श्रीकांत
मंच पर खड़े होकर कुछ बेवकूफ़ चीख़ रहे हैं कवि से आशा करता है सारा देश. मूर्खों! देश को खो कर ही मैंने प्राप्त की थी यह कविता जो किसी की भी हो सकती है जिस के जीवन में वह वक़्त आ गया हो जब कुछ भी नहीं हो उसके पास खोने को जो न उम्मीद करता हो न अपने से छल जो न करता हो प्रश्न न ढूँढ़ता हो हल हल ढूँढ़ने का काम कवियों ने ऊबकर सौंप दिया है गणितज्ञ पर और उसने राजनीतिज्ञ पर - श्रीकांत
















