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@ashwanitells-blog
हिम पर्वत की कलम से ..
औषधियौं को भरे ह्रदय में, मैं शीतलता का द्योतक हूँ, परिचायक हूँ स्थिरता का और सकल स्रोत अविरल जल का, सब नदियों को जीवन देता हूँ, उनका उद्गम मेरी ही एक धारा है।
उस ओर समुद्र है भरा विहंगम अनभिज्ञ मेरे जल जीवन से, मेरी नदियों की औषधियों से, शीतलता से निश्छलता से, मीठा भेजूं जल सदा उसी को, पर हो जाना उसको खारा है।
यही नियति है मेरे जल की, मुझ पर जमे धवल हिमखंडों की, भले धवल हो, उज्जवल हो, निर्मल, निश्छल, औषधीय पावन हो, सागर की श्रष्टि में वह अर्थहीन हैं, साधारण है और अँधियारा है।..
जज़्बा
यूँ पलट कर देखा उस रास्ते को फिर, जिस पर चल आए हैं कोसों दूर हम, पत्तों के अवशेष और बस, क़दमों के कुछ निशान बाकी हैं।
सोचा कि चलना तो बहुत आगे है अभी, जितनी दूर चल आए शायद उससे भी अधिक, आँखों के श्याम-पट पर लिखे, अधूरे कुछ अरमान बाकी हैं।
गलतियों से सीखना गुरुओं ने सिखाया था, तो परिक्षण कर लिया अपने ही पगचिन्हों का, सीधे सरल वनमार्ग पर तिरछे निशानों की, अनकही कुछ दास्तान बाकी है।
लड़खड़ाया क्यूँ वहाँ मैं चल पाया ना सीधा,
पत्तियों के अवशेष फिर कारण बता बैठे,
आँधियों की नीयत से लड़कर चल निकलने का,
वही जज़्बा अभी बाक़ी है ।
#watermark
When in a relationship, it is not important what we did in past as individuals; what holds importance is, what we are going to do or achieve together in future.
We all know that we’ll die one day, but still we thrive and strive for life. That’s what which keeps us alive. So, let’s not think about the result, and just keep doing what is right and needs to be done at the moment. May the force be with us.
जब नाम सा ही काम हो और काम का भी नाम ना हो, तो गुणगान ही क्या, वह काम भी क्या!
ना सूरज निकले और ना अस्त ही हो, अंधेर ध्रुवों पर बादलों में, सुबह ही क्या और शाम भी क्या!
निकल जाते हैं महीनों बाट घर की जोह कर..
अपने ही ना हों जब पास में, फिर सप्ताह ही क्या सप्ताहांत भी क्या !!!
#ownquotes
-Ashwani Kumar
You say it sunset because that's how you see it. But it's not the sun which is setting down, it's you, moving away from Him. The Sun would appear up rising on the other side where they are coming towards Him!!
-AshwaniTells
As a part of someone’s life, you are not to please, But make sure you’re spreading happiness and bringing it to the life of every individual with whom you connect!! Appeasement is temporary but happiness is permanent… With that goal.. Keep going!!
Ashwani Kumar
We always say that we can't please everyone all the time.. But, we must contain ourselves in a behavior that doesn't harm anyone in any way. If our actions are the cause of someone's suffering then we must be humble enough to accept our mistakes, so that we learn from them and don't repeat them. Be respectful, pleasant and a loving human being.
Ashwani Kumar
The people of your dreams don't exist, so you must not impose your dreams on someone. But, if you be the change you want, and accomplish your dreams, you will definitely see those people incarnate
Ashwani Kumar
Give them a hug with the sweetness of your emotion; if they are on a higher side of their emotions, be it happiness, sadness or Anger.. Eventually, you love them
Ashwani Kumar
The best way to live happily is to live in present while thinking for future... Thinking of past has a tendency to drag you back from the course of success and happiness!!
