Muhabbat k ilawa
kuch bhi baat kejiye ?
yeh barish,
chand, udaas ratein,
kehny ko hazar batein kahiye ap kesy hain?
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Muhabbat k ilawa
kuch bhi baat kejiye ?
yeh barish,
chand, udaas ratein,
kehny ko hazar batein kahiye ap kesy hain?
किसी रोज़ मैं याद करके
लिखूंगा
वो तमाम यात्राएं
तुमसे मिलने को-
जो मैंने सोची जरूर
पर,कभी कर नहीं पाया।।
एक दिन हम दोनों ये सोचकर अगल हो जाएंगे की सामने वाला पहले बातचीत की पहल करेगा तब बात बढ़ेगी।
लेकिन जब हम अलग हो जाएंगे तब हमें अहसास होगा कि विरह में जाने से पहले
हमें एक अंतिम मुलाकात जरूर करनी चाहिए थी।
अजीब सी आदत हो गई है..
. तुम्हें याद करने की नहीं...
बल्कि हर चीज़ में, तुम्हें ढूंढ लेने की।
पहले तुम याद आते थे,
अब तुम हर चीज़ में शामिल हो।
शायद प्रेम याद से ज़्यादा आदत है।
मुझे ग़म है कि मैंने ,
ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया ।
यह ग़म दिल से निकल जाए ,
अगर तुम मिलने आ जाओ ॥
—ज़ावेद अख़्तर
किसी को किसी के प्रेम में रहने देना भी प्रेम ही है..!
- तुम्हे मेरी याद नहीं आती।
- आती तो है! ऐसा क्यों कह रही हो?
- उम्म कुछ न! बस कुछ और कहना था, भूल गई।
- ओह!
- लेकिन तुम्हे सच में मेरी याद नहीं आती।
- अरे! बताया न अभी! बिल्कुल आती है तुम्हारी याद।
- ...
- अब क्या?
- कुछ नहीं!
- फिर भी?
- देख रही हूँ
- क्या देख रही हो?
- यही की अब तुम ये बताने में भी थक जाते हो कि, तुम मुझे याद करते हो! फिर ये देख कर मै मान नहीं पाती कि तुम सच में मुझे याद करते हो।
- तुम न.. हमेशा से ज्यादा सोचती हो ! जो एक बार कहूं तो तुम मान क्यों नहीं लेती?
- ऐसे मान लू?
- कैसे ?
- ऐसे जैसे तुम कह रहे हो?
- अब मैंने क्या कह दिया!
- कुछ नहीं !
- बोलो भी !
- ... :)
- तुम्हे मेरी याद नहीं आती।
- आती तो है! ऐसा क्यों कह रही हो?
- उम्म कुछ न! बस कुछ और कहना था, भूल गई।
- ओह!
- लेकिन तुम्हे सच में मेरी याद नहीं आती।
- अरे! बताया न अभी! बिल्कुल आती है तुम्हारी याद।
- ...
- अब क्या?
- कुछ नहीं!
- फिर भी?
- देख रही हूँ
- क्या देख रही हो?
- यही की अब तुम ये बताने में भी थक जाते हो कि, तुम मुझे याद करते हो! फिर ये देख कर मै मान नहीं पाती कि तुम सच में मुझे याद करते हो।
- तुम न.. हमेशा से ज्यादा सोचती हो ! जो एक बार कहूं तो तुम मान क्यों नहीं लेती?
- ऐसे मान लू?
- कैसे ?
- ऐसे जैसे तुम कह रहे हो?
- अब मैंने क्या कह दिया!
- कुछ नहीं !
- बोलो भी !
- ... :)
"मौत भी मुझसे एक वादा करती है,
कहती है मिलूंगी तुझे... मगर वक़्त आने के बाद,
तुम भी आना तो यूँ ही आना, जैसे मौत आती है-न मैं रोक सकूँ, न तुम लौट सको।"
पेड़ पे बना-बना फूल लगाया जा सकता था,
मुझे लगता था पैसों से प्यार पाया जा सकता था।
उसे लगता है, खूब तड़पाया उसने मुझे,
मुझे लगता है, मुझे और तड़पाया जा सकता था।
तुम नहीं भी आओगे, मेरे हिस्से तब भी एक रोज़ आ ही जाएगा तुम्हारे शहर की ओर आने का कोई आमंत्रण तुम्हारे नाम के नए लोग मेरे जीवन में और शायद तुम-सा ही हाल पूछता कोई नया व्यक्ति।
हाँ, तुम्हारे अलावा यदि नहीं आएगा कोई मेरे हिस्से तो वह व्यक्ति जो था कभी मैं सिर्फ़ तुम्हारे आगे
प्रेम का होना तो सरल है परंतु प्रेम में साथ-साथ चलना कठिन
प्रेम करने से लेकर प्रेम निभाने तक की यात्रा गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं
दो इंसान में से एक इंसान कभी न कभी इस प्रेम यात्रा को एकाएक छोड़ देता है और
छोड़े गए इंसान को दे जाता है आने वाले तमाम दुःख और साथ में
अधूरी यात्राओं का एक ख़त जिस पर लिखा होता है
अकेले ही यात्रा करने का संदेश।
उसकी शर्तों पर जीता तो मर जाता कुछ दिन और न पीता तो मर जाता
मैं एक उम्र से दश्त-ए-तसव्वुर में हूं शहर-ए-हक़ीक़त में होता तो घर जाता
मुझे जकड़े रखा एक उम्मीद ने वर्ना यक़ीनन कुछ न कुछ तो मैं कर जाता
मैंने ही पाले रखा इसे अपना मान कर ये ज़ख्म तो वर्ना कब का भर जाता
उदासी की कई वजहें हो सकती हैं लेकिन एक लंबी उदासी की वजह... केवल Ishq है....
तुमने बताया था कि
नहीं हो सकता कुछ भी
अब
जब सब हो चुका खत्म।
वक़्त निकल चुका है-
पर
कविता?
कविता!
हो सकती है
वक़्त के बिना भी
सब खत्म होने के बाद भी।।
(: अज्ञात)
कितने दिन गुज़र गए, तेरे बगैर,
सुना है मेरा ये शहर, तेरे बगैर।
साँस लेता हूँ तो पता चलता है,
ज़िंदा तो हूँ में मगर, तेरे बगैर।
आईना देख कर ये सोचता हूँ मैं,
कौन आता है अब नज़र, तेरे बगैर।
बाग़ सींचे हैं रोज़ मैंने लेकिन,
रंग लाता नहीं शजर, तेरे बगैर।
कुछ लिखता हूँ, फिर मिटा देता हूँ,
पूरा नहीं होता कोई शेर, तेरे बगैर।