जब बॉस टारगेट बढ़ाते गए… और स्टाफ एक-एक कर जाता गया
कॉर्पोरेट और सेल्स लाइन की एक सच्चाई है —
यहाँ मेहनत हर कोई करता है, पर उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं।
हर महीने नया टारगेट, हर दिन नई रिपोर्ट, और हर मीटिंग में वही बात —
“इस बार और ज़्यादा चाहिए।”
लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि
“जितना दे रहे हो, क्या वही इंसानी हद है?”
1. टारगेट बढ़ाना आसान है, ज़मीन पर जाकर हासिल करना मुश्किल
चेंबर में बैठकर नंबर बढ़ाना आसान लगता है।
पर वह नंबर हासिल करने के लिए
धूप, बारिश, ट्रैफिक, ग्राहक का attitude, market competition —
सबसे लड़ना पड़ता है।
Staff यही कहता है:
“Sir, aap har month target badhate ja rahe ho…
hum sales wale log hain, jaadugar nahi.”
2. सेल्स वाला रोता नहीं — लेकिन टूटता जरूर है
Sales people कभी हार नहीं मानते।
पर जब टारगेट उनकी मेहनत, समय और सेहत से बड़ा हो जाए,
तब रिज़ाइन मजबूरी नहीं…
स्वाभिमान बन जाता है।
3. जब उम्मीदें इंसानियत से बड़ी हो जाएँ
हर टीम में वो लोग होते हैं
जो सुबह से रात तक काम करते हैं,
customers को convince करते हैं,
company ke liye हर दिन लड़ते हैं।
पर जब रोज़ यही सुनने को मिले —
“Ye kaafi nahi hai… target badh gaya hai”
तब दिल से एक ही आवाज आती है:
“Sir, hum sale karne wale hain, koi jugaar nahi.”
(मतलब— हम मेहनत कर सकते हैं, चमत्कार नहीं।)
4. हर resignation एक warning होती है, बदले की जरूरत नहीं
जब कोई कर्मचारी छोड़कर जाता है,
तो वो किसी कंपनी की हार नहीं होता—
वो leadership की गलती का इशारा होता है।
टारगेट बढ़ाने वाले leaders को समझना चाहिए:
ज़मीन पर उतने ही नंबर आते हैं जितनी market में गुंजाइश हो।
5. अच्छी टीम बनाना मुश्किल, टूटना बहुत आसान
कंपनियाँ पैसे से चलती हैं,
पर सेल्स से बढ़ती हैं।
और सेल्स लोग तभी देते हैं जब उन्हें respect, real goals और support मिले।
वरना talent हाथ से फिसल जाता है।
निष्कर्ष:
काम सब कर सकते हैं,
पर अनंत टारगेट सिर्फ reports में अच्छे लगते हैं…
ज़िंदगी में नहीं।
Sales staff मेहनत करता है,
पर वो जादूगर नहीं — इंसान है।






