Ashwani Kumar
If you understand the true meaning of Love, you understand the meaning of True Love
Ashwani Kumar :)
नाना जी के बैल।
एक समय ऐसा था जब हमारे यहां खेती में हल और बैल का प्रयोग बहुतायत में होता था। हालांकि आज भी ट्रैक्टर हर घर में नहीं हैं लेकिन बैल पालने और उसका खेती में प्रयोग करने का प्रचलन लगभग समाप्त ही हो गया है। लेकिन हमने अपने बचपन में, ननिहाल में हल बैल से ही खेती होते देखी। उस समय हमारे नाना के पास भी दो बैल हुआ करते थे। मेरे लिए वो दोनों ही बड़े कौतूहल का विषय थे। जब भी नानी के घर जाता था तो उनके साथ काफी समय बिताने का मौका मिलता था। कौतुहल का विषय इसलिए क्यूंकि वे मुझे देख कर मुस्कुराते थे। आदर्श आज्ञाकारी बच्चो की तरह नाना की हर बात सुनते थे और जो भी करने को कहा जाता था वह बिना किसी ना-नुकुर के सीधे कर दिया करते थे। कई बार तो उन्हें उनका काम समय के अनुसार पहले से ही पता होता था और खूंटे से खुलते ही वे अपने काम पर लग जाते थे। मुझे लगता था की ये स्वाभाव से ही ऐसे हैं।
फिर एक दिन हमारे दूर के मामा को किसी काम के लिए बैलगाड़ी ले कर जाना पड़ा। उन्होंने हमारे घर से ही बैल और बैलगाड़ी निकाली और खेतों की तरफ निकल लिए। मैं घर में ही खेल रहा था तो जिज्ञासावश बैलगाड़ी पर चढ़ लिया और साथ जाने लगा। बैल आराम से अपनी ही चाल से बैलगाड़ी लेकर चलने लगे। लेकिन मामा को गाड़ी तेज़ चलाने में मज़ा आता था। उन्होंने बैलो को मार मार कर तेज़ भगाना शुरू कर दिया। अलग-अलग तरह ही गालियां बकते हुए और चाबुक से पीटते हुए वह बैलो को लगातार और तेज़ भागने को बोल रहे थे। बैल भागे तो जरूर और खेत तक पहुंच गए। तेज़ चलती बैलगाड़ी पर बैठ कर मुझे भी मज़ा आया। लेकिन खेत पहुंच कर जब मैंने बैलों की तरफ देखा तो मेरी सारी ख़ुशी हवा हो गई। उनकी आँखों से लगातार आंसूं निकल रहे थे और वे दोनों एक दुसरे की पीठ पर पड़े चाबुक के निशानों को देख कर दु:खी होते साफ दिख रहे थे। उनकी वह मुस्कान जो मुझे देख कर नाहक ही आ जाया करती थी वह भी विलुप्त हो चुकी थी , संभवतः उन्होंने मुझे तेज़ चलती बैलगाड़ी की ख़ुशी मनाते देख लिया था।
वापस जाते समय जब मामा बैलों को वापस बैलगाडी में लगाने आए तो उन्होंने गाडी में लगने से साफ़ मना कर दिया। मामा ने उनको फिर मारा लेकिन वो फिर भी नहीं लगे और लगाम छुड़ा कर भाग खड़े हुए। अब जबकि सारा माजरा मेरी समझ में आ चुका था , मैंने भाग कर नाना को सारी बात बता दी। नाना ने मामा को बहुत डांटा और बोलै कि आज के बाद तुम्हे अपने बैलों को हाथ भी नहीं लगाने दूंगा। बड़ी मुश्किल से खेत से जाकर फिर नाना बैलों को लेकर वापस आए; मनुहार के बाद उनको गाडी में लगने को राजी किया और सब लोग वापस घर आने को निकल पाए।
