पीयूष मिश्रा.. नाटे कद का एक आदमी, जो गाने बैठता है, तो पड़ोसी मुल्क पहुंचा देता है. एक्टिंग करता है, तो सब गुलाल जैसा लाल कर देता है. लिखने बैठता है, तो हमें भगत सिंह और सुखदेव के सामने ले जाकर खड़ा कर देता है. पीयूष जी के साथ कुछ समय बिताया उमेद हेरिटेज जोधपुर में ... पीयूष जी ने काफी वक्त पहले एक प्ले लिखा था, नाम है ‘गगन दमामा बाज्यो’. ये उन नौजवानों की कहानी है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जवानी, जिंदगी, तालीम… सब छोड़ दी. इसमें भगत सिंह और सुखदेव की कहानी है. मिश्रा जी ने इतना शोध और परिश्रम किया था कि भगतसिंह पर इतिहास की कोई पुस्तक बन जाती, लेकिन उन्हें नाटक लिखना था जिसकी अपनी संरचना होती है, सो उन्होंने नाटक लिखा जिसने हमारे मूर्तिपूजक मन के लिए भगतसिंह की एक अलग, महसूस की जा सकनेवाली छवि पेश की। सुखदेव से एक न समझ में आनेवाली मित्रता में बँधे भगतसिंह, पंडित आज़ाद के प्रति एक लाड़-भरे सम्मान से ओत-प्रोत भगतसिंह, महात्मा गाँधी से नाइत्तफाकी रखते हुए भी उनके लिए एक खास नज़रिया रखनेवाले भगतसिंह, नास्तिक होते हुए भी गीता और विवेकानन्द में आस्था रखनेवाले भगतसिंह, माँ-बाप और परिवार से अपने असीम मोह को एक स्थितप्रज्ञ फासले से देखने वाले भगतसिंह, पढ़ाकू, जुझारू, खूबसूरत, शान्त, हँसोड़, इंटेलेक्चुअल, युगद्रष्टा, दुस्साहसी और प्रेमी भगतसिंह। यह नाटक हमारे उस नायक को एक जीवित-स्पन्दित रूप में हमारे सामने वापस लाता है जिसे हमने इतना रूढ़ कर दिया कि उनके विचारों के धुर दुश्मन तक आज उनकी छवि का राजनीतिक इस्तेमाल करने में कोई असुविधा महसूस नहीं करते।
जयंती और पुण्यतिथि के सोशल मीडियाकरण के ज़माने में आज क्या भगत सिंह को जैसे याद किया जाना चहिये क्या वो हक़ उन्हें मिल रहा है कांग्रेस ने भगत सिंह जी के इतिहास को धूमिल करने में कोई कसर नही छोड़ी परंतु युवाओ के बीच आज भी वो ज़िन्दा है और हमारे साथ है हमारी स्मृति में है लेकिन उन सभी युवाओ से में ये निवेदन करूँगा की उनके बारे में पड़े उन पर अध्यन करे और अपनी नई पीढ़ी को उनके बारे में बताए ....