पिता: पैंतालीसवें का एकालाप
होने और किसी अन्य को अभी
अभी खोने से मिलकर बनता है
वर्तमान का खोना उघाड़ देता है
जहां क्या था नहीं पता बिलकुल भी, और
क्या खोया यह भी नहीं मालूम ठीक ठीक
पर कुछ तो था, कभी, उसका पता लगता है
किसी को खोने से ही, जबकि जो गया
वो वह नहीं जो हुआ रहा होगा कभी, पर
साधारण जीवन में साधारण मनुष्यों के दुख भी
वैसे दुख मुझे छूते नहीं एक तो इसका दुख है,
जो मेरा अपना है वह दुख कम दुख का आवाहन है ज्यादा
सुदूर दो देश-काल को जोड़कर आधा-आधा
साधारण का अभाव और असाधारण का आविष्कार
मेरे अंतर का निरंतर करता रहा है परिष्कार।
तभी तो कई कई रूपों में देखा है
और हर रूप का जोड़कर कुछ न कुछ
सब में से लेकर थोड़ा-थोड़ा उधार
गढ़ा है, पढ़ा है, लिखा है मैंने तुमको
होता है वह तुम्हारा ही प्रतिरूप
तुम्हारे न होने से जन्मना खाली जगह
हो जाती है थोड़ी और विद्रूप।
मैं अंधा और कमरे में हाथी
जितना छूता हूं, छूता हूं जहां जहां
जोड़जाड़ कर उसे बना ही लूंगा
छवि कोई, कोई प्रतिमा उसकी जो
न सही कमरे में पर जीवन में है उतना ही
किसी प्राचीन बौद्ध या जैन कथा
अथवा ऋग्वेद की किसी ऋचा में छुपे
अनेकान्तवाद की एक टहनी हैं पिता
और मैं अनुर्वर, त्रिभंग शालभंजिका
हवा में थामे उनका अनस्तित्व
धरती पर जो मूर्तिमान है उन कुछ लोगों में
जो आसपास बचे हैं मेरे पर जिन्हें खुद
उन्होंने न कभी छुआ, न जाना
सौ सौ लोगों में वे खिलते हैं पर
हो चुका निर्णय, नहीं बनना
अपनी संततियों के कष्ट का विषय
नहीं जाएगा रिसकर अगली पीढ़ी तक
तुमसे, तुम्हारे न होने से उपजा
मेरा आत्यंतिक और काल्पनिक दुख
निरंतर विस्तृत होते भुवन में
तुम्हारा गुरुत्व और बढ़ता है।
पिता, मेरा कमरा अब खाली हो रहा है
सारे हाथी या तो वृद्ध हो गए हैं या पागल
मर रहे हैं सब एक एक कर के
तुम्हारे अभाव को भरने की सुविधा थे जो
या कि मेरे अभावों को टालने का शगल
जो चाहे कह लो, पर उनको खोते जाना और
उसी क्रम में तुम्हारा न से न होते जाना
एक अनिर्वचनीय, कल्पनातीत, निर्भाष्य
जब कुछ नहीं रह जाता खोने को
तो पाने का ही कौन सा सुख बचता है।
कहा था किसी ब्राह्मण ने आओगे तुम
मेरे अठारवें में, और अड़तीसवें तक
करता रहा मैं प्रतीक्षा, जबकि
पैंतालीस में पहुंच चुकी अब तितिक्षा
कुछ ज्यादा ही देर कर दी।
कमर तोड़ती उम्र और दम तोड़ते कमरे में
एक टेढ़ी कुर्सी के सहारे टिकाकर पीठ
अदेखे को निर्जल सींचता हूं
मैं वही पुरानी गठरी बार-बार