हमेशा सुकून देता था।जैसे उसकी हर बात सुनता हो… बिना जवाब दिए।
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