संसाधनों का प्रबंधन सिखाने के लिए आज कल दुनिया भर के पाठ्यक्रम प्रबंधन संस्थानों में पढ़ाए जाते हैं। ये विषय बहुत कुछ सिखाते हैं लेकिन असली जीवन की ये घटनाएं हमें सिखाती हैं की जब ये पाठ्यक्रम नहीं थे, प्रबंधन तब भी एक कला थी और उसमे निपुणता एक चारित्रिक गुण था। हर संस्था या संगठन को अगर हम बैलगाड़ी की तरह मान कर चलें और बैल वह संसाधन जो उस संस्था या संगठन को आगे ले जाते हैं , तो हमें एक प्रबंधक के रूप में यह चारित्रिक गुण कुछ इस प्रकार आत्मसात करना होगा कि हमारे संसाधान रुपी बैल हमसे लगाम छुड़ा कर कहीं भाग न जाएं। क्यूँकि जिस प्रकार बिना बैल के बैलगाड़ी का कोई अस्तित्व नहीं है उसी प्रकार योग्य संसाधन के आभाव में किसी भी संस्था या संगठान का आगे बढ़ पाना असंभव है।
भारत और जाति प्रथा - एक विश्लेषण
आधुनिक विश्व में भारत एक अभूतपूर्व प्रतिभा के धनी राष्ट्र के रुप मे अपनी पहचान बना रहा है। हमारा इतिहास पौराणिक ग्रंथों, ज्ञानावलियों, और अनेक पुस्तकोँ से भरा पड़ा है। ऐसे में भारत अपनी संस्कृति और विरासत को सहेजते हुए आगे बढ़ रहा है। हज़ारो वर्षो की गुलामी के बाद देश के ज्ञानालय और पुस्तकालय सभी कुछ लगभग पुनः निर्मित हुए हैं। इसलिए हमारी संस्कृति और परम्पराओं मे अधिकतर चीज़ें या तो सुनी हुई हैं, या पूर्वजोँ के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुचाई गई हैँ, या फ़िर आधुनिक पंडितो के द्वारा पुनः अनुवादित कर के समाज को दी गईं हैं। इस प्रक्रिया में कई परम्पराएं ऐसी भी हैं जो आधुनिक समाज मे बिखराव का कारण बन रही हैं। यदि दूरगामी परिणाम को देखेँ तो ये परंपराएं न केवल समाज का बल्कि समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार का भी जीवन कठिन बना रही हैँ। इन्ही में से एक है जाति प्रथा। आज के युग में यह जाति प्रथा कई सामाजिक व्यवस्थाओं पर हावी होकर देश और समाज का सर्वाधिक विनाश कर रही है। जिनमे ,मुख्यतः प्रभावित व्यवस्थाएँ हैं विवाह, उच्च शिक्षा और नौकरी। पारम्परिक गावों से आधुनिक शहरोँ मे आकर बसे, और अपनी अगली पीढ़ी को विश्व की प्रतिस्पर्द्धा का हिस्सा बनाने वाले परिवारोँ मे, विवाह पर जाति प्रथा हावी होकर देश के मूल्यवान होनहारों की प्रतिभा का हनन कर रही है। वैसे ही संविधान में दिए हुए आरक्षण के प्रावधान बड़े आधार पर इसी प्रतिभा की राह मे रोड़ी अटकाए हुए हैँ। प्राचीन व्यवस्था मे समाज को ४ वर्णो में बांटा गया था। वे लोग जो समाज को शिक्षित करने का काम करते थे, ब्राम्हण कहलाते थे, जो देश की रक्षा की जिम्मेदारी लेते थे वे क्षत्रिय कहलाते थे, व्यापार कर देश को मूलभूत जीवन यापन का सामान दिलाने वाले वैश्य थे तो समाज के स्वच्छता और निचले तबक़े के काम करने वाले शूद्र। इन सभी में समय के साथ साथ लोगो ने और श्रेढ़ियाँ बना कर समाज को और बांटने का प्रयास किया। धीरे धीरे कार्य पर आधारित वयवस्था जन्म पर आधारित हो गई और फ़िर