Muhabbat k ilawa
kuch bhi baat kejiye ?
yeh barish,
chand, udaas ratein,
kehny ko hazar batein kahiye ap kesy hain?
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Muhabbat k ilawa
kuch bhi baat kejiye ?
yeh barish,
chand, udaas ratein,
kehny ko hazar batein kahiye ap kesy hain?
Jo tere ishq mein guzre, wo din mere padhne likhne ke the....
जिस प्रेम में प्रेम न बचे,
उस प्रेम से बेहतर है मर जाना।
मैं हर बात पर सिर झुकाना नहीं जानती,
इसलिए अक्सर अकेली दिखाई देती हूँ।
पर यह अकेलापन मेरी मजबूरी नहीं,
मेरे आत्मसम्मान की चुनी हुई कीमत है।
मुझे नामों की नहीं,
हमेशा किरदार की रोशनी ने आकर्षित किया है।
क्योंकि शब्द बदल जाते हैं,
पर नीयत अपना सत्य नहीं बदलती।
मैं ग़लत हो सकती हूँ,
पर अपने उसूलों की क़ीमत पर सही कहलाना
मुझे स्वीकार नहीं।
मेरी मोहब्बत समंदर-सी गहरी है,
और मेरी ख़ामोशी उससे भी अधिक गहरी।
जो अपना हो,
उसके लिए मैं स्वयं को भी समर्पित कर सकती हूँ।
मुझे किसी की परछाई बनकर जीना नहीं,
मैं अपनी धूप भी हूँ,
अपना साया भी।
यदि कभी मेरी कहानी लिखी जाए,
तो हर पन्ने पर
किसी रिश्ते का नहीं,
सिर्फ़ मेरे वजूद का नाम लिखा जाए।
क्योंकि कुछ लोग मंज़िल पाने नहीं निकलते,
वे अपने होने का अर्थ जीने निकलते हैं।
और यदि कुछ याद रखना हो,
तो बस इतना
जिस प्रेम में प्रेम न बचे,
उस प्रेम से बेहतर है मर जाना
जिस प्रेम में प्रेम न बचे,
उस प्रेम से बेहतर है मर जाना।
मैं हर बात पर सिर झुकाना नहीं जानती,
इसलिए अक्सर अकेली दिखाई देती हूँ।
पर यह अकेलापन मेरी मजबूरी नहीं,
मेरे आत्मसम्मान की चुनी हुई कीमत है।
मुझे नामों की नहीं,
हमेशा किरदार की रोशनी ने आकर्षित किया है।
क्योंकि शब्द बदल जाते हैं,
पर नीयत अपना सत्य नहीं बदलती।
मैं ग़लत हो सकती हूँ,
पर अपने उसूलों की क़ीमत पर सही कहलाना
मुझे स्वीकार नहीं।
मेरी मोहब्बत समंदर-सी गहरी है,
और मेरी ख़ामोशी उससे भी अधिक गहरी।
जो अपना हो,
उसके लिए मैं स्वयं को भी समर्पित कर सकती हूँ।
मुझे किसी की परछाई बनकर जीना नहीं,
मैं अपनी धूप भी हूँ,
अपना साया भी।
यदि कभी मेरी कहानी लिखी जाए,
तो हर पन्ने पर
किसी रिश्ते का नहीं,
सिर्फ़ मेरे वजूद का नाम लिखा जाए।
क्योंकि कुछ लोग मंज़िल पाने नहीं निकलते,
वे अपने होने का अर्थ जीने निकलते हैं।
और यदि कुछ याद रखना हो,
तो बस इतना
जिस प्रेम में प्रेम न बचे,
उस प्रेम से बेहतर है मर जाना
किसी दिन किसी दोपहर तुम्हारे नाम लिखा वो आखिरी खत
तुम तक कभी नही पहुंचेगा
ना ही तुम जान पाओगी
मै क्या सोचता हूं
पर तुम वहां बैठी अनुमान लगा सकती हो
और जितना मै तुम्हे जानता हूं
जानता हूँ की तुम क्या कल्पनाए लेकर बैठी होगी।
102
मुझे मालूम है... हमारे बीच केवल... दूरी ही रहेगी,
फिर भी मैं उस... दूरी को तुम्हारी आख़िरी निशानी समझकर... जीता रहूंगा
मुझे मालूम है... हमारे बीच केवल... दूरी ही रहेगी,
फिर भी मैं उस... दूरी को तुम्हारी आख़िरी निशानी समझकर... जीता रहूंगा
किसी रोज़ मैं याद करके
लिखूंगा
वो तमाम यात्राएं
तुमसे मिलने को-
जो मैंने सोची जरूर
पर,कभी कर नहीं पाया।।
एक दिन हम दोनों ये सोचकर अगल हो जाएंगे की सामने वाला पहले बातचीत की पहल करेगा तब बात बढ़ेगी।
लेकिन जब हम अलग हो जाएंगे तब हमें अहसास होगा कि विरह में जाने से पहले
हमें एक अंतिम मुलाकात जरूर करनी चाहिए थी।
अजीब सी आदत हो गई है..
