ये चांदनी भी रूठ के बादलों मैं जा छिपी,
कही ये अजनबी सा रुतबा तुमने तोह नहीं सिखाया इसे ?
वशिष्ठ
०१ जनवरी २०२१

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ये चांदनी भी रूठ के बादलों मैं जा छिपी,
कही ये अजनबी सा रुतबा तुमने तोह नहीं सिखाया इसे ?
वशिष्ठ
०१ जनवरी २०२१
अब लौट कर आओ तो मोहोब्बत कहलाना, टूटे बिना बिछड़ना बोरियत सा लगने लगा है।
वशिष्ठ ३१ दिसंबर 2020
कितनी दूर निकल आये हम लड़ते झगड़ते, समंदर आज भी रेत की बाँहों मैं बाहें दाल कर बैठा है।
वशिष्ठ २४ मई २०२०
आओ ज़िन्दगी किस्सों मैं बाँट दें सारी, कांधे पर सिर रखने की हिम्मत ज़रा करो तुम।
वशिष्ठ 26 सितम्बर २०२०
मेरे ख्याल कैद हैं पन्नो मैं कही, ज़िन्दगी पन्ने पलटती पलटती समझना भूल जाती है ।
वशिष्ठ २७ सितम्बर २०२०
अक्सर दर्द रिसने लगता है पलकों से
ज़ख्म सारे इस कदर दबाए बैठे हैं
रात परछाई सी राख हो गई पलों में
रोशिनी के खर्चों से छिपाये बैठे हैं
उम्र लग गई वो जगह बनाने में
जहाँ रंग सारे अपने भुलाये बैठे हैं
सुकून कबका लुटा दिया है हमने
आंखे पढ़ना बस तुम्हें नहीं आता
वशिष्ठ
१७ मई २०२०
काश रुक जाता वहीं,
जब नज़रें मिली थी अपनी,
न जाना होता तुम्हें
काश रुक जाता वही,
जब एक दूसरे की बातों में,
याद करने लगे थे
काश रुक जाता वहीं
जब रूठे हुए पलों में,
साथ तुम्हारे अंचल का मिलने लगा
काश रुक जाता वहीं
जब मुस्कुराने की आदत सी पड़ने लगी,
काश रुक जाता वहीं
जब हर मौके में,
मिलने का बहाना ढूंढ़ने लगा
काश रुक जाता वहीं,
जब रुलाया करता था,
और फिर बेवकूफियों से मनाया भी करता था,
काश रुक जाता वही
जब लफ़्ज़ों को छुपाया करता था,
बस आँखों से समझ लेती थी
काश रुक जाता वही
जब पूछ लिया तुमने,
और दिल बयां कर दिया सारा
काश रुक जाता वहीं
तो ज़रिया न छीना होता
न तुमने मन को दूरियों से मनाया होता
न हम इतने डूबे नज़र आते तुम्हे ।
वशिष्ठ
२७ जनवरी २०२०
इन गलियों मैं
ज़िन्दगी की इन तंग गलियों में खुली इन ज़ंजीरों में करवट लेने से डरती है यहाँ ज़िन्दगी ज़िन्दगी से डरती है
आसमा दिखाई देता नहीं दम झुक के निकलता है लहू रिस कर सलाखों से सुनहरे बादलों में बिकता है
आप नज़रें फिरा लेंगे शीशे हम नहीं ढकते बाजार की बिकती बोलियों में कमज़ोर दिल नहीं रखते
भुलाने फिर आएँगे आदतें अपनी भुलाने दिल देता कहाँ रोज़ दिल की बोलियां लगेंगी ज़िन्दगी को दिल की आदतें कहाँ
वशिष्ठ 3 मई २०२०