जन्म के अनुसार कार्य मिलने लगे। व्यवस्था में शोषण प्रारम्भ हुआ तो समाज ने खुद को ठीक करने के लिये कुछ सुधारको को जन्म दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि आधुनिक भारत मे जन्म आधारित वर्ण हैं, जाति है किन्तु न तो जाति आधारित कार्य वितरण है और न ही जन्म आधारित। लेकिन फिर भी जाति को आधार मान कर विवाह होते हैं , जाति को आधार मान कर शिक्षा और नौकरी मे आरक्षण भी दिया जाता है। यह व्यवस्था समाज को भीतर ही भीतर खोखला कर रही है। संतान अपने माता - पिता से झगड़ रही है , समाज के वर्ग एक दूसरे से झगड़ रहे हैं, जिसका फल कुछ भी प्राप्त नही हो रहा अपितु देश युवा शक्ति को बेमतलब के झंझावातों मे फ़ंसा पाकर खुद दिशाहीन होता जा रहा है। इस स्थिति का निवारण शिक्षित समाज के कठिन किन्तु सही निर्णय ही कर सकते हैँ। समाज को सर्वाधिक नुकसान उन शिक्षित परिवारोँ से है जो झूठीं वाहवाही (मूर्खों अथवा अशिक्षितों की प्रशंशा ) को आधार मान कर आज भी जाति आधारित विवाह मे विश्वास करते हैं और अंतर्जातीय विवाह को अपनी बदनामी का कारण समझते हैं। वहीँ वह लोग ऐसी सरकारें चुन कर भेजते हैं कि जो समाज की जाति प्रथा पर आधारित आरक्षण को बढ़ावा देती है और समाज मे फैली बुराइयों को और बढ़ा देती है। भारत के उच्चतम न्यायालय का इस मामले में क्या कहना है वह इस समाचार मे देखा जा सकता है :
http://archive.indianexpress.com/news/intercaste-marriages-in-national-interest-sc/778458/
आधुनिक भारत के परिप्रेक्ष्य मे अधोलिखित दो-तीन काल्पनिक संवाद क्रमों से एकाँकी के रूप मे हम समस्या को समझ सकते हैं :
दृश्य १: (कलाकार : पिता, माता , पुत्री )
(माता- पिता एक साथ पुत्री से फ़ोन पर बात कर रहे हैं )
------
पुत्री : हैलो पापा !! मुझे एक असाइनमेंट के लिये ३ महीनो के लिए अहमदाबाद जाना है। सैटरडे की फ्लाइट है यहाँ बेंगळूरू से।
माता : बेटा आप अकेले चले जाओगे ऐसे ?
पुत्री : हाँ मम्मी क्या दिक्कत है, घर से भी तो अकेले ही आई थी बंगलौर। वैसे यहां से दो कलीग (सहकर्मी ) साथ जा रहे हैं।
कुछ और संवाद के बाद बात समाप्त हो जाती है।
(शनिवार के दिन )
पुत्री : पापा मै अहमदाबाद आ गई और आज से ही ऑफिस जान शुरु कर दिया। यहां पर सैलरी भी 6000 /- रु जयादा मिलेगी और अबकी बार से आप को 25 नहीं ३० हजार भेजा करुँगी ।
माता - पिता : अरे वाह। बहुँत अच्छे। बेटे अपना ध्यान रखना और कोइ समस्या हो तो बताना।
(एक बार फिर कुछ और संवाद के बाद बात समाप्त हो जाती है। माता-पिता आपस मे बात करते हैं : )
माँ : कितनी समझदार बन गई है बिटिया हमारी। अकेले सारी दुनिया घूम रही है। हमारी दिक्कतें भी समझ रही है। आपने MBA करा के अच्छा ही किया।
पापा : हाँ ऊंची पढ़ाई करने के फायदे तो होते ही हैं।
