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ताजमहल को मथुरा के सेठ ने दो बार नीलामी में खरीदा था
ताजमहल की नीलामी दो बार की हुई थी पहली बार में इसे डेढ़ लाख में और दूसरी बार सात लाख में इसे बेचा गया। शर्त ये थी कि ताजमहल के पत्थरों पर खूबसूरत इनले वर्क और पत्थरों को तोड़कर अंग्रेजों को देना था। विश्वविरासत ताजमहल को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था। 1831 में अंग्रेजों ने ताजमहल को दो बार नीलाम कर दिया था। मथुरा के सेठ लख्मीचंद ने सबसे ज्यादा बोली लगाई थी। सौभाग्य की बात थी जो ताजमहल बच गया। यहां तक की कहानी तो सबको पता है। आखिर इसका क्या कारण था कि नीलाम होने के बाद भी ताजमहल में कोई अंदर नही जा सका? शाहजहां का ताजमहल सेठ लख्मीचंद का ताजमहल होने से कैसे बचा? जानने के लिए ये खबर पढ़िए। अंग्रेजों के लिए क्लब हो गया था ताजमहल पहले आपको पुरानी कहानी बताते हैं। मुगलकाल की कला का यह एक सबसे नायाब नमूना ताजमहल है। ताजमहल को भारत में मुस्लिम कला का हीरा कहा जाता है। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इसका प्रयोग पार्टी पूल की तरह किया था। ताजमहल में शराब का सेवन भी किया जाता था। मस्जिद के सामने वाले हिस्से को किराये पर दे दिया गया था। इस तरह ताजमहल की पवित्रता भंग की जा रही थी। अंग्रेजों के लिए यह मुमताज की कब्र न होकर एक क्लब हो गया था। खूबसूरत पत्थरों को लंदन ले जाना था बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम हेनरी कैवेन्डिश, जिनको लॉर्ड बेंटिंक के नाम से जाना जाता है, की नजर ताजमहल पर गई। वे बाद में भारत के गर्वनर जनरल भी रहे। फिर बेंटिंक ने सोचा कि ताजमहल के खूबसूरत पत्थरों को लंदन ले जाया जाए और नीलामी करके क्वीन विक्टोरिया का खजाना भरा जाए।फिर उन्होंने आगरा औऱ दिल्ली के स्मारकों को तोडकर कर गिराने का ऐलान कर दिया। उसने कहा कि कुछ हिस्सा भारतीय अमीरों को बेचा दिया जाएगा और बाकी लंदन में जायेगा।
1.5 लाख रुपये में बेचा ताजमहल अंततः ब्रिटिश सरकार ने मथुरा के सेठ लख्मीचंद को ताजमहल डेढ़ लाख रुपये में बेच दिया। सेठ लख्मीचंद ताजमहल पर कब्जा लेने पहुंचे। जब ताजमहल के आसपास रहने वाले ताजगंज के लोगों को इसके बारे में पता चला तो विरोध शुरू हो गया। हिन्दू और मुसलमान एकजुट हो गए। उनका कहना था कि शाहजहां ने ताजमहल को बनाने वाले श्रमिकों के लिए कई कटरे बसाए थे। और वे उन्हीं के वारिस हैं। हमारे रहते कोई ताजमहल के पत्थरों को यह से नहीं ले जा सकता है। लोगों की भावनाओं का आदर करते हुए सेठ लख्मीचंद ने पांव पीछे खींच लिए। ताजमहल को खरीदने का विचार त्याग दिया। और फिर से ताजमहल को सात लाख रुपये में खरीदा इस घटना से लॉर्ड बेंटिंक ताव खा गया। कुछ महीने बाद उसने कोलकाता के एक अंग्रेजी दैनिक अखबार में ताजमहल को बेचने का एक विज्ञापन छपवाया। यह बात 26 जुलाई, 1931 की है। नीलामी पूरे दो दिन तक चली। पहले दिन मथुरा के सेठ और राजस्थान के शाही परिवार के सदस्यों ने नीलामी में भाग लिया। दूसरे दिन अंग्रेजों को मौका मिला। और यह नीलामी मथुरा के सेठ लख्मीचंद के नाम रही। उन्होंने सात लाख रुपये में ताजमहल को फिर खरीद लिया
क्यों बच गया ताजमहल फिर से वही समस्या उनके सामने थी। ताजमहल के पत्थरों को जहाज से लंदन ले जाने की कीमत बहुत ज्यादा हो रही थी और वहां के स्थानीय लोग इसका विरोध कर ही रहे थे। कहा जाता है कि ब्रिटिश सेना के एक अज्ञात सिपाही ने ब्रिटिश संसद के सदस्य को बेंटिंक की पूरा कहानी बता दी। यह मामला ब्रिटिश संसद में गूंजा। इसके बाद ताजमहल को गिराने का विचार बेंटिंक को छोड़ना पड़ा। ब्रज के लिए थी गौरव की बात सेठ लख्मीचंद जैन के प्रपौत्र सेठ विजय कुमार जैन ने यह पूरी कथा ‘मथुरा सेठ’ पुस्तक में लिखी हुई है। उनका कहना है कि हमारा इरादा ताजमहल पर कब्जे का नहीं है। यह ब्रज के लिए एक बहुत गौरव की बात है कि 1831में मथुरा के एक सेठ ने ताजमहल को दो बार खरीद लिया था। इतिहासवेत्ता प्रो. रामनाथ ने अपनी पुस्तक ताजमहल, ब्रिटिश लेखक HG केन्स ने आगरा एंड नेबरहुड पुस्तक में ताजमहल की नीलामी के बारे में जानकारी दी है।