. तुम्हें याद करने की नहीं...
बल्कि हर चीज़ में, तुम्हें ढूंढ लेने की।
पहले तुम याद आते थे,
अब तुम हर चीज़ में शामिल हो।
शायद प्रेम याद से ज़्यादा आदत है।
मुझे ग़म है कि मैंने ,
ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया ।
यह ग़म दिल से निकल जाए ,
अगर तुम मिलने आ जाओ ॥
—ज़ावेद अख़्तर
किसी को किसी के प्रेम में रहने देना भी प्रेम ही है..!
- तुम्हे मेरी याद नहीं आती।
- आती तो है! ऐसा क्यों कह रही हो?
- उम्म कुछ न! बस कुछ और कहना था, भूल गई।
- ओह!
- लेकिन तुम्हे सच में मेरी याद नहीं आती।
- अरे! बताया न अभी! बिल्कुल आती है तुम्हारी याद।
- ...
- अब क्या?
- कुछ नहीं!
- फिर भी?
- देख रही हूँ
- क्या देख रही हो?
- यही की अब तुम ये बताने में भी थक जाते हो कि, तुम मुझे याद करते हो! फिर ये देख कर मै मान नहीं पाती कि तुम सच में मुझे याद करते हो।
- तुम न.. हमेशा से ज्यादा सोचती हो ! जो एक बार कहूं तो तुम मान क्यों नहीं लेती?
- ऐसे मान लू?
- कैसे ?
- ऐसे जैसे तुम कह रहे हो?
- अब मैंने क्या कह दिया!
- कुछ नहीं !
- बोलो भी !
- ... :)
- तुम्हे मेरी याद नहीं आती।
- आती तो है! ऐसा क्यों कह रही हो?
- उम्म कुछ न! बस कुछ और कहना था, भूल गई।
- ओह!
- लेकिन तुम्हे सच में मेरी याद नहीं आती।
- अरे! बताया न अभी! बिल्कुल आती है तुम्हारी याद।
- ...
- अब क्या?
- कुछ नहीं!
- फिर भी?
- देख रही हूँ
- क्या देख रही हो?
- यही की अब तुम ये बताने में भी थक जाते हो कि, तुम मुझे याद करते हो! फिर ये देख कर मै मान नहीं पाती कि तुम सच में मुझे याद करते हो।
- तुम न.. हमेशा से ज्यादा सोचती हो ! जो एक बार कहूं तो तुम मान क्यों नहीं लेती?
- ऐसे मान लू?
- कैसे ?
- ऐसे जैसे तुम कह रहे हो?
- अब मैंने क्या कह दिया!
- कुछ नहीं !
- बोलो भी !
- ... :)
"मौत भी मुझसे एक वादा करती है,
कहती है मिलूंगी तुझे... मगर वक़्त आने के बाद,
तुम भी आना तो यूँ ही आना, जैसे मौत आती है-न मैं रोक सकूँ, न तुम लौट सको।"
पेड़ पे बना-बना फूल लगाया जा सकता था,
मुझे लगता था पैसों से प्यार पाया जा सकता था।
उसे लगता है, खूब तड़पाया उसने मुझे,
मुझे लगता है, मुझे और तड़पाया जा सकता था।