माँ : पूरे मोहल्ले मे नाम है मेरी बेटी का। कल शुक्लाइन मिली थीं तो कह रही थीं कि तुम्हारी लड़की को देख के तो लागता ही नही की बाहर रहती है।
(अपनी बेटी की तारीफ़ मे कुछ और कसीदे पढ़नें के बाद माँ बाप अपने अपने काम मे लग जाते हैं। )
-- कुछ दिन बाद --
पापा (फ़ोन पर) : हेलो बेटे ! आपके लिए एक लड़का देख लिया है। उनको आपके फोटो और प्रोफाइल पसन्द आ गए हैं। लड़के का कभी फ़ोन आएगा तो आप बात कर लेना ठीक से। अच्छा रिश्ता है और जान पहचान का है।
पुत्री : लेकिन पापा , एक बार पहले पूछ तो लेते मुझसे।
माँ - बाप : तुझसे क्या पूछ लेते? क्या अपनी कास्ट (जाति ) का कोई लड़का है तेरी नजर मे ? है तो बता।
पुत्री : नहीं। किसी दूसरी कास्ट का है। लेकिन अपर कास्ट (ऊंची जाति ) का है।
माता- पिता : तो क्या कि अपर कास्ट का है, अपनी कास्ट का तो नही है। तू बिरादरी में नाक कटवाएगी क्या ? वो शुक्लाइन जो कल तक तारीफे करतीं थी अब मुह पे बाते बनाएँगी।
बेटी काफी बहस करने के बाद भी अपने पढ़े लिखे माँ बाप को समझा नहीं पाती और अनततः माता- पिता के मूर्खता-पूर्ण कुतर्को के चलते उसे एक अनजान व्यक्ति से विवाह करना पड़ता है।
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यहां यह बताना आवश्यक है कि आज के समाज मे जबकि लडकियां और लड़के दोनो ही पारिवारिक आमदनी के लिये नौकरी करते हैं तो विवाह के लिये आपसी समझ का होना सबसे अधिक आवश्यक है। यह समझ साथ काम करने वाले लोगो के साथ आसानी से बन सकती है और इसलिए किसी तृतीय पक्ष के बजाय अपनी सन्तान की कबिलियत पर विश्वास करना श्रेयस्कर माना जाना चाहिये।
उपरोक्त दृश्य मे वही माता पिता जो अपनी बेटी को समझदार बता कर खुद की पीठ थपथपा रहे थे केवल एक जाति को लेकर अपनी बेटी के भविष्य के शत्रु बन गए। संवाद में माता पिता के तर्कों को कुतर्क और मूर्खता पूर्ण बताया गया है। इसके कारणों का विश्लेषण देखते हैं : सर्वप्रथम, ये शुक्लाइन कौन हैं ? क्या शुक्लाइन का इन तीनो पात्रों के जीवन मे कोई महत्व है ? क्या शुक्लाइन ने इस बेटी के mba की फीस दी थी ? क्या शुक्लाइन उसे घर से बंगलौर और फ़िर अहमदाबाद छोडने गई थी ? तो आज वह शुक्लाइन माता पिता की नाक काट लेने की इच्छा क्यों रखेंगी ? दूसरा, कल तक जो लड़की समझदार थी, अपना अच्च्छा बुरा समझ सकती थी , माता पिता की समस्याओं को भी समझ सकती थी, आज अचानक बुरी बन गईं। इतनी बुरी की वह समाज मे माता पिता कि 'नाक' कटवा सकती है। जबकि इन तथाकथित बुद्धिजीवी माता पिता ने लड़की की पसन्द के लड़के को देखना तक उचित नही समझा।
अब इस प्रकरण के नकारात्मक परिणाम क्या हो सकते हैं। दो साथी जो एक साथ एक ही प्रकार का काम कर के और एक दुसरे को पूरी तरह समझ के, देश की उन्नति मे योगदान दे रहे थे, आकस्मिक विवाह नामक संस्था उनके बीच आकर दोनो के जीवन को अलग अलग रूप से प्रभावित करती है। अब उन्हें पुनः नए व्यक्ति और उसके परिवार को शुरु से समझना होगा और उनकी अधिकाँश उर्जा सामंजस्य बिठाने, समझने और समझाने मे ही जाती रहेगी। और यदि यह मानसिक कुठाराघात उनके मष्तिष्क से न निकल सका तो वे अपने माता पिता की गलती का सारे जीवन परीणाम भुगतते रहेंगे। जीवन के इस लम्बे सफर मे जहाँ वे एक दुसरे के पूरक रह कर देश और समाज को आगे ले जा सकते थे , अवसाद के मरीज बनकर देश का बोझ बढा रहे होंगे । इस सबका एक कारण आधुनिक समाज में जाति की अवांछनीय उपस्थिति है।
दृश्य २;
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रमेश गुप्ता सामान्य जाति का छात्र है जो कि इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष मे है और उसके पिता प्राइमरी स्कूल के अध्यापक हैं ।
रमेश : हेलो पापा, इस बार CAT का फॉर्म भरना है , २०००/- रु ज्यादा भेज देना।
पापा : बेटा इस बार तो २ बीमो की किश्त देनी है। इस बार तुम्हारी फीस भी अकाउंट से दे दी थी तो पैसे वहाँ भी नहीं बचे हैं। देखो किसी से ले लो इस महीने , अगले महीने मे भेज दूंगा।
(रमेश दुखी मन से अपने दोस्त सुरेश से पैसे मांगता है। सुरेश के पिता विकास भवन मे क्लास १ अधिकारी हैं और उनकी जाति संवैधानिक अनुच्छेदों मे अनुसूचित जाति मे अंकित है। )
रमेश : यार मेरा कैट का फॉर्म तू भर दे, पैसे आगले महीने दे दूंगा मैं।
सुरेश: ठीक है। मेरा तो फ्री है, तेरे लिये ही पैसे भेजे हैँ बापू ने शायद । (और दोनों मित्र हंसने लगतें हैँ )
(दोनों के परीक्षा परिणाम आने के बाद CAT का भी परीणाम आता है )
रमेश : यार मेरे तो गए २०००/- पानी मे। 90 पर्सेंटाइल आई है। कोई ढंग का कॉलेज कॉल नही करेगा।
सुरेश : मेरे 82 आई है। रिजर्वेशन की वजह से IIM से भी कॉल आ सकती है।
रमेश हतोत्साहित हो जाता है।
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उपरोक्त दृश्य मे देखने वालीं बात यह है कि न तो रमेश के पिता जाति के आधार पर कार्य करते हैं और न ही सुरेश के पिता। रमेश और सुरेश एक ही परीक्षा देते हैं। जहां माली हालत को देखते हुए रमेश को फ़ॉर्म का फ़्री किया जाना जयादा आवश्यक था, वहीँ सुरेश को ऎसी कोइ आवशयकता नही थी। दोनों छात्र लगभग एक जैसे ही अंक पाने के बाद भी चयन की प्रक्रिया मे बाँट दिये जाएंगे। जहां सुरेश को आगे पढ़ने का मौका मिलेगा वहीँ रमेश अपनी जाति को कोसता हुआ सुरेश से बैर मान बैठेगा। जातिगत आरक्षण समाज मे फ़िर से खाई बढ़ाना प्रारम्भ कर देगा और देश योग्य प्रतिभा के चयन मे पीछे रह जाऐगा। समाज में वैमनस्य की भावना वैसे ही बढ़ जाएगी जैसे कि गुलाम भारत मे थी। जब समाज ही न जुड़ सकेगा तो देश कभी आगे न जा पाएगा।
निष्कर्षतः देश हित और समाज के हित मे जाति प्रथा का अन्त अति आवश्यक है।
-अश्वनी कुमार (यह लेख सर्वोच्च न्यायलय के 19 अप्रैल 2011 को दिए गए एक निर्णय से प्रेरित है, सभी घटनाएं और पात्र काल्पनिक हैँ )